शहीद के पिता ने लिखी राष्ट्रपति राम नाथ कोंविद को चिट्ठी, मांगी इच्छामृत्यु

राष्ट्रपति राम नाथ कोंविद को चिट्ठी

देश की सुरक्षा से लेकर देश का भार अगर कोई संभालता है तो वो है सरहद पर खड़ा जवान, हमेशा अपने परिवार की चिंता के बगैर 24 के 24 घंटे सरहद पर एक जवान इसलिए खड़ा रहता है ताकि देश के अंदर रह रहे लोग आराम से अपना जीवन जी सके. इन सबके बीच कभी कभी जवान देश की रक्षा के दौरान शहीद हो जाता है. और अपने पीछे छोड़ जाता है अपना परिवार जिसकी जिम्मेदारी कौन उठायेगा. जिसको कौन संभालेगा तो इसका जवाब होता है सरकार….

हालांकि क्या महज सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है कि सरदह पर शहीद जवान के घर वालों की देख रेख वो करे. क्योंकि सरकार तो कभी किसी के घर जाती नहीं है. ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि अगर किसी शहीद के घर वालों को कोई समस्या होती है तो उसका निदान कैसे किया जाये….क्योंकि उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में जिलाधिकारी के दुर्व्यवहार और उनके मातहत अधिकारीयों की कारगुजारी से परेशान होकर एक शहीद के पिता ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर इच्छामुत्यु मांगी है. इसके अलावा शहीद के पिता ने इस पत्र में 12 जनवरी 2019 के पहले तक समस्या का समाधान निकलने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाई है. अन्यथा पत्र में शहीद के पिता ने लिखा है कि अगर सुनवाई नहीं होती है तो मैं 12 जनवरी को अपने शहीद बेटे के समाधि स्थल पर ही समाधि ले लूंगा.

अंबेडकरनगर जिले के थाना सम्मनपुर क्षेत्र के गांव सुल्तानपुर तुलसीपुर निवासी सुरेशमन विश्वकर्मा के बेटे बजरंगी विश्वकर्मा सीमा सुरक्षा बल की 101वीं बटालियन में तैनात थे. 6 अगस्त 2010 को त्रिपुरा के नलकटा में नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में वो शहीद हो गए.

शहीद बजरंगी विश्वकर्मा के अदम्य साहस को यादगार बनाने के लिए सीमा सुरक्षा बल की 101वीं बटैलियन की बीओपी रतियापारा फारवर्ड का नाम ‘बजरंगी’ स्वीकृत कर बजरंगी विश्वकर्मा का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया गया. बजरंगी विश्वकर्मा को वीरता के लिए मरणोपरांत ‘राष्ट्रपति वीरता मेडल’ प्रदान किया गया था. यह मेडल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 30 नवंबर, 2011 को दिया था.

शहीद के पिता के अनुसार, वर्तमान जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, एसडीएम अकबरपुर, तहसीलदार अकबरपुर और थाना सम्मनपुर का रवैया उनके बेटे की शहादत पर पानी फेर रहा है. सुरेशमन विश्वकर्मा ने बताया कि जिस समय उनके शहीद बेटे का पार्थिव शरीर गांव लाया गया था, तत्कालीन जिलाधिकारी ने शहीद के नाम से स्मारक बनाने और परिजनों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की बात कही थी. स्मारक के लिए जमीन चिह्नित करके शहीद परिवार को बता दी गई, जिस पर शहीद परिवार ने निजी स्रोत से स्मारक बनवाया है लेकिन परिजनों के लिए जमीन नहीं उपलब्ध कराई गई और न ही राज्य सरकार से कोई सहायता और सुविधा प्रदान की गई.

परिजनों का कहना है कि वे डीएम से लेकर सीएम और पीएम तक से गुहार लगाते रहे लेकिन किसी ने नहीं सुनी. यहां तक कि मौजूदा बीजेपी सांसद हरिओम पांडेय और बीजेपी विधायक गोरख बाबा ने भी शहीद परिवार की सहायता के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। इन्हीं प्रयासों के बीच बीजेपी सांसद हरिओम की एक कोशिश से थोड़ी उम्मीद जगी और शहीद की पत्नी के नाम 30 जून, 2018 को पांच बिस्वा जमीन का पट्टा किया गया, मगर पट्टे से संबंधित कागजात अभी तक परिजन को नहीं दिया गया. पट्टा करने में तहसील प्रशासन ने गजब का खेल भी किया है. जिस जमीन पर शहीद के परिजनों का पुश्तैनी मकान है, उसे ही पट्टे की जमीन बता दिया गया है और बगल की बंजर पड़ी जमीन पर पैसा लेकर गांव के एक दबंग व्यक्ति का कब्जा करा दिया गया है. वह दबंग व्यक्ति आए, दिन शहीद के परिजनों को परेशान कर रहा है.
आरोप है कि शिकायत करने पर लेखपाल से लेकर डीएम तक ठीक से बात नहीं करते। अलबत्ता, डीएम ने स्वयं शहीद परिजनों के प्रति अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया। इन्हीं सब बातों से आहत और कुछ मांगों को लेकर शहीद के पिता सुरेशमन विश्वकर्मा ने राष्ट्रपति को प्रार्थना पत्र भेजकर 11 जनवरी, 2019 तक समस्या का निस्तारण किए जाने की मांग की है। पत्र में यह भी लिखा है कि यदि तय समय पर उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो 12 जनवरी, 2019 को अपने शहीद बेटे के स्मारक स्थल पर ही समाधि ले लेंगे।

ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि, जब हमारे देश के उस जवान का परिवार सुरक्षित नहीं है जो देश की 24सों घंटे रखवाली करता है. ऐसे में एक आम परिवार इस देश में कितना सुरक्षित है ये तो हर कोई जानता है.

 

 

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