December 3, 2022

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हां सही सुना ! अब दहाड़ते हुए लौटने लगे हैं कश्मीरी पंडित

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कश्मीरी पंडितों की वो असहनीय पीड़ा जिसके बारे में तीन दशक तक किसी ने बात ही नहीं की। अगर किसी ने इस बारे में कुछ कहा भी तो बेहद दबी जुबान से, डरते हुए और लाग लपेट के साथ कहा ताकि उसपर उंगलियां ना उठे कि वो शांति भंग कर रहा है। जब भी कश्मीर में पथ्थरबाजों को पकड़ा गया या फिर इंटरनेट बंद किया गया तो बड़े बड़े राजनीति के विशेषज्ञ, फेंसी पत्रकार हो या बॉलीवुड के ढोल हो, सब के सब कश्मीर में रहने वालों के लिए आंसू बहाने लगे। कोई ट्विटर पर ज्ञान पेलता तो कोई तख्तियां गले में टांग के फटे ढोल की तरह चीखता फिरता। मगर इस बीच वो कश्मीरी पंडित जो हर साल पलायन दिवस मनाते थे जो बार बार दबी जुबान से अपने हक़ की बात करते थे उनके लिए कोई सहानुभूति तक नहीं दिखाई गई। सरकार आई गई मगर इस मुद्दे से सब पल्ला झाड़ते हुए पतली गली पकड़ कर निकल गए।

हाँ मगर बीजेपी की सरकार ने जो कदम उठाया वो क़ाबिले तारीफ था और अब हैरानी हो रही है कि जो काम सरकार, कई संस्थाएं और खुद लाखों विस्थापित कश्मीरी पंडित नहीं कर पाए वो काम एक फिल्म ने कर दिया। पिछले दिनों में क्या एकता दिखाई है लोगों ने कश्मीरी पंडितों के लिए, उनके दर्द को ना सिर्फ लोगों ने सुना और देखा बल्कि महसूस भी किया। उस तड़प उस चीख के बदले में सबका दिल रोया कि हमने कश्मीरी पंडितों के लिए इतने साल बीत जाने के बाद भी कुछ किया क्यों नहीं ? काश की हम उस वक़्त होते और कुछ कर पाते। वैसे अगर उस वक़्त सोशल मीडिया होता तो यक़ीनन पूरा देश ही कश्मीर में दिखाई देता। मगर अफ़सोस कि उस वक़्त कश्मीरी पंडितों की मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। जनवरी 1990 में घाटी में 75,343 परिवार थे मगर इसी साल 70,000 से ज्‍यादा परिवारों ने घाटी को छोड़ दिया। इससे भी पेट ना भरा तो आतंकियों ने 1990 से 2011 के बीच 399 कश्‍मीरी पंडितों की हत्‍या कर डाली। अब पिछले 30 सालों के दौरान घाटी में बमुश्किल 800 हिंदू परिवार बचे हैं। आप समझ रहे हैं कि 75,343 परिवार से बस 800 हिन्दू परिवार ही अब बचे हैं। 20वीं सदी की शुरुआत में लगभग 10 लाख कश्‍मीरी पंडित थे। आज की तारीख में 9,000 से ज्‍यादा नहीं हैं। सोचिए किसी समुदाय की आबादी 10 लाख से घटकर 10 हजार रह गई और अब भी बुद्धिजीवी इसे नरसंहार मानने को तैयार नहीं थे।

मगर इस बीच एक अच्छी ख़बर ये भी है कि पिछले सैलून में बदलाव की बयार यहां जरूर बही है। क्योंकि दक्षिण कश्मीर अब एक नए युग का गवाह बनने जा रहा है। जी हाँ, सही सुना आपने कि अनंतनाग जिले के गांव ‘मटन’ में डेढ़ दर्जन से ज्यादा कश्मीरी पंडित नए घर बना रहे हैं। कुछ घरों का काम पूरा हो गया है और कुछ घरों में निर्माण चल रहा है। ये घर सालों से खराब हालत में थे और अब आखिरकार ऐसा लग रहा है कि ये घर भी दोबारा ख़ुशी से चहक उठे हैं। ये वही घर हैं जिन्हे छोड़कर कश्मीरी पंडितों को रातों रात भागना पड़ा था। जब इस गांव में भी हिंसा भड़की थी तब लगभग 200 घरों को जला दिया गया था। मगर अब सब तो वापस नहीं आए मगर हाँ 15 कश्मीरी पंडित परिवार अपने घरों में वापस आ गए हैं। मटन गांव में सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडितों की वापसी हुई है। इससे भी अच्छी बात ये है कि स्थानीय मुस्लिम परिवार इन कश्मीरी पंडितों के घरों को बनवाने में मदद भी कर रहे हैं और उनके आने की ख़ुशी में स्वागत की तैयारी भी। चलो देर से ही सही मगर कश्मीरी पंडित अपने घरों को तो लौट रहे हैं। फिलहाल कश्मीर में लौटने की संख्या भले ही अभी कम हो मगर हां ये तो आप मान लीजिए कि ये शुरुवात बड़ी है।

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