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आजादी के सात दशक बाद भी चकबंदी से अछूता त्रिलोकपुर शुक्ल गांव

चकबंदी

आजादी के सात दशक बाद भी चकबंदी से अछूता त्रिलोकपुर शुक्ल गांव

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जिस समय देश में खेतों की चकबंदी का दौर शुरू हुआ था. उस समय सरकार की ये मंशा थी कि, किसानों को छोटे-छोटे टुकड़े खेतों से छुटकारा दिलाकर एक बड़ा सा खेत उन्हें दे दिया जाए. ताकि किसानों की मुसीबतों को कम किया जा सके और किसानों को अपनी ऊर्जा और अपनी मेहनत अपने गाँवों के आस-पास फैले छोटे-छोटे खेतों में न लगानी पड़े. यही वजह है कि, साल 1925 में पहली बार पंजाब से चकबंदी की शुरुआत की गई थी.

शुरुआती समय में सरकार की ये योजना काफी सफल भी रही. किसानों को अपना हक मिलने के साथ-साथ चारों तरफ छोटे छोटे हिस्सों में बटें खेतों से अलग एक चक मिल गया. यही वजह रही कि, इस योजना को पूरे देश में लागू किया गया. उत्तर प्रदेश में साल 1954 में शुरु हुई चकबंदी की योजना की शुरुवात सुल्तानपुर के मुसाफिर खाना से की गई.

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जबकि साल 1958 में इस प्रक्रिया को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया गया. जिसमें पूरे उत्तर प्रदेश को दो हिस्सों में बांटा गया. पहले हिस्से में  1,00,059 गांव जबकि, दूसरे हिस्से में 23,781 रखे गए. जिसके तहत राज्य के किसानों की बिखरी हुई जोतों को एक साथ करने, नाली, चकरोड बनाने की कोशिश थी.

दो हिस्सों में बंटे पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसे न जानें कितने ही गांव आज भी हैं जहां चकबंदी की योजना से आज भी पूरा गांव वंचित है. ऐसा ही एक ही एक गांव है उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती तहसील हर्रैया में मौजूद गांव त्रिलोकपुर शुक्ल. जहाँ आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी आजतक चकबंदी का कहीं नामों निशां नहीं है. किसानों से भरा पूरा ये गांव आज भी छोटे-छोटे हिस्सों में खेती के लिए जाना जाता है.

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ऐसे में खेती से न तो मुनाफा निकल पाता है ना ही अब लोगों के मन को खेती भा रही है. जिसकी बस एक वजह है और वो हैं टुकड़ों में बटे किसानों के खेत। ऐसे में इस गांव के अधिकतर ग्रामीणों ने खेती छोड़ दी है. सभी किसान अब गांव से बाहर निकलकर नौकरी कर रहे हैं.

गांव के ही रहने वाले एक किसान राम नारायण बताते हैं कि, “साल 1972 के समय में हमारे यहाँ भी चकबंदी का दौर शुरू हुआ था. उस समय हमारे आस पास शिवजोत, हर्रैया तिवारी से लेकर पूरे इलाके में मौजूद सभी गांवों में की गई. लेकिन न जानें क्यों चकबंदी की नाप हमारे गांव तक नहीं पहुंच सकी.

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तब से लेकर अब तक हमारा पूरा गांव चकबंदी की आस लगाए बैठा है.” वहीं गांव के ही रहने वाले एक किसान का कहना है कि, “गांव में चकबंदी के लिए हमारी तरफ से कई बार जिला मजिस्ट्रेट को लैटर लिखा गया है. गांव के किसान और सदस्य कई बार जिला कलैक्ट्रट के पास भी गए हैं. लेकिन उन्हें आज तक सांत्वंना के अलावा कुछ नहीं मिल पाया है.”

हर्रैया तहसील का त्रिलोकपुर शुक्ल गांव ही एक ऐसा गांव नहीं है जो पिछले सात दशकों में चकबंदी से अछूता है. इसी तरह पूरे राज्य में अभी भी लगभग 1,10,299 राजस्व गांवों ऐसे हैं. जो चकबंदी की प्रक्रिया से अधूरे हैं. वहीं एक रिपोर्ट की मानें तो लगभग पिछले पांच सालों से 5 गांवों की चकबंदी की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है. हालांकि किसानों के बीच समझौते की समस्या, गांवों में लड़ाई और आपसी झगड़ों के चलते ये काम अधूरा ही रह जाता है.

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आज बात चाहें लॉकडाउन की हो, या फिर देश की इतनी बड़ी आबादी का पेट भरने की, हर जगह किसानों के ही उगाए अनाज से देश की जनता का पेट पल रहा है. किसानों को जहां अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है. वहीं चकबंदी न होने की भी वजह से किसानों को जोत में तमाम मुश्किलात का सामना करना पड़ता है. ऐसे में अब ये देखने वाली बात होगी कि, कितने समय में इस गांव में चकबंदी का सिलसिला शुरू होता है. ताकि इस गांव के किसानों को भी एक मुश्त जमीन मिलने के साथ, ये किसान बेहतर खेती कर सकें.

Writer : Producer & Anchor – शुभ शुक्ला

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