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सरकारी नीतियां और देश के मक्का उत्पादक किसानों की पीड़ा

मक्का

सरकारी नीतियां और देश के मक्का उत्पादक किसानों की पीड़ा

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खरीफ सीजन में बोया गया किसानों का मक्का अब खलिहानों और बाजारों में आने लगा है। केंद्र सरकार की ओर से इस साल के लिए मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 1850 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। भारत सरकार का कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के अनुसार इस वर्ष प्रति क्विंटल मक्का उत्पादन की लागत 1213 रुपये है इस हिसाब से लागत का डेढ़ गुना दाम यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 1850 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित हुआ है। न्यूनतम निर्धारित मूल्य यानि किसानों को यह दाम मिलना ही चाहिए। लेकिन वर्तमान में देश के किसी भी राज्य में मक्के का दाम 700 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक ही है अर्थात किसान MSP से लगभग 50% कम दाम में ही अपनी मक्के की फसल बेचने को मजबूर हैं वहीं CACP द्वारा आँकलित उत्पादन लागत 1213 रुपये प्रति क्विंटल से भी करीब 200 से 500 रुपये तक कम मूल्य में बेचने को मजबूर हैं।

अब सवाल यह है कि क्या मक्क के दाम गिरने की वजह क्या हैं?

इसका प्रश्न का जवाब जानने के लिए हमें पिछले एक वर्ष से राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर मक्के से संबंधित हुई हलचलों को समझना होगा। विगत वर्ष मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और कमलनाथ जी मुख्यमंत्री थे। तब मध्यप्रदेश सरकार ने प्रारंभ में मक्के के उपार्जन हेतु पंजीयन व्यवस्था ना कराने का फैसला किया था लेकिन सिवनी जिले के जागरूक युवाओं और किसानों के साथ साथ अलग-अलग संगठनों से किसानों के द्वारा मक्का MSP का जमीनी प्रयास किया गया। किसानों की मांग थी कि सरकार पंजीयन करना शुरू करे एवं मक्का को उस वर्ष के तय MSP 1760 रुपये प्रति क्विंटल में खरीदी सुनिश्चित करे।

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2 अक्टूबर 2019 गांधी जयंती के दिन सिवनी मध्यप्रदेश में किसानों के द्वारा बड़ी रैली एवं एक दिन का धरना प्रदर्शन किया गया गया। परिणामस्वरूप कमलनाथ सरकार ने आंशिक रूप से इसपर सुनवाई की और मक्के का पंजीयन शुरू हुआ। लेकिन तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने किसानों से वादा खिलाफी करते हुए मक्का की खरीदी नही की। हालांकि पिछले वर्ष मक्का का बाजार भाव फसल आने के शुरुआती महीने में 1600 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल था जो दिसंबर महीने में बढ़कर 2000 रुपये या उससे अधिक तक पहुँच गया जो कि पिछले साल के लिए तय MSP 1760 रुपये से अधिक था

लेकिन दूसरी ओर देखें तो 2006 में प्रकाशित स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट जिसकी सिफारिशों को मनमोहन सरकार के कार्यकाल में पूर्ण नही किया गया और मोदी सरकार इसी स्वामीनाथन रिपार्ट को लागू करने के चुनावी वादे के साथ इस साल भी आई जिसके हिसाब से पिछले साल मक्का MSP 2340 रुपये प्रति क्विंटल तय होता है, जिसपर बिकना था लेकिन तब भी देखें तो मक्के का बाजार भाव इससे कम ही था।

इसी बीच केंद्र में बैठी मोदी सरकार द्वारा दिसंबर 2019 में ही विदेश से 5 लाख टन मक्का आयात करने के लिए संबंधित कम्पनियों को छूट दे दी गई। इस फरमान के बाद बिना देरी के कंपनियों ने दिसम्बर महीने से ही यूक्रेन, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से भारतीय बाजार में मक्के का आयात शुरू कर दिया। अनेक देशों में मक्का या अन्य किसी भी फसल के बाजार भाव सस्ते होने पर इसलिये भी वहाँ किसानों के लिये भारतीय किसानों की अपेक्षा उतनी भारी समस्या नही होती हैं क्योंकि वहाँ सरकारें कृषि के भविष्य और किसानों के जीवन स्तर को बनाये रखने के लिए उचित व भारी मात्रा में सब्सिडी देती हैं।

