February 21, 2024

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धुलेंडी के दिन ही कामदेव के पुर्नजन्म और देवी रति को प्राप्त वरदान की खुशी में हुई थी फूलों की वर्षा

dhulendi

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होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी का त्योहार मनाया जाता है। मगर क्या आप जानते हैं कि आखिर धुलेंडी की शुरुआत कैसे हुई। दरअसल धुलेंडी को धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन जैसे नाम से भी जाना जाता है। इसे मनाने के पीछे एक पुरानी मान्यता है कि धलुंडी के दिन कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने की कोशिश की थी। जिसके बाद भोलेनाथ ने कामदेव को भस्‍म कर दिया था लेकिन देवी रति की प्रार्थना पर भगवान् शिव ने कामदेव को क्षमा दान दे दिया था जिसके बाद कामदेव का पुनर्जन्म हुआ। इसके साथ ही देवी रति को भी भगवन शिव ने ये ये वरदान दिया कि वो श्रीकृष्‍ण की पुत्री रूप में दोबारा जन्म लेंगी। जिसके बाद कामदेव के पुर्नजन्‍म और देवी रति को मिले वरदान की खुशी में पूरे विश्‍व में फूलों की वर्षा हुई थी। इसी कारण इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है। दूसरी कथा में बताया गया है कि असुर हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, लेकिन ये बात हिरण्यकश्यप को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। बालक प्रह्लाद को भगवान कि भक्ति पृथक करने के लिए हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका को सौंप दिया। भक्तराज प्रह्लाद को मारने के उद्देश्य से होलिका उन्हें अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठी। लेकिन प्रह्लाद की भक्ति की वजह से खुद होलिका ही आग में जल गई। अग्नि में प्रह्लाद के शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। जिसके बाद पूरे ब्रह्माण्ड में चारों ओर फूलों की बारिश हुई। जिसके बाद बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में धुलेंडी का पर्व मनाया जाने लगा। ये भी कहा जाता है कि त्रैतायुग की शुरुवात में भगवान् विष्णु ने धूलि वंदन किया था। इसकी याद में धुलेंडी मनाई जाती है। एक दूसरे पर धूल लगाने के कारण ही इस दिन को धुलेंडी कहा जाता है। पुराने समय में लोग जब एक दूसरे पर धूल लगाते थे तो उसे धूलि स्नान कहा जाता था। इसमें गांव की चिकनी मिटटी और मुल्तानी मिटटी भी लोग एक दूसरे को लगाते थे। दरअसल इससे एक फायदा ये भी होता था कि होली वाले दिन जो रंग शरीर पर लग जाता था वो मुल्तानी और चिकनी मिटटी से आसानी से छूठ जाता था। मगर बदलते समाज में अब मान्यताएं भी बदल गई हैं। क्योंकि अब मुल्तानी मिटटी नहीं बल्कि कीचड नाली के पानी से लोग होली खेलने लगे हैं। जिससे होली के अगले दिन खेली जाने वाली धुलंडी के महत्व अब कम होता जा रहा है। यहां तक की कई लोग तो इस दिन के बारे में या इससे जुड़ी परंपरा के बारे में जानते तक नहीं हैं। मगर हाँ,आज भी कुछ जगहों पर खासतौर पर गांवो में लोग एक दूसरे धूल आदि लगाते हैं।

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