Wed. Jul 17th, 2019

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31 बाघ और चीतों को मारने वाला जिम कॉर्बेट, कैसे उन्हें बचाने की दुहाई देने लगा?

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31 बाघ और चीतों को मारने वाला जिम कॉर्बेट

31 बाघ और चीतों को मारने वाला जिम कॉर्बेट, कैसे उन्हें बचाने की दुहाई देने लगा?

एक ऐसा शिकारी जिसने अपने शुरुवाती दिनों में बहुत से बाघ, चीतों का शिकार किया. लेकिन अचानक इन बेजुवानों को बचाने का प्रयास भी करने लगा. उन पर किताबें लिखने लगा. जिसकी वजह से उत्तराखंड में एक पार्क का नाम  जिम कॉर्बेट के नाम पर रख दिया गया. क्योंकि जिम जो भी करते हैं, जानवरों कों और जंगलों के लिए करते हैं. जिम कॉर्बेट की शिकारी बनने की वजह लोगों को बाघों चीतों से बचाने का था. लेकिन धीरे धीरे जिम ने बाघों को इंसान से बचाने के प्रयास तेज कर दिये. कभी ब्रिटिश आर्मी में कर्नल के रैंक पर रहने वाले जिम कॉर्बेट का पूरा नाम जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट है. जिम को यूनाइटेड प्रोविंस में इसलिए बुलाया गया था. ताकि वो इन जानवरों से लोगों की रक्षा कर सकें. इन्होनें साल 1907 से लेकर 1938 के अपने शिकार के दिनों में कुल 19 बाघों और 14 चीतों का शिकार किया था.

जिम का जन्म 25 जुलाई 1885 को क्रिस्टोफर कॉर्बेट के घर हुई थी. ये कुल 16 भाई बहन थे. बचपन से पहाड़ों और जंगलों में रहने की वजह से इन्हें जानवरों और जंगलों से काफी लगाव हो गया था. ये बचपन से ही जानवरों के काफी करीब थे. जिसके चलते ये जानवरों की आवाजों से जानवरों को पहचान जाते थे. बचपन में ही इनके पिता की मौत हो गई, उस समय ये बस 6 साल के थे. जिम पढ़ाई में ज्यादा अच्छे नहीं थे. जिसकी वजह से 19 साल की ही उम्र में जिम ने पढ़ाई छोड़ दी और रेलवे में नौकरी करने लगे.

जिम कॉर्बेट का बाघों का शिकार कनेक्शन-

गुलाम इंडिया में यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) के लोग यहां के आदमखोर जानवरों से काफी परेशान थे. जिसकी वजह से करीबन 1200 लोग इन जानवरों का शिकार चुके थे. उस समय तक जिम कॉर्बेट का नाम गिन चुने शिकारियों में होता था. इसलिए इनको इंडिया बुलाया गया. यहां आकर उन्होनें हालात का जायज़ा लिया तो स्थिति वाकई काफी खराब थी. वहीं जिम कॉर्बेट के बारे में कहा जाता था की वो केवल आदमखोर जानवरों का ही शिकार करते थे. लेकिन जिम को सरकारी आंकड़ों के लिहाज से गलत बताया जाता रहा है. सरकारी कागजात में जिम को चंपावत बाघिन, चावगढ को उसके बच्चों के साथ, पनार चीता, ठक आदमखोर चीता, चूका बाघिन रुद्रप्रयाग का आदमखोर चीता, मोहन आदमखोर चीता और ना जाने कितने बाघ और चीतों की थी. वहीं उन्होनें एक बैचलर ऑफ पॉवलगढ़ का शिकार किया था, जिसका कोई भी सरकारी रिकार्ड नहीं है कि वो आदमखोर था. जिसकी वजह से जिम कार्बेट विवादों के घेरे में आये थे.

