अच्छे लाभ के लिए खस की खेती की तरफ बढ़ता किसानों का रुझान

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खस की खेती

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गेहूं, चावल या अन्य पारम्परिक फसलों से इतर किसान, आजकल कोई ऐसी खेती करना ज़्यादा पसंद करते हैं जिससे उन्हें आर्थिक लाभ ज़्यादा हो। किसानों का खस यानि खसखस की खेती की तरफ बढ़ता रुझान भी इसी का प्रमाण है। खस का वैज्ञानिक नाम Chrysopogon zizanioides है। ये एक झाड़ीनुमा पौधा है जो नदी, नाले, तालाबों या अन्य जलस्रोतों के आसपास अपने आप उग जाते हैं। इसकी जड़, तना और पत्तियां हर भाग उपयोगी है।

खस की खेती में लागत और मेहनत कम लगती है और मुनाफा ज़्यादा होता है। मतलब एक एकड़ खेत में खस लगाने पर करीब 18-20 हज़ार रुपए का खर्च आता है और मुनाफा 2 से 2.5 लाख तक आसानी से हो जाता है। जबकि कुछ किसान ऐसे भी हैं जो इससे 5 से 6 लाख तक की कमाई कर रहे हैं। विश्व स्तर पर भारतीय खस की गुणवत्ता बहुत अच्छी मानी जाती है इसकी खेती राजस्थान, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश में की जाती है।

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खस के उपयोग

खस की खेती के बारे में जानने से पहले जान लेते है कि खस के क्या उपयोग हैं। दरअसल, खस का तेल निकला जाता है इसका उपयोग सुगंधित पदार्थों, साबुन, कॉस्मेटिक आइटम्स बनाने, पान मसाला, खाने का तम्बाकू, शरबत और अनेक दवा बनाने में किया जाता है। इसके अलावा इससे चटाई, हाथ के पंखे, और ठंडक के लिए सर पर ओढ़ने के लिए कैप्स व छप्पर आदि बनाई जाती हैं। यहाँ तक कि तेल निकलने के बाद जो वेस्ट बच जाता है उससे कूलर के पैड्स, वॉल हैंगिंग्स और घर को ठंडा रखने के लिए खिड़कियों में भी इसे लगाया जाता है। मतलब आम के आम और गुठिलियों के दाम वाली कहावत खस पर एकदम सटीक बैठती है।

भूमि और जलवायु –

खस की अच्छी पैदावार की लिए शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु जहाँ तापमान 20 से 47 डिग्री सेंटीग्रेड और वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर तक होती हो सबसे अच्छी मानी जाती है। इसकी खेती उपजाऊ दोमट से लेकर अनुपजाऊ लेटराइट मिट्टियों में भी की जा सकती है। रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 8.0 से 9.0 के मध्य हो उसमें भी खस की खेती संभव है। ऐसे स्थान जहाँ वर्षा के दिनों में कुछ समय के लिए पानी इकट्ठा हो जाता है तथा अन्य कोई फसल लेना सम्भव नहीं होता है वहां भी खस की खेती को विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

किस्में

केएस-1, केएस-2, धारिणी, केसरी, गुलाबी, सीमैप खस – 15, सीमैप खस – 22, खुशनलिका और सुगंधा इसकी मुख्य किस्में हैं। इसके अलावा हाइब्रिड -7 व हाइब्रिड – 8 आईएआरआई द्वारा विकसित की गई हैं।

बीज या पौध प्रबंधन

खस को बीज या स्लिप्स के द्वारा लगाया जाता है। अच्छे उत्पादन के लिए किसान इसकी स्लिप्स ही लगाना पसंद करते हैं। स्लिप्स मतलब पुरानी फसल के पोधों को गुच्छों समेत उखाड़ कर इन्हे अलग अलग करके लगाया जाता है। इसके स्लिप्स पुराने किसानों से लिए जा सकते हैं या सीमैप द्वारा इसकी खेती के व मार्केटिंग के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। साथ ही किसान यहाँ से इसके कलम यानि स्लिप्स भी प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप इसकी स्लिप्स अन्य किसानों से प्राप्त करना चाहते हैं तो सितम्बर-अक्टूबर में ही बुक कर लें।

