February 21, 2024

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बिहार का एक गांव जहां 250 सालों से नहीं मनाई गई होली, रंग लगाते ही आ जाता है बड़ा संकट

holi

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देशभर में हर तरफ़ होली के रंग की ख़ुमारी है। होली का त्यौहार है ही ऐसा कि बड़ी धूमधाम से मानाया जाता है। कहीं अबीर गुलाल उड़ाए जा रहे हैं तो कहीं गुजियां और मिठाइयों की ख़रीददारी हो रही है। मगर इस बीच एक गांव ऐसा भी है जहां सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां लोग होली तो मनाना तो दूर इसके नाम से भी डरते हैं। इस गांव में ना गुजिया बनती हैं और ना ही या कोई रंग खेलता है। दरअसल बिहार के सजुआ गांव में ढाई सौ साल से होली नहीं मनाई जाती। अगर कोई होली मनाने की सोचता भी है तो उसके घर कोई ना कोई मुश्किल आ जाती है। जिससे यहां न कोई रस्म निभाई जाती है और ना ही त्योहार मनाया जाता है। गांव वाले बताते हैं कि अगर कोई होली खेलता है और अपने घर मे होली के दिन पुआ, पूड़ी बनाता है तो उसके परिवार पर कोई न कोई संकट आ ही जाता है। कहीं घर में आग लग जाती है तो कहीं किसी को कोई बीमारी हो जाती है। ये सब देख कर ग्रामीणों ने होली मनाना बंद कर दिया है और गांव का नाम भी सतीस्थान रख दिया है।दरअसल ऐसी मान्यता है कि अगर कोई यहां होली खेल भी लेता है तो उसे सती का गुस्सा सहना पड़ता है। इस गांव में करीब 250 साल पहले सती नाम की एक महिला के पति की होलिका दहन के दिन ही मौत हो गई थी। पति के निधन के बाद सती अपने पति के साथ जल कर सती होने की जिद करने लगी। लेकिन गांव वालों ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया। जब वो जिद छोड़ने को राजी न हुई तो उसे घर में बंद कर गांव वाले पति का अंतिम संस्कार करने श्मशान जाने लगे। लेकिन कई कोशिशों के बाद भी गांव वाले उस महिला को रोक नहीं पाए और वो भी अपने पति के साथ चिता में जल गई। जिसके करीब 100 साल बाद अंतिम संस्कार वाली जगह खुदाई की गई तो वहां दो मूर्तियां मिली। गांव वालों ने इसे सती की ही मूर्ति मानकर एक मंदिर बना दिया। ये मंदिर सती स्थान के नाम से जाना जाता है। इसी वजह से गांव की महिलाएं होली के त्यौहार में कोई पूजा पाठ नहीं करती। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हे लगता है कि ऐसा कर के वो कहीं ना कहीं सती का अपमान कर रहे हैं। क्योंकि होली वाले दिन ही सटी के पति की मृत्यु हुई थी। ऐसे में वो होली नहीं मना पाई थी। इस मंदिर में गांव के लोग ही नहीं दूर-दराज से भी लोग अपने लंबी उम्र के लिए सती की पूजा करने पहुंचते हैं। वैसे आज के समय में इस तरह की बातों पर विश्वास कर पाना बहुत मुश्किल है। क्या वाकई ऐसा हो सकता है कि किसी के घर में खुशियां मनाने से कोई रूठ जाए, वो भी वो जो इस दुनिया में है ही नहीं ! ऐसे अंधविश्वास के डर से कितने ही सालों से इस गांव के लोग इतने ख़ुशगवार त्यौहार से ही वंचित हैं। क्या जरुरत नहीं है कि अब इस मान्यता को तोड़ दिया जाए और इस गांव के लोग भी रंगों में सरावोर होकर खूब होली खेलें।

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