September 18, 2021

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कुल्लू घाटी में भाईचारे की मिसाल है सदियों से चली आ रही ‘जुआरी प्रथा’

जुआरी प्रथा

जुआरी प्रथा

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जब किसी को अपने घर या खेत में कुछ काम करवाना होता है तो इसके लिए मजदूरों से पैसे देकर ही काम करवाया जाता है। मगर कुल्लू ज़िले में ये सभी काम निशुल्क किए जाते हैं। दरअसल कुल्लू जिले में जुआरी प्रथा सदियों से चली आ रही है। इस प्रथा के चलते कुल्लू जिले के सैंज में ग्रामीण खेतीबाड़ी का काम मिलकर करते हैं। मतलब जिस व्यक्ति के घर या खेत में कोई काम करना होता है तो बाकि ग्रामीण इस काम को निशुल्क करते हैं। भौतिकवादी युग में घर और खेतों के काम के लिए अभी भी यहां पैसा मायने नहीं रखता। इस तरह के काम के लिए सदियों से चली आ रही जुआरी प्रथा ही सबसे अधिक विश्वसनीय मानी जाती है। जरूरत के समय काम के बदले काम की यह अनोखी प्रथा कुल्लू जिला में आपसी भाईचारे की मिसाल है। इस प्रथा के तहत खेतीबाड़ी, घास और  फसल कटाई और मकान बनाने का काम निशुल्क किया जाता है। इस गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ये प्रथा कुल्लू घाटी में सदियों से चली आ रही है। शहरी इलाकों में जिन खेतों में काम करने और मकान बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, कुल्लू के ग्रामीण क्षेत्र में ये काम मुफ्त में करने की पुरानी प्रथा है। यहां देव कारज, शादी, समारोह आदि में भी जुआरी का आदान- प्रदान किया जाता है। महिलाएं एक-दूसरे की फसल और घाटी कटाई की जुआरी देती हैं, जबकि पुरुष मकान बनाने के लिए एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। आपसी सहयोग से यहां कई गांव बसे हैं और कई घरों का निर्माण हुआ है और खेतों को उपजाऊ बनाया गया है। कुल्लू घाटी में जुआरी के दौरान पारंपरिक लोकगीतों और लामणों को गाने का प्रचलन है। प्रसिद्ध रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर कहते हैं कि गीत गाने के पीछे मान्यता है कि इससे काम के दौरान मनोरंजन भी होता है और थकान भी महसूस नहीं होती। वैसे वाकई में ये प्रथा बड़ी कमाल की है। कई जगह देखा जाता है कि लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता कि वो मजदूरों को दे सकें ऐसे में काम के बदले काम की इस प्रथा से ना सिर्फ लोगों का काम आसानी से हो जाता है बल्कि उसके लिए कोई पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता है। 

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