हुनमान बेनीवाल- बीजेपी से निश्कासित बेनिवाल राजस्थान में बनाएंगे तीसरा मोर्चा

हुनमान बेनीवाल

जैसे जैसे चुनावों की तारीख पास आ रही है वैसे वैसे चुनावी अखाड़े में एक एक सूरमा अपना करतब दिखा रहे हैं। इसी तरह राजस्थान की राजनीति में भी आये दिन कुछ ना कुछ अलग देखने को मिल रहा है। जाहिर है, आने वाली 7 दिसंबर को राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में हर पार्टी यहां तक की निर्दलीय विधायक भी अपना अपना जोर आजमा रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं हनुमान बेनीवाल। हुनमान बेनीवाल की अगर बात करें, तो किसी जमाने में ये बीजेपी में हुआ करते थे। लेकिन 2011 में बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निश्कासित कर दिया और आज हुनमान बेनीवाल राजस्थान में तीसरा मोर्चा बनानें जुटे हुए हैं।

बात उस समय की जब 2008 में हुनमान बेनीवाल राजस्थान की खींवसर सीट से चुनाव जीते थे। हालांकि, इस दौरान उनकी पार्टी बीजेपी विधानसभा में महज 78 सीटों पर सिमट गई थी। यूं तो चुनाव से पहले ही बीजेपी में पर्याप्त खेमेबाजी थी लेकिन चुनाव में मिली हार ने इसे और मजबूती के साथ सतह पर लाकर पसार दिया। उस समय प्रदेश बीजेपी में दो बड़े धड़े हुआ करते थे। पहले धड़े की कमान वसुंधरा राजे के हाथ में थी और दूसरे धड़ेका नेतृत्व कर रहे थे घनश्याम तिवाड़ी, जसवंत सिंह, गुलाबचंद कटारिया जैसे नेता हनुमान बेनीवाल हालांकि दोनों में से किसी भी खेमे के झंडाबदार नहीं बने, लेकिन विधायक बनने के बाद से ही उनके वसुंधरा राजे के साथ संबंध खास अच्छे नहीं रहे।

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इसकी वजह थे पार्टी में एक बड़े नेता युनूस खान। यूं कहें बेनीवाल और युनूस खान की कभी बनती नहीं थी। युनूस 2003 से 08 के बीच राजे सरकार में मंत्री हुआ करते थे। 2008 के विधानसभा चुनाव में वो नागौर की डीडवाना सीट से चुनाव हार गए। इसके बावजूद संगठन में उनका रौला जस का तस कायम रहा। हनुमान बेनीवाल और युनूस खान एक ही जिले से आते थे। दोनों की अदावत तब से थी जब बेनीवाल बीजेपी में नहीं हुआ करते थे। युनूस खान वसुंधरा के खाससिपहसालार माने जाते हैं। युनूस के विरोध में खड़े बेनीवाल खुद-ब-खुद वसुंधरा के खिलाफ खड़े हो गए। तकरीबन 3 साल चली यह खींचतान 2011 के आखिर में आते-आते निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई।

2 दिसंबर 2011- महाराजा कॉलेज का नया छात्रसंघ चुना जा चुका था। नए चुने गए पदाधिकारियों ने अपने स्टूडेंट यूनियन ऑफिस के उद्घाटन के लिए उस नेता को बुलावा भेजा, जिसने इसी स्टूडेंट यूनियन ऑफिस से सियासत का पहलाडग भरा था. 17 साल के बाद हनुमान बेनीवाल एक बार फिर से अपने कॉलेज में थे. उन्होंने एक बार फिर से छात्रनेता के अंदाज में भाषण देना शुरू किया। अगले दिन हनुमान बेनीवाल अखबार के पहले पन्ने पर थे। इन खबरों के मुताबिक हनुमान बेनीवाल ने महाराजा कॉलेज में दिए गए भाषण में वसुंधरा राजे को भ्रष्टाचार की देवी कहा, इसके अलावा उन्होंने राजेंद्र राठौड़ और लालकृष्णआडवाणी के बारे में भी तल्ख जबान का इस्तेमाल किया था। वैसे तो बेनीवाल 2010 से ही बागी तेवर अपनाए हुए थे, लेकिन इस बार वो सीमा लांघ गए थे। जिसके बाद उन्हें पार्टी में रखना बीजेपी के लिए शर्म का बायस बन जाता।