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भारत की पोल्ट्री फीड और स्टार्च बनाने वाली कंपनियों को विदेशों से आयात होने वाला मक्का देश में पहुँचकर 1400 से 1500 रुपये प्रति क्विंटल में मिल रहा था। परिणामस्वरूप देश के किसानों का जो मक्का दिसम्बर 2019 में 2100 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बिक रहा था। वह अब जनवरी 2020 में भारी गिरावट के साथ मात्र 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल ही रह गया था। मक्के के दाम में सिर्फ 20 से 25 दिनों में यह अप्रत्याशित गिरावट थी। इसमें बहुत से छोटे व्यापारी भी तबाह हो गए। मोदी सरकार के इस फैसले से मक्का उत्पादक किसानों को भयंकर का घाटा हुआ।

इसके बाद मक्का किसानों को दूसरा झटका तब लगा जब कोरोना अपने पैर पसार रहा था। जिस प्रकार फरवरी में विदेशों में फैलने वाले कोरोना की खबरें चलीं तो भारत में एक अफवाह फैली की अंडा या चिकन खाने से कोरोना फैलता है। इस एक अफवाह से देश के सभी छोटे-बड़े पॉल्ट्री फार्म मार्केट बुरी तरह से प्रभावित हुआ। लोगों ने कोरोना के डर से चिकिन और अंडा खाना लगभग बंद कर दिया। चूंकि देश में 60% मक्के की खपत पॉल्ट्री फीड के रूप में इस्तेमाल होती है।

लेकिन जब मुर्गियों और अंडों की बिक्री 90 से 95% गिर गई पॉल्ट्री फार्म घाटे के कारण बंद होने लगे, यहाँ तक कि कुछ जगह तो पुलिस और स्थानीय लोगों ने पॉल्ट्री फार्म से मुर्गियों को बड़े-बड़े गड्ढे कर दफ़न कर दिए। इससे मक्के की मांग बहुत ही कम हो गई और उसके दाम आकस्मिक ही नीचे गिर गए। हालांकि कुछ ही दिनों में विशेषज्ञों ने यह साबित कर दिया कि कोरोना वायरस का मुर्गी और अंडा से कोई संबंध नही है। इस सूचना के बाद देश का पॉल्ट्री फार्म एशोसिएशन ने सरकार से बहुत गुहार लगाया की लोगों में फैली इस अफवाह पर सरकार आगे आकर कुछ बोले और निर्णय ले लेकिन सरकार टस से मस नही हुई।

देश की बड़ी मात्रा में मक्का की उपभोगी इंडस्ट्रीयाँ 3-4 महीने के अंदर समाप्ति के कगार पर पहुँच गईं।

बाद में 20 लाख करोड़ के कोरोना राहत पैकेज का भी खूब ढिंढ़ोरा पीटा गया लेकिन उस राहत पैकेज से सहायता के लिए पॉल्ट्री फार्म मालिकों और बड़े तौर पर विसंगत परिस्थितियों से नुकसान झेल रहे मक्का किसानों को कुछ नही मिला। देश में मई तक लॉकडाउन की वजह से खरीदी बंद रही लेकिन मई 2020 के आखिर में खरीदी शुरू हुई तो तब तक मक्का के दाम और भी गिरकर 700 से 900 रुपये/क्विंटल तक ही रह गए थे। उसी समय बिहार और अन्य राज्यों में रबी सीजन का मक्का आना शुरू हुआ था वहां भी कम दाम मिलने की वजह से किसानों ने आंदोलन किये इसके अलावा मक्का के लिए हरियाणा, कर्नाटक, तेलंगाना और उत्तरप्रदेश के किसानों ने भी आंदोलन किये।

मध्यप्रदेश में भी मक्का किसानों को भारी नुकसान हुआ। कोरोना की वजह से हम सिवनी व छिन्दवाड़ा जिले के कुछ साथियों ने “किसान सत्याग्रह” नाम से फेसबुक पेज और इसी नाम से ट्विटर आदि सोशल मीडिया पेजों के जरिए एक नई पहल की शुरूआत की। इस प्रकार मक्का किसानों की आवाज स्थानीय मीडिया के साथ-साथ राष्ट्रीय मीडिया तक भी पहुँचाया गया किसानों ने वीडियो बनाकर, पम्पलेट से फेसबुक व ट्विटर से अपने जनप्रतिनिधियों को चेताया और मक्का MSP पर बेकने की मांग की।

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किसानों के लिए एक दिन का अन्नत्याग किया गया। इसके समर्थन में देश भर से बहुत से किसान संगठनों और देश की कृषि के आलावा अन्य कार्य करने वाली जनता ने भी किसानों के हित में MSP के अधिकार के लिए उपवास रखा लेकिन सरकार ने युवाओं द्वारा किसानों के लिए किए जा रहे इस पहले गांधीवादी तरीके के ऑनलाइन आंदोलन और किसानों की वर्षों पुरानी व्यथा की आवाज़ो को सुनकर भी अनसुना कर दिया।

