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देसी सीड ड्रिल मशीन बनाकर गांव-गांव मशहूर हुआ ये किसान

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देसी सीड ड्रिल मशीन

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इंसान के कई शौक आपने सुने होंगे। लेकिन किसानी का शौक थोड़ा नया है। जी हां, ऐसा ही एक शौक 60 वर्ष के गंगा शंकर को भी है। बढ़ईगिरी का काम करने वाले गंगा शंकर के पास खुद एक इंच भी जमीन नहीं है। लेकिन उन्हें खेती-किसानी का शौक इस कदर है। कि, उन्होंने दूसरों के खेत बटाई पर ले रखे हैं। इतना ही नहीं, वे उनके खेतों में हमेशा नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। लेकिन उनके इन्हीं प्रयोगों से उन्होनें कबाड़ में पड़े साइकिल के पहिए और फ्रीव्हील को देसी हल में जोड़कर आधुनिक देसी सीड ड्रिल मशीन तौयार कर दी।

बता दें, कि जिले के बछरावां ब्लॉक से नौ किलोमीटर पश्चिम में एक छोटे से गाँव कुसेली खेड़ा में रहने वाले गंगा शंकर इन दिनों क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। शंकर का कहना हैं, “हमारा पुश्तैनी काम बढ़ई का है।  लेकिन मुझे बचपन से ही खेती किसानी का शौक रहा है। मेरे पास खुद की जमीन नहीं है। लेकिन शौक को पूरा करने के लिए मैनें कुछ लोगों से बटाई पर खेती ले रखी हैं। खेती-किसानी में रुचि के कारण मैं हमेशा किसान गोष्ठियों में जाया करता हूं। और वहीं जाकर मुझे पता चला, की फसल वैज्ञानिक पद्धति से क्रमबद्ध तरीके से बुवाई की जाए। तो खाद बीज की लागत कम होगी और फसल की उपज भी बढ़ेगी।”

गंगा शंकर बताते हैं, कि एक दिन गोष्ठी से वापस लौटने के बाद रात का खाना खाकर सब सो गए पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। क्योंकि मुझे इस बार क्रमबद्ध तरीके से फसल की बुवाई करनी थी। और उसके लिए सीड ड्रिल मशीन चाहिए थी। पर मशीन खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। अगर मशीन खरीद भी ले। तो उसे चलाने के लिए ट्रैक्टर कहां से लाऊंगा। इसी उधेड़-बुन में मुझे रात भर ठीक से नींद नहीं आई। सुबह उठा और मायूस मन से अपने बैलों को चारा पानी देने लगा। अचानक मेरी निगाहें पास में ही रखे हल पर पड़ी। मुझे मेरे हल में ही सीड ड्रिल मशीन दिखने लगी। अपने देसी हल को घंटो निहारने के बाद मैंने फैसला किया। कि मैं अपने देसी हल को आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में बदल कर रहूंगा। मेरे पास केवल एक फ़र वाला हल था। जिस पर मैंने अपना पहला प्रयोग किया। प्रयोग के लिए मैंने कबाड़े में पड़ी साइकिल का पहिया और फ्रीव्हील निकाली। फिर आटा चक्की पर गेहूं भरने वाले बॉक्स की तरह लकड़ी का एक छोटा सा बॉक्स बनाया। कुछ महीनों के बाद मेरी देसी सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई। और मैंने उसे परखने के लिए खेत में उतारा। लेकिन कुछ समय बाद मुझे महसूस होने लगा। कि यह मशीन अभी सही नहीं है। क्योंकि इसमें समय, बीज और मजदूरों की लागत ज्यादा आ रही थी। जिससे मैं संतुष्ट नहीं था।

शंकर आगे बताते हैं, कि यंत्रकारी का गुण उनके खून में है। यंत्र बनाने की कलाकारी उन्होंने अपने पिताजी से सीखी थी। उनके पिता पूर्वी मिस्त्री के नाम से क्षेत्र में चर्चित थे। वह लकड़ी के बहुत ही बेहतरीन कारीगर थे। जब साइकिल के दाम अधिक होने के कारण बहुत कम लोग साइकिल खरीद पाते थे। तब उनके पिताजी ने लकड़ी की साइकिल बनाई थी। पिता द्वारा किए गए कार्यों से प्रेरणा लेकर गंगा शंकर हमेशा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं।

जब पहले प्रयोग से संतुष्टि नहीं मिली तो गंगा ने फैसला किया। कि अगर फ़रो की संख्या बढ़ा दी जाए तो समय और मजदूरी दोनों की बचत होगी। और वो बाजार गए और तीन फ़र वाला हल खरीद कर लाए। उसके बाद सब कुछ वैसे ही करना था। बस फ्रिवील की संख्या और बॉक्स का आकार बढ़ाना था। लगभग एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद मेरी तीन फ़र वाली देसी सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई। जिसे मैंने अपने ट्रैक्टर रुपी बैलों पर नाध खेत में उतारा। नतीजा संतुष्टि जनक मिला।

बता दें कि, बुवाई के समय अधिकतर किसान एक बीघा खेत में 50 किलो गेहूं के बीज का छिड़काव करता हैं। लेकिन देसी सीड ड्रिल मशीन से बुआई करते समय बीज और खाद को तीन-पांच के अनुपात से मिलाकर बुआई करने से 30 किलो गेहूं और 35 किलो खाद से एक बीघा खेत में बुवाई हो जाती है। क्रमबद्ध तरीके से बुवाई करने से पौधे एक निश्चित दूरी पर रहते हैं। जिससे उन्हें व्यास लेने में मदद मिलती है। और उपज में लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है।

 

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