कहीं आतंकी, कहीं पत्थरबाज कश्मीर में हर जगह इनका राज

कश्मीर

पिछले कुछ समय से देश में एक ऐसा दौर चल रहा है, जहां देश के कुछ लोगों ने अपना फोकस सरकार के साथ रखा है तो कुछ ने सरकार से अलग। सरकार कुछ करें उसे गलत ठहराने की जिम्मेदारी उन्होंने ले रखी है। सुरक्षा बल कुछ करे तो उसे गलत कहने की जिम्मेदारी उन्होंने ले रखी है। पिछले दिनों जब घाटी में एक phd आतंकवादी को सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतारा था। उस दौरान कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी ट्वीट कर कहा था कि, हमने अपने राज्य का एक अनमोल इंसान खो दिया। हालांकि इस दौरान मुख्यमंत्री को उसके हाथ में कलम की जगह बंदूक दिखाई नहीं दी थी। घाटी में रोज इसी तरह के मामले सामने आ रहे हैं। मगर अफसोस इसमें हर बार सुरक्षा बल पीछे रह जाती है और आतंकवादी कभी किसी जवान को कभी किसी पुलिस वाले को तो कभी उनके घर वालों को मार कर भाग जाते हैं और अगर गलती से कभी सीमा के जवान किसी आतंकवादी को घेर लेते हैं तो, उस दौरान उनके मसीहा अपने हाथों में पत्थर लेकर जवानों को ही मारना शुरू कर देते हैं. जिससे उन आतंकवादियों को वहां से भागने का वक्त मिल सके।

हालांकि इस दौरान अगर जवान जवाबी कार्रवाई कर देते हैं तो बुद्दजीवियों से लेकर देश के एक बड़े वर्ग को ऐसा लगने लगता है कि, ये तो उनके लोकतंत्र का हनन किया जा रहा है। ये तो उनके स्वाभिमान पर अंगुली उठाई जा रही है, बीते दिनों एक ऐसी ही घटना सबके सामने आई थी, जिसमें पत्थरबाजों के पत्थर से घायल होकर घाटी में एक जवान ने अपनी जान गंवा दी थी। हालांकि इस दौरान ना तो किसी नेता का ट्वीट आया, ना किसी बुद्धजीवी ने कोई स्वर उठाया और ना ही किसी इंसान ने उन पत्थर बाजों पर कोई लांछन लगाया,  लगाये भी तो कैसे, क्योंकि ये जैसा चाहते हैं ठीक उनके अनुरूप ही तो हुआ है।

घाटी में उनके चाहने वालों को पनाह मिली है। पत्थर बाजों के हाथ में ताकत बढ़ी है। और स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में चारों तरफ आग लगी है। सब-इंस्पेक्टर इम्तियाज अहमद मीर जिसने अपने माता-पिता से मिलने के लिए अपना पूरा हुलिया बदल डाला आतंकियों को चकमा देने के लिए अपनी दाढ़ी कटवा ली। हां लेकिन इस दौरान पत्थर बाजों ने उसे नहीं पहचाना लेकिन आतंकियों ने इम्तियाज को पहचान लिया और उसे मौत के घाट उतार दिया रविवार को जब इम्तियाज अपने घर जा रहा था उस दौरान आतंकवादियों ने घात लगाकर पुलवामा के वहीबाग में उसको गोलियों से छलनी कर दिया।

हालांकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। जब इम्तियाज का शव उसके गांव पहुंचा तो रही सही कसर पत्थबाजों ने भी पूरी कर दी। दरअसल, इम्तियाज कई दिनों से अपने माता-पिता से नहीं मिला था। शायद यही बेकरारी थी या उसकी मौत की घड़ी इम्तियाज ने अपना हुलिया बदला ताकि वो आतंकियों की नापाक नजरों से बच जाये। लेकिन आतंकियों की नजरें शायद सुरक्षाबलों से ज्यादा पैनी हो गई हैं। वहीं अगर इम्तियाज के साथियों की मानें तो, उसे उसके गांव ना जाने की कई बार धमकी दी गई थी। इनके अलावा एक सुपरवाइजिंग ऑफिसर ने बताया, मैंने उन्हें बताया कि आतंकवादी हमला कर सकते हैं इसलिए उन्हें नहीं जाना चाहिए लेकिन वह अपने माता-पिता से मिलना चाहता था। जो पुलवामा के अंदरूनी इलाके सोंटाबाग में रहते हैं.जिसके लिए उसने पहले अपना हुलिया बदला और फिर गांव जाने के लिए व्यक्तिगत वाहन का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया

इस दौरान अफसर ने बताया कि, घर जाते वक्त वो बदली हुई शक्ल के साथ आया, और कहा कि अब वो यानि की आतंकी मुझे पहचान नहीं सकेंगे’ और शायद यही उसके आखिरी शब्द थे। और वो चेहरे पर मुस्कान के साथ घर के लिए निकला था। इम्तियाज के पिता खुद रिटायर्ड पुलिसकर्मी हैं। वहीं इम्तियाज को पिछले साल कुलगाम में ट्रांसफर किए गया था। उन्हें इसी साल मार्च में सीआईडी में भेजा गया था।

इम्तियाज 2010 बैच केएसआई था। इससे पहले दक्षिण कश्मीर के गांदरबल में वह पांच साल तक तैनात रह चुका था। हालांकि बात यहां ये सामने आती है कि आखिर अपना हुलिया बदलने के बाद भी आतंकियों को ये भनक कैसे लगी की उस गाड़ी में इम्तियाज ही है। क्योंकि वो तो अभी अपने घर भी नहीं पहुंचा था। मामला जो भी हो घाटी में आतंक को लेकर और आतंकवादियों और पत्थर बाजों ने जो माहौल तैयार किया है उससे साफ लगता है कि, देश का एक ऐसा हिस्सा जो धीरे धीरे अपने हाथ से दरकता दिखाई दे रहा है। जिसके जिम्मेदार हैं वो नेता जो समय समय पर आतंकियों के समर्थन में सामने आ जाते हैं। जिसके जिम्मेदार हैं वो बुद्दजीवी जिन्हें सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर लोकतंत्र पर खतरा दिखाई देता है। फिलहाल पुलिसइस मामले की जांच में लगी है।

 

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