जुलाई 2020 यानि किसान का मक्के की बोनी के बाद पुनः केंद्र में बैठी मोदी सरकार ने देश के मक्का किसानों के इन हालातों का अनदेखा करते हुए फिर से 5 लाख टन मक्का विदेश से आयात करने की छूट देकर एक बार फिर घातक प्रहार कर दिया। जून-जुलाई में किसान को मक्का बोनी के बाद कुछ उम्मीद थी कि, अक्टूबर नवंबर में फसल आने तक शायद मक्का के दाम थोड़े बढ़ जाएँगे लेकिन बोनी से 15 दिन बाद ही मक्का किसानों को खून के आँसू रुलाने वाला यह फैसला ले लिया गया।

अब सवाल यहाँ यही उठता है कि जब पहले से ही जो मक्का MSP से आधे दाम में बिक रहा था। 5-6 राज्यों के किसान मक्के के दाम के लिए आंदोलन कर रहे थे। देश के बहुतायत हिस्सों में फिर से मक्का की बोनी हो चुकी थी तो फिर मोदी सरकार को क्या पड़ी थी कि विदेश से मक्का आयात का फैसला लिया गया?

इसी सवाल के उत्तर में कुछ विशेषज्ञों का कहना पड़ा कि 5 लाख टन मक्का का आयात अमेरिका से किया जाएगा। क्योंकि अमेरिका में इस साल के अंत तक राष्ट्रपति चुनाव हैं और मोदी जी के राजनीतिक मित्र डोनाल्ड ट्रंप पुनः इस बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। मोदी जी ने अमेरिका जाकर ट्रम्प का चुनाव प्रचार करते हुए वहाँ नारा भी लगा आये हैं “अबकी बार ट्रम्प सरकार” इस नारे के साथ मोदी जी फंस गए हैं इसलिए मोदी जी चाहते हैं कि ट्रम्प फिर से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव जीतें। चूंकि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा मक्का उत्पादक देश है, जो अकेले दुनिया का 30% मक्के का उत्पादन करता है।

मक्का

अमेरिका उन्नत कृषि के चलते प्रायः अधिकांश कृषि फसलों का निर्यात करता है इसी कड़ी में अमेरिका में इस समय मक्का, सोयाबीन, पोल्ट्री और दुग्ध उत्पाद भी चुनावी मुद्दा बने हुए हैं क्योंकि अमेरिकी सरकार उनके लिए विदेशों में आपेक्षित बाजार नही खोज पाई है तो अमेरिका के ये किसान ट्रम्प सरकार से नाराज हैं। इसलिए ट्रम्प महोदय के सबसे अच्छे दोस्त मोदी जी उनकी इस मुसीबत के समय में संकटमोचन बनकर साथ खड़े एवं देश के किसानों के विपरीत दिखाई दे रहे हैं। इसका भी परिणाम भी किसानों को लगातार देखने मिल रहा है, भारत और अमेरिका के बीच बहुत जल्द “क्विक ट्रेड एग्रीमेन्ट” यानि “त्वरित व्यापार समझौता” लगभग होने की कगार पर है इसकी जानकारी देश के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा भी दी गई। इस बारे में सारी जानकारी गूगल सर्च करके भी पढ़ी जा सकती हैं।

इस फ्री ट्रेड समझौते के तहत अमेरिका भारत के बीच होने वाले आयात और निर्यात में कोई टेक्स नहीं लगेगा। ज्ञात हो कि 5 लाख मीट्रिक टन मक्का के आयात में छूट के साथ ही 10 हजार टन दुग्ध उत्पाद में भी आयात की छूट दे दी गई है। यह फैसला भी उसी समझौते के तहत बताया जा रहा है। जबकि देश में दूध की कोई कमी नहीं है देश का दूध उत्पादक किसान सही दाम न मिलने से पिछले दिनों महाराष्ट्र में एक बड़ा आंदोलन कर चुका है जिसकी कोई मांगें स्वीकार नही की गई।

यह भी एक लंबा विषय है इसे हम पूरी तरह से अगले आर्टिकल में समझने का प्रयास करेंगे। यहां अभी मुख्यतः मक्का की बात करें तो अमेरिका भारत के बीच होने वाले संभावित फ्री ट्रेड एग्रीमेन्ट के कारण ही आज मक्का के दाम इतने कम हैं क्योंकि फीड और स्टार्च बनाने वाली कंपनियों को अच्छे से पता है कि अमेरिका में अभी मक्का का दाम 152 डॉलर प्रति टन है, अभी एक डॉलर की कीमत लगभग 74 रुपये है। यानि 11,248 रुपये प्रति टन मतलब अमेरिका में अभी मक्का 1,125 रुपये प्रति क्विंटल है। जो कि इस समझौते के बाद यहां बिना किसी टैरिफ के आयात होगा।