जिम बाघों और चीतों का शिकार करने के बाद उनके अपने घर ले जाते थे, जहां उनकी जांच-पड़ताल करते थे. उसके बाद उनकी खाल को उतार कर अपने घरों की दीवालों पर लगा देते थे. लेकिन एक ऐसे ही शिकार के बाद जब वो जानवर को अपने घर जांच के लिए लेकर गये तो उनको उसके बारे में कुछ ऐसा पता की जिम कॉर्बेट ने शिकार करना ही बंद कर दिया.

जिम कार्बेट ने एक बाघ के जांच के दौरान पाया की उसकी शरीर पर काफी सारे घाव के निशान हैं. जिसमें कुछ घाव के निशान गोली लगने से वहीं कुछ तीर लगने की वजह से हुए थे. जिम समझ गये की जानवरों का आदमखोर होना हमारी ही गलती है. हम ही जानवरों को आदमखोर बनने पर मजबूर करते हैं. जिससे वो लोगों को चिढ़ते हैं और उन पर हमला करते हैं.

इसके बाद जिम ने ये ठान ली की सुरक्षा की ज्यादा जरुरत इंसानों को नहीं बल्कि जानवरों को इंसान से है. जिसके लिए उन्होनें यूनाइटेड प्रोविंस में अपनी पहचान और सिफारिश का इस्तेमाल करके एक पार्क का निर्माण करवाया. जो केवल जीवों के लिए था. जिसका नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था. लेकिन बाद में इस पार्क का नाम बदल कर जिम कॉर्बेट रख दिया गया. जिसके बाद 1968 में इंडो-चाइना मूल के बाघ की प्रजाति ‘पंठेरा टिगरिस कॉर्बेटी’ का नाम भी जिम कॉर्बेट के ही नाम पर रखा गया.

इसके अलावा जिम कॉर्बेट ने कई किताबों के माध्यम से अपने अनुभवों को लोगों के साथ साझा किया है. उन्होनें कई किताबें लिखी. जिसमें ‘मैन-ईटर्स ऑफ़ कुमाऊं’, ‘जंगल लोर’,  ‘माय इंडिया’, ‘जिम कॉर्बेट्स इंडिया’ और ‘माय कुमाऊं मुख्य हैं वहीं उनकी एक किताब ‘जंगल लोर’ को उनकी ऑटोबायोग्रफी भी माना जाता है. इसके अलावा जिम बच्चों को क्लासेज दिया करते थे. जिसमें जिम बच्चों को नेचुरल हेरिटेज और उसके संरक्षण के लिए बच्चों को प्रेरित करते थे.

जिम कॉर्बेट भारत की आजादी के पहले भारत में आये थे, और यहीं के होकर रह गये. अपनी बहन मैगी के साथ जिम नैनीताल के ‘गर्नी हाउस’ में रहते थे. लेकिन भारत के आजाद होने के बाद जिम केन्या चले गये. जहां जिम पेड़ों में झोपडी बनाकर रहते थे. साल 1952 में जिम से मिलने के लिए खुद ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ उनके ट्री हाउस में गई थी. केन्या आने के बाद भी जिम ने अपना लेखन कार्य जारी रखा था. साल 1928 में जिम को ‘कैंसर-ए-हिंद’ मेडल से भी सम्मानित किया गया था. जिम के जीवन पर कई फिल्मों भी बनाई गई. जिसमें बीबीसी की बनाई डॉक्यूड्रॉमा ‘मैन ईटर्स ऑफ इंडिया’ और आईमैक्स मूवी ‘इंडिया-किंगडम ऑफ टाइगर’ फिल्में शामिल हैं.

जिम ने कुल मिलाकर 6 किताबें लिखी जिसमें 6वीं किताब ट्री टॉप्स उनकी आखिरी किताब थी. जिम के किताबें, उनकी बंदूक और उनका ट्री हाउस आज भी लोगों के लिए संग्रहालय में रखे हुए हैं.

 

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