December 2, 2020

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मोदी सरकार के कृषि अध्यादेशों से क्यों खफा हैं किसान? पॉइंट्स में समझिए किसानों और सरकार की राय

कृषि अध्यादेश

Why are farmers unhappy with the Modi government's three agricultural ordinances?

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बीते 10 सितंबर को हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पीपली में किसानों ने हाल ही में आए मोदी सरकार के कृषि अध्यादेश को लेकर जमकर हंगामा किया. जिसमें किसानों ने जहां ‘किसान बचाओ मंडी बचाओ रैली’ की तो, वहीं दूसरी तरफ रैली की अनुमति न मिलने पर जाम लगा दिया. जिसके चलते पुलिस ने किसानों पर लाठी चार्ज किया. वहीं किसानों की ये खबर ना तो किसी मीडिया संस्थान तक पहुंच सकी न ही किसानों की सुध किसी ने ली. उसके बाद भी किसानों ने हुंकार भरते हुए दोबारा आंदोलन करने की चेतावनी दी है.

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जबकि हाल ही में इस मुद्दे के खिलाफ पंजाब के भी किसान ‘ट्रैक्टर आंदोलन’ कर चुके हैं. इसके अलावा देश के व्यापारी चार राज्यों में मंडियों में भी हड़ताल कर रहे हैं. इसे देखने के बाद ऐसा कहा जा सकता है कि, इन दिनों किसान और व्यापारी दोनों ही मोदी सरकार की 3 जून को आए नए कृषि अध्यादेशों के खिलाफ लड़ने का प्लान बना चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार इन दोनों अध्यादेशों को कृषि सुधार की दिशा में मास्टर स्ट्रोक कह रही है. चलिए हम आपको बताते हैं कि आखिर 3 जून को आए तीन नए अध्यादेशों में ऐसा क्या है. जिससे किसानों के साथ व्यापारियों की भी चिंता बढ़ गई है.

  • मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश

सरकारी दावा- 

सरकार का कहना है कि, इस कृषिअध्यादेश के लागू होने के बाद से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों पर जोखिम कम हो जाएगा. साथ ही किसानों की आय में भी सुधार आएगा. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में पार्दर्शिता आएगी. समानता के आधार पर ही किसान, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों और किसान प्रोसेसर्स तक से जुड़ सकेगा. ऐसा होने से किसानों को बड़ी-बड़ी कंपनियों से खास उत्पाद के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने में भी आसानी होगी. साथ ही किसानों को बेहतर और उचित दाम मिल सकेगा.

किसानों की बात:

जबकि किसानों और कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि, सरकार के इस कृषि अध्यादेश से जहां किसान अपने खेत में सिर्फ एक मजदूर बन कर रह जाएगा. वहीं इस समय सरकार देश के किसानों पर पश्चिमी देशों के खेती मॉडल थोपने पर तुली हुई है. किसानों-विशेषज्ञों का मानना है कि, कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों का शोषण होता है. कई बार तो उनके अच्छे खासे उत्पाद तक को रिजेक्ट बता दिया जाता है. जबकि दूसरी तरफ व्यापारियों का मानना है कि, अगर सारी खरीददारी कंपनियां ही कर लेंगी तो आढ़तियों को कौन पूछेगा..? इस तरह तो मंडी खत्म हो जाएगी.

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  • कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार-संवर्धन एवं सुविधा अध्यादेश

सरकारी दावा:

सरकार का मानना है कि, इस कृषि अध्यादेश के लागू होने के बाद से जहां किसानों को एक सुगम और मुक्त माहौल मिल पाएगा. जिसमें किसान अपनी सुविधा के हिसाब से अपने कृषि उत्पाद खरीद बेच सकेगा. वहीं पूरे देश में ‘एक देश, एक कृषि मार्केट’ बन सकेगा. इस तरह किसानों के पास विकल्प हो सकेंगे. इस तरह बाज़ार की लागत भी कम हो सकेगा. साथ ही उन्हें अपने उपज की बेहतर कीमत भी मिल सकेगी.