इसलिए कंपनियां अभी देश के किसानों से मक्का ज्यादा दाम में नहीं खरीदना चाहती हैं क्योंकि कुछ वक्त बाद वहां का सस्ता मक्का आयात होने लगेगा। अमेरिका में इतना कम दाम इसलिए रहता हैं क्योंकि 2018 का एक डेटा बताता है कि वहाँ सरकार के द्वारा प्रत्येक किसान को 60 हजार डॉलर यानि 44 लाख रुपया सालाना सब्सिडी के रूप में देती है जो कि भारत से 280 गुना अधिक है। अमेरिका में औसतन प्रति किसान जमीन की जोत 72 हेक्टेयर है जबकि भारत में प्रति किसान औसत एक हेक्टेयर है। अमेरिका में मक्का का औसत उत्पादन 11 टन प्रति हेक्टेयर है जबकि भारत में मक्का का औसत उत्पादन 3 टन प्रति हेक्टेयर है। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियां भी खेती करती हैं जबकि भारत में खेती अधिकांश संख्याबल रखने वाले करोड़ों लोगों की जीविका का साधन है।

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आज अमेरिका और भारत के कृषि और किसान में इतना अंतर है फिर भी हमारे देश की सरकार का नशीला राष्ट्रवाद उबाल मार रहा है। ट्रम्प महोदय को फायदा पहुँचाने के लिए देश के किसानों और खासकर मक्का किसानों को सबसे जटिल उत्पादन प्रक्रिया द्वारा उगाई जाने वाली फसलों में से एक मानी जाने वाली मक्के की फसल के दाम पर निरंतर आघात किया जा रहा है। मोदी जी ने अमेरिका के लिए देश का मार्केट खोल दिया फिर तीन कृषि कानून लाकर खुद की पीठ थपथपा कर कह रहे हैं कि किसान को आजादी मिल गई। अब किसान अपनी फसल कहीं भी ले जाकर बेच सकता है, पर यह क्यों नहीं बताया जा रहा है कि देश में अभी कहीं मक्का के उचित दाम नही हैं?

यह छूट तो किसानों को पहले से ही थी कि वह अपनी फसल को कहीं भी ले जाकर बेच सके। इस साल का मक्का का समर्थन मूल्य 1850 निर्धारित है जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार इस साल मक्का का MSP 2409 रुपया प्रति क्विंटल होना था। लेकिन अभी दाम पूरे देश में किसी भी शहर या राज्य में 700 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक ही हैं।

MSP ना मिलने से एक एकड़ के किसान को 15 हजार का घाटा है, तो 10 एकड़ के किसान को 1 लाख 50 हजार रुपये का घाटा है। 2019 के राजस्व गिरदावरी आँकड़े के अनुसार सिवनी जिले में 4 लाख 35 हजार एकड़ जमीन में मक्का की खेती हुई थी। अनुमानतः इस साल भी 4 लाख एकड़ में खेती हुई है। तो इस हिसाब से सम्पूर्ण सिवनी जिले के किसानों का 600 करोड़ का घाटा है। मध्यप्रदेश में 16 लाख एकड़ जमीन में मक्का की खेती की जाती है इस हिसाब से पूरे मध्यप्रदेश के मक्का किसानों का घाटा 5 हजार करोड़ रुपये का है।

सोचने वाली बात है कि किसान को बोने के लिए एक एकड़ में 8 किलो मक्का बीज की जरूरत होती है जो किसान को 400 रुपये/किलो में खरीदना पड़ता है। यानि 2 किलो कंपनी का द्वारा बीज के लिये मिलने वाले मक्के का दाम 800 रुपये वहीं 1 क्विंटल (100 किलोग्राम) किसान का मक्का 800 रुपये में बिकता है। आज बाजार में वो बीज भी अधिकतर अमेरिकी कंपनी ही बेच रही हैं।

हमें एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर इस बात को गंभीरता से समझने की ज़रूरत है कि आखिर इस देश में किसानों की ये कृत्रिम इन्तेहाँ और कब तक? और क्या-क्या हैं?

 

Writer Name & Designation : शिवम बघेल, मक्का उत्पादक किसान
(संस्थापक सदस्य – किसान सत्याग्रह)

 

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