February 21, 2024

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समाज मे आज भी अछूत है, पीरियड के दौरान महिलाएं।

मासिक धर्म
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महिलाओं मे मासिक धर्म एक शारीरिक क्रिया है, जो कि उनके किशोरावस्था मे आते ही शुरू हो जाती है। और अधेड़उम्र तक चलती है। हालांकि यह कोई बिमारी नहीं है बल्कि शरीर मे होने वाली अन्य क्रियाओं की तरह एक और शारीरिक क्रिया है। लेकिन हमारे समाज में आज भी कई जगहो पर इसे छुआछूत माना जाता है।

एक परिक्षण के मुताबिक हर 10 मे से 8 औरतो का उनके मासिक धर्म के दौरान मंदिरो मे प्रवेश निषेध होता है। जबकि हर 10 मे से 6 महिलाओ को रसोईघर मे नही घुसने दिया जाता है। व प्रत्येक 10 मे से 3 लड़कियों का रजाधर्म चक्र के चलते किसी अन्य समान को छुने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

जी हां, यह वही समाज है जहां बच्चे की आस तो हर व्यक्ति को होती है लेकिन उससे जुड़े विषयो पर बात करने मे भी लोग शर्म महसूस करते है। महिलाओ मे मासिक धर्म की क्रिया उनके गर्भवती होने का एक विशेष कारण है। और हमारे समाज मे इसे छुआछूत की निगाहों से देखा जाता है।

लोगो ने यह धारणा बना ली है कि इस दौरान महिलाएं अशुद्ध हो जाती है, उनके छूते ही कोई वस्तु अशुद्ध या खराब हो सकती है। जबकि पढ़े लिखे लोग अब इन अवधारणाओं को पीछे छोड़ बहुत आगे निकल चुके है। और इसका कारण खुद महिलाओ का कामकाजी व पढ़ा लिखा होना है।

केवल एक शारीरिक क्रिया का हिस्सा है महिलाओं मे रजोधर्म चक्र।

  • माहवारी के दौरान महिलाओं पर पाबंदियां लगाना कोई वैज्ञानिक आधार नही है। समाज में सदियों से चली आ रही कूरीतियां ही इसकी मुख्य वजह है।
  • विज्ञान की दृष्टि से देखें तो मासिक धर्म गर्भाशय की आंतरिक सतह एंडोमेट्रियम के टूटने से होने वाला रक्त स्राव है। गर्भधारण करने के लिए इस प्रक्रिया का सामान्य होना आवश्यक है ।
  • इस प्रक्रिया मे तीन से आठ दिनों के दौरान करीब 35 मिलीलीटर रक्त स्त्राव होता है। और इसी के साथ महिलाओ को कमजोरी व पेट के दर्द जैसी समस्याओ का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन बहुत ज्यादा रक्त स्राव की स्थिति में स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
  • शर्म के कारण कई इलाको मे लड़कियां सैनिटरी पैड दुकानों से खरीदने की बजाय कपड़े का इस्तेमाल करना बहतर समझती है। परंतु यह उनकी स्वच्छता व स्वास्थय दोनो के हानिकारक साबित हो सकता है। विशेषयज्ञो की माने तो इस दौरान महिलाओ को अपनी स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  • पिछड़ा समाज व कई ऐसे स्थान है जहां पर मासिक प्रक्रिया पर बात करना भी बेशर्मी माना जाता है। लोग इन विषयो पर बातचीत करने मे शर्म महसूस करते है।

लेकिन अब महिलाओं के पढ़े लिखे होने से वे खुद इन क्रूर रीति- रिवाजो से बाहर निकल कर अपने हक की लड़ाई लड़ना शुरू कर रही है। और आशा है, कि जल्द हमारा समाज भी इन कूरीतियो को पीछे छोड़ सही गलत के बीच के फर्क को समझना शुरू करेगा।

 

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