खस की खेती

खेत की तैयारी –

दो-तीन जुताई करके पाटा लगाकर मिटटी को भुरभुरा बना लें, जुताई के समय ही प्रति एकड़ 4 से 5 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट, राख, नीम की खली आदि मिला लें जिससे पौधों के पोषण के साथ साथ दीमक व फंगस आदि से भी बचाव हो जाए। इसकी जैविक या प्राकृतिक खेती ज़्यादा अच्छी रहती है। इससे खर्च तो कम होता ही है साथ ही औषधि के रूप में इस्तेमाल करने पर इसके प्राकृतिक गुण भी बने रहते हैं। लेकिन अगरआप रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो 10-12 किलोग्राम नाइट्रोज़न एक माह बाद दे सकते हैं।

रोपाई –

सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था होने पर जनवरी से अप्रैल तक रोपाई की जा सकती है। रोपाई के तुरन्त बाद सिंचाई अतिआवश्यक है तथा असिंचित दशा में रोपण के लिए सबसे उपयुक्त समय मानसून की शुरुआत (जून से अगस्त) होता है। स्लिप्स को 8 से 10 सेंमी. की गहराई पर 60 सेंमी. पंक्ति की दूरी एवं 45 सेंमी. पौधे-से-पौधे की दूरी पर रोपित किया जाता है। इसके लिए 12 से 20 सेंटीमीटर लम्बी स्लिप्स की रोपाई कर दें।

सिंचाई –

खस की खेती में ज़्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती शुष्क अवस्था में 6 से 8 सिंचाई पर्याप्त रहती हैं। यदि सिंचित क्षेत्र है तो बुवाई के तुरंत बाद एक सिंचाई कर दें पर्याप्त वर्षा होने पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

फसल सुरक्षा –

दो तीन बार फसल की निराई गुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें। इसमें अक्सर रोग, कीट या दीमक आदि की समस्या हो जाती है। ऐसे में शुरुआत में ही नीमास्त्र, या नीम की खली का इस्तेमाल करें या विशेषज्ञों की सलाह से दवा डालें।

उपयोग के हिसाब से कटाई –

यदि इससे विभिन्न वस्तुएं बनाना चाहते हैं तो 10-12 माह पर इसकी पत्तियों की कटाई कर लें। तेल के लिए 12 से 14 माह में जड़ों की खुदाई करें, अन्य किसानों को पौध बेचना चाहते हैं तो 15 से 20 सेंटीमीटर का पौधा होने पर उसे निकाल लें।

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जड़ों की खुदाई-

दिसंबर में जड़ों की खुदाई करना सबसे अच्छा रहता है। लेकिन जहाँ ठण्ड अधिक होती है वहां जड़ों की खुदाई फरवरी में करना उचित रहता है। क्योंकि इस समय इसमें तेल की मात्रा ज़्यादा पाई जाती है। खुदाई करने से पहले इसके ऊपरी भाग को काट ले फिर ट्रेक्टर द्वारा मिटटी पलटने वाले हल से 40.-45 सेंमी. गहराई तक जड़ों की सुविधापूर्वक खुदाई करें। ध्यान रखें कि जड़ों की खुदाई करते समय खेत में हल्की नमी रहनी चाहिए। अच्छे लाभ के लिए तेल निकालने के सस्ते कंटेनर बाजार में उपलब्ध हैं जिन्हे आप आसानी से खरीद सकते हैं। खस के सुगन्धित तेल की कीमत राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में 20 से 25 हजार रुपये लीटर तक मिल जाती है।आजकल कोई भी उत्पाद बेचना बहुत आसान है तो खस की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की जा सकती है, सीमैप से जानकारी लेकर खेती करते हैं तो यहाँ से आपको इसे बेचने का माध्यम भी पता चल जाएगा इसके आलावा आजकल ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के ज़रिये भी आप इसे बेच सकते हैं।

इस तरह किसान खस की खेती करके अच्छा लाभ कमा सकते हैं। इसकी खेती का एक फायदा ये भी है कि, यदि आपकी जमीन बाढ़ ग्रस्त है, बंजर है या पथरीली है तब भी इसकी खेती की जा सकती है। मतलब जहां कोई और फसल लगाना संभव न हो वहां भी खस को लगाया जा सकता है। इसके अलावा आये दिन प्राकृतिक आपदा के कारण खेती बर्बाद हो जाती है, ऐसे में किसानों के लिये इसकी खेती लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

 

Writer : Producer & Anchor – अंजू शर्मा

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