इस कृषि अध्यादेश के बाद से जहां पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थान से, सुपर मार्केट से किसान का माल खरीद सकता है. इसकी मुख्य वजह ये है कि, कृषि माल की बिक्री उपज मंडी समिति (APMC) को इस अध्यादेश में हटा दिया गया है. जो भी खरीद अब मंडी से बाहर की जाएगी. उस पर किसी भी तरीके का टैक्स नहीं लगाया जाएगा.

किसानों की बात:

वहीं किसानों को ड़र है कि, जब उनके उत्पाद की खरीद मंडी में नहीं की जाएगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर सकेगी. इससे सरकार को ये भी मालूम नहीं चलेगा कि, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिल रहा है या नहीं. साथ ही किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गांरटी की भी मांग कर रहे हैं. किसानों का मानना है कि, ये किसानों का कानूनी अधिकार है. ताकि तय रेट से कम पर खरीद करने वालों को जेल में डाला जा सके. 

वहीं इस कृषि अध्यादेश के लागू होने के बाद से किसानों में डर है कि वो कंपनी से विवाद होने के बाद किसी भी स्थिति में कोर्ट नहीं जा सकते. ऐसे में विवाद की स्थिति में किसानों और कंपनी के बाद विवाद का समझौता एसडीएम और डीएम ही कर सकेंगे. ऐसे में किसानों का मानना है कि, क्या वो सरकारी दबाव से मुक्त हो सकेंगें..?

जबकि व्यापारियों का कहना है कि, सरकार ने नए अध्यादेश में साफ लिखा है कि मंडी के अंदर अगर फसल आती है तो, उस पर फीस लगाई जाएगी. हालांकि मंडी के बाहर अनाज बिकने पर मार्केट फीस नहीं लगाई जाएगी. ऐसे में मंडियां तो धीरे-धीरे आने वाले समय में खत्म हो जाएगी. कोई भी किसान या इंसान मंडी में माल ही क्यों खरीदेगा. यही वजह है कि, व्यापारियों को लगता है कि यह आर्डिनेंस वन नेशन टू मार्केट को बढ़ावा देगा.

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असेंसियल कमोडिटी एक्ट में संशोधन

सरकारी दावा:  

हमारे देश में ज्यादा कृषि उत्पाद सरप्लस हैं. जिसके बावजूद किसानों को कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग की कमी के चलते अपनी उपज के सही मूल्य के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी. क्‍योंकि उनपर आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम की तलवार लटकती रहती थी. ऐसे में जल्दी खराब होने वाली फसल के बंपर पैदावार होने पर किसानों को काफी नुकसान झेलना पड़ता था.

यही वजह है कि, वस्तु अधिनियम में संशोधन किया गया है. जिसमें खाद्य तेल, प्याज, आलू, तिलहन, दालें आदि को इस एक्ट से बाहर रखा गया है. इसके अलावा व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों को एक लिमिट से अधिक अपने स्टोरेज में रखने की भी रोक को हटा लिया गया है. हालांकि जब सरकार को जरूरत महसूस होगी उसी पर फिर से वही पुरानी व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा.

किसानों की बात:  

किसानों का मानना है कि इस कृषि अध्यादेश में संशोधन बड़ी कंपनियों और बड़े व्यापारियों के हितों को देखते हुए किया गया है. ये कंपनियां और सुपर मार्केट आने वाले दिनों में सस्ते दामों पर उपज की खरीदारी कर अपने बड़े-बड़े गोदामों को भर लेंगी. जबकि इसके बाद फिर वहीं उपज लोगों को ऊंचे दामों पर बेंचेगी.

क्यों बनाया गया था यह एक्ट 

हर कोई जानता है कि, पहले के समय में व्यापारी किसानों से उनकी उपज औने-पौने दामों पर खरीदते थे और अपना भंडारण करते थे. फिर उसी उपज की कालाबाजारी करते थे. यही वजह थी कि, उसको रोकने के लिए सरकार ने एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया था. जिसके तहत व्यापारियों को कृषि उत्पादों का भंडारण करने पर रोक लगा दी गई थी. हालांकि एक बार फिर सरकार ने उन्हें कालाबाजारी के लिए खुली छूट दे दी है.

 

Writer : Producer & Anchor – शुभ शुक्ला

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