लोकतंत्र की विरासत दिखाती है, भारत राजनीति की असल खूबसूरती…

लोकतंत्र की विरासत

कहते हैं जिस देश में लोकतंत्र कायम रहता है उस देश की जनता सबसे ज्यादा सुखी रहती है. क्योंकि उसे अपनी सरकार चुनने का हक होता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है आपातकाल का समय. क्योंकि देश में जब आपातकाल लगा था. उस समय हर इंसान कांग्रेस सरकार खास कर इंदिरा गांधी से नाराज था. हालांकि जब उसके बाद संसदीय चुनाव हुआ तो इंदिरा गांधी पहले से भी ज्यादा ताकतवर लहर के साथ दोबारा सत्ता पर काबिज हो गई. इसी तरह अगर देखें तो पिछले विधानसभा चुनावों में मुलायम सिहं की समाजवादी पार्टी की चाहे बात करें या फिर उससे पहले मायावती की. राज्य की जनता ने दोनों पार्टीयों को पहले भारी बहुमत से अपनाया फिर सिरे से नाकार दिया. यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती है.

इसी तरह हाल ही में आये विधानसभा चुनाव में मिजोरम और तेलंगाना के नतीजों ने भी नया इतिहास रचा दिया. क्योंकि यहां ना तो कांग्रेस की दाल गली और ना ही भाजपा की. चुनावों की ये नज़ीर साबित करती है कि हमारे देश का लोकतंत्र आज भी दुनिया के बाकी देशों से बहुत ज्यादा पारदर्शी, न्यायप्रिय और अपार शक्ति-संपन्न है।

क्योंकि हमारे देश में कभी भी धनबल, सत्ताबल, भुजबल के कोई सत्ता पर काबिज नहीं हो सकता है और जो ऐसा करने की कोशिश करता है. उससे देश की जनता अपनी आंखों की किरकिरी की तरह उसे फूंक मारकर उड़ाने में देर नहीं लगाती. हाल ही में आये पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में भी यही बात सामने आती है. हालांकि चलिए अब हम बात करते हैं मध्य प्रदेश की आलोट विधानसभा सीट के चुनाव के नतीजे की.

आज के समय में मध्य प्रदेश में भले ही भाजपा को जनता ने नकार दिया हो. वहां की गद्दी कोई अब कमलनाथ संभाल रहे हों. लेकिन रतलाम की आलोट विधानसभा सीट पर जीते मनोज चावला की कामयाबी की दास्तान इस जीत से काफी अलग है. क्योंकि विधायक मनोज के पिता रतलाम कलेक्ट्रेट में चपरासी की नौकरी करते हैं. पैंतीस वर्षीय मनोज ग्रेजुएट हैं और जब मनोज चुनावी अखाड़ें में उतरे तो उनके सामने कोई छोटा नाम नहीं था बल्कि चुनाव मैदान में उनके सामने प्रत्याशी थे. केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के विधायक बेटे जीतेंद्र गहलौत.

आलोट विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 97 हजार 892 मतदाताओं ने अपने मतों का इस्तेमाल किया, जिनमें 1 लाख 18 हजार 86 पुरुष वोटर हैं और 95,999 महिला वोटरों अपने मत का प्रयोग किया. इस सीट पर जीते मनोज कांग्रेस के प्रत्याशी हैं. जिन्हें कांग्रेस ने जीतेंद्र गहलौत के विपक्ष में मैदान में उतारा था. हालांकि कांग्रेस के पक्ष में गया यहां का चुनाव नतीजा इसलिए भी करिश्माई माना जा रहा है कि टिकट मिलने के बाद से ही पेशे से अधिवक्ता-व्यापारी मनोज चावला की सलामती के लिए कोई भी बड़ा नेता उनके इलाके में प्रचार करने नहीं पहुंचा, दूसरी तरफ जीतेंद्र गहलौत को जिताने के लिए उनके मंत्री पिता पूरे वक्त खुद तो निर्वाचन क्षेत्र में नतीजा आने तक चौबीसो घंटे डेरा डाले रहे, उनके चुनाव प्रचार में केंद्रीय गृहमंत्री  राजनाथ सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसी कद्दावर शख्सियतों की जनसभाएं हुईं.

हालांकि ये भारी  सत्ताबल भी जीतेंद्र गहलौत को जीत दिलाने में नाकाम रही और जब मतगणना हुई तो कांग्रेस प्रत्याशी मनोज चावला ने भाजपा के विधायक प्रत्याशी जीतेंद्र गहलौत को पांच हजार मतों से पछाड़ दिया.

इससे पहले वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री के पुत्र इसी जीतेन्द्र गहलौत ने कांग्रेस के प्रेमचंद गुड्डू को 7,973 वोटों के अंतर से हरा दिया था. इस बार के विधानसभा चुनाव में वह दूसरी बार एक विधायक के रूप में अपना भविष्य आजमाने उतरे थे. इससे पहले प्रेमचंद गुड्डू और उनके बेटे अजीत बौरासी कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा में चले. इसके चलते भाजपा इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो चुकी थी कि जीतेंद्र को निश्चित ही विधायक निर्वाचित कर लिया जाएगा लेकिन ऐसा महज सोचना ही रह गया. इसके साथ ये भी कहना गलत नहीं है कि भाजपा ने कांग्रेस के इस प्रत्याशी को कभी अपने प्रतिद्वंद्वी की तरह समझा ही नहीं. क्योंकि मनोज चावला की पारिवारिसक स्थिति से लेकर राजनीतिक नजरिये से बात करें तो ये दोनों ही मनोज चावला के पास बहुत कम हैं. या फिर ऐसा भी कहना गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र ने एक बार फिर दिखा दिया की कितनी खूबसूरती है. चुनाव नतीजा आने के बाद बड़े-बड़े चुनाव विशेषज्ञ भी वोटरों की ईमानदारी पर हक्के-बक्के रह गए, जबकि चावला की तरफदारी में कांग्रेस का कोई बड़ा नेता भी उन्हें ताकीद करने नहीं पहुंचा.

 

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