February 21, 2024

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प्रतापगढ़ जिले में आदिवासी समुदाय होली के अगले दिन करता है आत्माओं की पूजा

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देशभर में होली के अगले दिन रंगों का पर्व धुलंडी भी धूम धाम से मनाया जा रहा है। मगर प्रतापगढ़ जिले में आदिवासी समुदाय आज इस त्यौहार से बिलकुल दूर है। दरअसल देश में कई जगहों पर होली मनाने की अलग परंपरा है। यहां के पूर्व राजघराने में शोक के चलते धुलंडी तो नहीं मनाई जाती है मगर इस दिन समाज के बुजुर्ग होली की फसलों में से आने वाले भविष्य और मौसम की भविष्यवाणी करते हैं। यही नहीं आदिवासी पिछले 100 साल से धुलंडी के दिन पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर गेर नृत्य करते हैं। आज के दिन शादीशुदा जोड़ा सज धज कर होली के सात फेरे लगाकर गेर नृत्य करता है। वहीं, साल भर में जिस किसी के घर में मृत्यु हो जाती है, वहां भी सात फेरे लेकर शोक खत्म किया जाता है। परिवार आत्मा के मोक्ष की कामना करता है साथ ही उसे दोबारा याद नहीं करने का प्रण भी आज के दिन लिया जाता है। यहां के लोगों का मानना है कि जो व्यक्ति होली के सात फेरे लेता है उसे साल भर तक कोई बीमारी नहीं होती है। साथ ही ऐसा करने से खेतों में फसलें लहलहाती रहती है। इसके साथ ही होली के फेरे लगाकर आदिवासी समाज देश में खुशहाली की कामना करता है। प्रतापगढ़ में होली के अगले दिन चाहे धुलंडी नहीं मनाई जाती है मगर होली के 12 दिन बाद यहां धुलंडी मनाने का रिवाज़ है। इस दिन यहां रंगे नृत्य और आदिवासी संस्कृति का अलग ही समावेश देखने को मिलता है। इसके साथ ही फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। होली के 12 दिन बाद रंग तेरस पर रंगों का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही गुलाल और फूलों से होली खेली जाती है। एक दूसरे पर धूल लगाने के कारण ही इस दिन को धुलेंडी कहा जाता है। पुराने समय में लोग जब एक दूसरे पर धूल लगाते थे तो उसे धूलि स्नान कहा जाता था। इसमें गांव की चिकनी मिटटी और मुल्तानी मिटटी भी लोग एक दूसरे को लगाते थे। दरअसल इससे एक फायदा ये भी होता था कि होली वाले दिन जो रंग शरीर पर लग जाता था वो मुल्तानी और चिकनी मिटटी से आसानी से छूठ जाता था। मगर बदलते समाज में अब मान्यताएं भी बदल गई हैं। क्योंकि अब मुल्तानी मिटटी नहीं बल्कि कीचड नाली के पानी से लोग होली खेलने लगे हैं। जिससे होली के अगले दिन खेली जाने वाली धुलंडी के महत्व अब कम होता जा रहा है। यहां तक की कई लोग तो इस दिन के बारे में या इससे जुड़ी परंपरा के बारे में जानते तक नहीं हैं। मगर हाँ,आज भी कुछ जगहों पर खासतौर पर गांवो में लोग एक दूसरे धूल आदि लगाते हैं।

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