विश्व पर्यावरण दिवस : नहीं सुधरे तो बदलता मौसम और भी ज़्यादा तूफान, सूखा और बाढ लायेगा।

पर्यावरण दिवस : नहीं सुधरे तो बदलता मौसम और भी ज़्यादा तूफान, सूखा और बाढ लायेगा। आज विश्व पर्यावरण दिवस है और आज ही पर्यावरण पर बड़ी बड़ी बातें करना या पर्यावरण से जुड़ी जानकारियां साझा करने से कुछ लाभ नहीं मिलेगा। जरुरत है तो हर दिन पर्यावरण बचाने की, हर दिन पर्यावरण को सुरक्षित बनाने की। ये तो आप जानते हैं कि बढ़ता तापमान और बढ़ता कचरा, बढ़ता प्रदूषण सबसे बङी चुनौती है।

वैज्ञानिक ये बात एक बार नहीं अनेक बार कह चुके हैं कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा वैसे वैसे बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ती चली जायेगी। जिसकी वजह से समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा। नतीजा ये होगा कि कुछ छोटे देश और टापू डूब जायेंगे। यही नहीं लवणता बढ़ेगी तो समुद्र किनारे की कृषि भूमि कम हो जाएगी। बदलते पर्यावरण से मौसम में और परिवर्तन होंगे। ये बदलता मौसम तूफान, सूखा और बाढ लायेगा। हेमंत और बसंत ऋतु तो समझिए गायब हो जायेंगी। इसका असर सीधे सीधे खेती किसानी पर पड़ेगा और शायद ही फिर भारत कृषि प्रधान देश कहला पाए। यही नहीं खाद्यान्न के मामले में स्वावलंबी भारत जैसे देश में भी आने वाले समय में खाद्यान्न आयात की स्थिति बन जाएगी। जिन जगहों पर ना सूखा पड़ता है और ना बाढ़ आती है वो भी फिर ‘बाढ़ क्षेत्र’ और ‘सूखा क्षेत्र’ में तब्दील हो जाएगा। जब पर्यावरण में इस क़दर बदलाव होगा तो मनुष्य भी लू, हैजा, जापानी बुखार जैसी बीमारियों और महामारियों का शिकार बन जाएगा। अब ये तो आप ख़ुद भी समझदार हैं कि इन सभी कारणों से मंहगाई बढ़ जाएगी। कम से और कारणों से नहीं तो महंगाई के बारे में सोच कर तो आपको चिंता हुई ही होगी।

देश की राजधानी दिल्ली की हवा में तो इस वक़्त बीजिंग से भी ज्यादा कचरा है। भारत, भूजल में आर्सेनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड और भारी धातु वाली अशुद्धियों की तेजी से बढोत्तरी वाला देश बन गया है। भारत में हर रोज औसतन करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा निकलता है।

यदि भारत में प्रतिदिन पैदा हो रहे 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरे का ठीक से निष्पादन किया जाये, तो इतने कचरे से प्रतिदिन 27 हजार करोड़ रुपये की खाद बनाई जा सकती है। 45 लाख एकड़ बंजर भूमि उपजाऊ बनाई जा सकती है। 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज पैदा किया जा सकता है

दुनियाभर में हर सप्ताह करीब 10 लाख लोग अपनी जङों से उखड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष-2050 तक ढाई बिलियन लोग शहरों में रहने लगेंगे। जिसके बाद इस सदी का मध्य आते-आते भारत भी गांवों का देश नहीं बचेगा। ज्यादातर गांव, कस्बों में और कस्बे, नगरों मे तब्दील हो जायेंगे। जिसके बाद समस्याएं और कितनी बढ़ जाएगी इसका आप अंदाजा खुद लगा ही सकते हैं।

हर कोई ये सोचता है कि वो अकेले क्या कर सकता है मगर एक व्यक्ति अगर थोड़ा सा भी सहयोग करे तो बहुत हद तक पर्यावरण को बचाया जा सकता है। इसके लिए आपको बस इतना करना है कि बिजली के कम खपत वाले फ्रिज, बल्ब, मोटरें उपयोग करें। पेट्रोल की बजाय प्राकृतिक गैस से कार चलाएं। ऊर्जा बनाने के लिए हवा, कचरा और सूरज का उपयोग करें। फोटोवोल्टिक तकनीक अपनाएं। पानी गर्म करने, खाना बनाने आदि में कम से कम ईंधन का उपयोग करें । समझदारी और सीख यही है कि दुनिया के सभी देश धन का घमंड छोड़, पूरी धुन के साथ विकास की एक ऐसी रूपरेखा को अंजाम देने में जुट जायें जिसमें हमारा पर्यावरण, कुदरत के घरौंदें भी बच जाएं और हमारी आर्थिक, सामजिक और निजी खुशियां भी बच सकें।

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