जिसके चलते बीजेपी ने उन्हें निष्काषित कर दिया। बीजेपी से बाहर निकलने के बाद हनुमान बेनीवाल ने अपने विधानसभा क्षेत्र पर फोकस करना शुरू किया। वो ज्यादा से ज्यादा आदमियों से मिलते, उनकी समस्या सुनते और उसे दूरकरने की कोशिश करते, अपने जनसंपर्क अभियानों के दम पर उन्होंने जनता के अंदर यह भरोसा पैदा कर दिया कि वो हर आदमी की पहुंच में हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जबरदस्त लहर में भी वो24,000 के बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे।

3 सितंबर 2015. अपनी एक पेशी पर डीडवाना कोर्ट आया कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह नाटकीय तौर पर जेल से फरार हो गया. वही आनंदपाल जो जीवन राम गोदारा के कत्ल का मुख्य आरोपी था. आनंदपाल की फरारी की वजह सेजाट समुदाय गुस्से से भरा हुआ था. 2006 से बेनीवाल जीवन राम गोदारा को न्याय दिलवाने के आंदोलन से जुड़े हुए थे. ऐसे में उन्होंने विधानसभा के भीतर इस मुद्दे को बड़े जोर-शोर के साथ उठाया…..यही वजह है कि बेनीवाल इस समय पूरे राजस्थान में छाये हुए हैं क्योंकि उन्हें राजस्थान के जाट समुदायों का पूरी तरह समर्थन प्राप्त है

किसी जमाने में नागौर में एक नेता करते थे। नाथूराम मिर्धा. कुचेरा के रहने वाले मिर्धा 1957 में पहली बार नागौर के विधायक बने थे। 1971 से 1996 में अपनी मौत तक वो लगातार नागौर से सांसद रहे. इलाके के लोग आज भी उन्हेंनाथू बाबा के नाम से याद करते हैं. उनके बारे में एक किवदंती है कि अगर गरीब से गरीब किसान एक पोस्टकार्ड पर अपनी समस्या लिखकर उनके पते पर भेज देता था तो वो समस्या हल हो जाती थी. जनता से अपने जुड़ाव की वजह केचलते वो अपनी मौत के दो दशक बाद भी जनता में उतने ही लोकप्रिय हैं. 2009 में जब नाथूराम मिर्धा की पोती डॉ. ज्योति मिर्धा नागौर से लोकसभा का चुनाव जीतने आई थीं तो उन्होंने नारा दिया, “बाबा की पोती, नागौर की ज्योति.”ज्योति मिर्धा भले ही नाथूराम मिर्धा की सियासी वारिस हों, लेकिन बेनीवाल नाथूराम मिर्धा की राजनीतिक परम्परा से आने वाले राजनेता हैं।

आज नागौर के हर इंसान के पास हनुमान बेनीवाल का नंबर है। सबका फोन वो खुद उठाते हैं। अगर नहीं उठा पाते तो पलटकर फोन करते हैं. आपको पुलिस वाले ने रोक रखा है, पटवारी बदमाशी कर रहा है, तहसील में कोई काम नहीं मिलरहा, बिजली-पानी का कनेक्शन नहीं मिल रहा, लोग बिना झिझक उन्हें फोन करते हैं और काम हो जाता है.

जनता से उनका कनेक्ट कमाल का है. बेनीवाल आपका नाम याद रखते हैं. हर बार मिलने पर आपका हाल-चाल पूछते हैं. वो देहात से आने वाले नौजवान में यह भरोसा पैदा करने में कामयाब हुए हैं कि अगर कोई दिक्कत आती है तो वोअकेला नहीं है. वो जोशीले भाषण देते हैं. बीजेपी और कांग्रेस को खुलकर लताड़ते हैं. उनके भाषणों का यह अंदाज ख़ास तौर पर पसंद किया जाता है. लोगों के दिमाग में उनकी छवि “खुलकर बोलने वाला नेता” की है.

शायद यही वजह है कि इस समय पूरे राजस्थान में हनुमान बेनीवाल छाये हुए हैं। हर नेता और राजनेता हनुमान बेनीवाल को जानता है। किसी समय में डॉ किरोड़ लाल मीणा के साथ हनुमान बेनीवाल राजस्थान में तीसरा मोर्चा बनाने की तैयारी में जुटे थे। लेकिन मीणा ने बीजेपी जॉइन कर ली। जिसके बाद हनुमान बेनीवाल ने जयपुर रैली में भारतीय लोकतांत्रिक पार्टी नाम से पार्टी बना ली है. सपा और घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनीपार्टी के साथ गठबंन की घोषणा कर दी है.

वहीं पॉलिटिकल पंडितों की माने तो जाट जैसी बड़ी जाति के वोटों में सेंध लगने से दोनों बड़ी पार्टियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

 

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