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बिहार का वो गांव, जो दे रहा इंसेफेलाइटिस (चमकी) को भी दे रहा मात, बस कुछ लोगों ने किया कमाल

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इंसेफेलाइटिस (चमकी

बिहार का वो गांव, जो दे रहा इंसेफेलाइटिस (चमकी) को भी दे रहा मात, बस कुछ लोगों ने किया कमाल

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मई बीता और जून महीने का आगाज़ हुआ, और इस आगाज़ के साथ बिहार राज्य में ख़ौफ का एक माहौल बना, जिसका नाम है चमकी जिसने अभी तक लगभग 135 जिंदगियां अपने आगोस में खींच ली है. आलम ये है कि शहर में एक शव के साथ कुछ परिजन एंबुलेंस के साथ निकल रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ से रोते-बिलखते परिजन अपने बच्चे को अस्पताल ले जा रहे हैं और अगर उनकी उम्मीदों की बात करें तो शायद न के बराबर…तभी तो अब तक लगभग 135 मौतें और न जानें कितने बच्चे बिस्तर पर पड़े-पड़े चमकी से बच निकलने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

खैर ये तो हकीकत है, जो हर इंसान के सामने है, हालांकि एक हकीकत और भी है…जिस पर शायद अभी तक लोगों का ध्यान नहीं गया है. आपको बता दें कि भले ही इस समय चमकी से हर इंसान ख़ौफजदा है, लेकिन मुजफ्फरपुर के चंद्रहट्टी के लोग इस बिमारी से न तो ख़ौफ में हैं और न ही इस बिमारी से ड़रे हैं, क्योंकि उन लोगों ने चमकी के खिलाफ अभियान छेड़ा है. जिसके चलते इस गांव के बाहर ही चमकी के कदम ठिठक कर रूक गए हैं.

चमकी यानि की इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम 90 के दशक में शुरू हुआ बिमारी का सिलसिला आज तक न जानें कितने बच्चों को काल के गाल में समा चुका है. इस बिमारी से हर साल बच्चे मरते हैं. परिजन रोते हैं, बिलखते हैं और फिर कुछ समय बाद भूल जाते हैं. लेकिन इस बिमारी के खिलाफ कोई खड़ा नहीं होता. लेकिन, चंद्रहट्टी ने इस बिमारी के खिलाफ जंग लड़ने की शुरुवात की है. मुजफ्फपुर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर बसा गांव चंद्रहट्टी कुढ़हनी ब्लॉक के अंतर्गत आता है. आपको बता दें कि, जिस समय चमकी बुखार का सिलसिला पूरे राज्य में शुरू हुआ उसी समय चंद्रहट्टी गांव का अभियान शुरू हुआ.

क्योंकि इस गांव के लोगों का मानना है कि, इसका दोष महज सरकार को देने से बेहतर है की खुद इसके खिलाफ खड़े होकर बचाव करें ताकि कोई भी चमकी के चलते अपनी जिंदगी न गंवाए. जाहिर है आज के समय में गांवों की अधिकतर बिमारी झोला छाप डॉक्टरों से ही ठीक होती है. क्योंकि कोई भी इंसान छोटी मोटी बिमारी के चलते कभी अस्पताल या कहीं और नहीं जाता, यही वजह है की आज के समय में झोला छाप डॉक्टरों का पूरा नेटवर्क बना हुआ है और इसी का फायदा उठाते हुए चद्रंहट्टी के लोगों ने अपने अभियान की शुरुवात की.

गांव के लोगों ने इस अभियान को दो चरण में बांटते हुए लोगों को इस बिमारी के खिलाफ लड़ना सिखाया.

पहला चरण-

गांव में प्रचार

पहले चरण में यहां के लोगों ने बिहार सरकार की तरफ से जारी एसओपी जोकि 10 पेज का इंस्ट्रक्शन है, उसे पढ़ा और जिसमें बिमारी के बचाव से लेकर बिमारी के लक्षण तक की जानकारी थी. उसके बाद उसका प्रिंटआउट निकाल कर छोटे छोटे समूहों में अपने आस पास पंचायतों में भेज दिया.  इसके साथ गांवों के लोगों ने इसके बारे में गांवों के आस पास मौजूद डॉक्टरों को भी इसकी जानकारी दी.

आपको बता दें की गांव के लोगों ने पहले चरण की शुरुवात जून महीना आते ही कर दिया था, क्योंकि गांव के लोगों इस बिमारी से हर साल होने वाली मौत से वाकिफ हैं. यही वजह रही की गांव के जागरूक लोगों ने इस बिमारी के खिलाफ पहले चरण की शुरुवात जून के शुरुवाती समय में ही कर दी.

दूसरा चरण-

ऑटो से प्रचार

इसके बाद दूसरे चरण में गांव के लोगों ने गाड़ी के साथ इस बिमारी से बचाव की जानकारियां देनी शुरु कि, गाड़ी गांव-गांव एनाउंस करते हुए आगे बढ़ती जाती थी, जिससे ये बात सभी लोगों तक पहुंच पाती थी. जाहिर है ये बिमारी उन लोगों में ज्यादा फैल रही है तो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं जिनके आस-पास गंदगी फैली हुई रहती है. इसलिए गाड़ी को उन बस्तियों में रोककर जानकारी को तीन से चार पर दोहराया गया.

इस दौरान गांव वालों ने बताया कि, हमने बिहार सरकार की तरफ से जारी 10 पन्ने के मैटर को अपने पैम्पलेट के तौर पर डिजाइन किया, जिसमें इसकी जानकारी एक-एक लाईन में दी गई है. ताकि लोगों को समझने में आसानी हो सके. हमने लोगों को जानकारी देने और उनको हमारी बात समझने पर जोर दिया है.

यही वजह है कि, इस समय गांव के हर लोग ने इस काम को शुरु कर दिया है…क्योंकि उन्हें मालूम है की ये बिमारी इसी साल नहीं हर साल आती है और लोगों को इसके खिलाफ जागरूक करना है ताकि हर साल की तरह सैकड़ो हजारों बच्चे इस बिमारी की चपेट में न आए.

 

 

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