अर्थव्यवस्था की रफ्तार की आड़ में रोती बेरोजगारी, मोदी सरकार की नाकामी की दास्तां

अर्थव्यवस्था की रफ्तार

मोदी सरकार के मंत्री ताल ठोक कर अच्छे दिनों के जहां पहले वादे करते थे तो वहीं अब वो दावे भी करते हैं। मगर जुमले वाली ये सरकार कभी अपनी नाकामी को ना स्वीकार करती है और ना ही कभी सामने आने देती है। ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि कुछ रिपोर्ट बता रहीं हैं। दरअसल नेशनल सैंपल सर्वे यानि राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ऑफिस के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के ने भारत में बेरोज़गारी की दर 2017-18 में 6.1 फीसदी रिकॉर्ड की है जो कि पिछले 45 सालों में सबसे ज्यादा है। हमारी इस ख़बर को देखने के बाद आप भी यही कहेंगे। पूरी ख़बर दिखाने से पहले हम आपको इस रिपोर्ट से जुड़ी 10 बड़ी बातें बताते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 1972 के बाद देश में बेरोजगारी की दर अब सबसे ज्यादा हो गई है। ग्रामीण इलाकों में 15 से 29 साल के बीच के लोगों में बेरोज़गार की दर 2011-12 से बढ़कर अब 17.4 हो गई है। जबकि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में बेरोज़गारी की दर 4.8 फीसदी से बढ़कर अब 13.6 फीसदी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्र की ही बात क्या करें अगर शिक्षित लोगों की बात करें तो शिक्षित लोगों में भी बेरोजगारी की दर भी तेजी से बढ़ी है। 2004-05 के मुकाबले 2017-18 में बेरोज़गारी काफ़ी बढ़ गई है। शहरों के शिक्षित पुरुषों में भी बेरोजगारी की दर 2011-12 के 3.5-4.4 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 10.5फीसदी पहुंच गई है। वहीं 2004-05 में शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी की दर 15.2 फीसदी थी जो 2017-18 में बढ़कर 17.3 फीसदी पहुंच गई है। यानि ये बात साफ़ हो जाती है कि मौजूदा सरकार में नई नौकरियां 53% घटी हैं। आप खुद देखिए कि दोनों सरकारों में प्राइमरी 8 सेक्टर्स में मिलने वाले रोजगार का हाल कैसा रहा।

230% बढ़ी शहरी युवाओं के बेराेजगार होने की रफ्तार – मौजूदा सरकार में 15 से 29 साल के  युवाओं की औसत बेरोजगारी दर 19.22% हो गई। यूपीए-2 में यह आंकड़ा 8.37% के अंदर था। इन पांच सालों में 5% से भी कम लोग रोजगार लायक स्किल पा सके। यूपीए सरकार में 7.36 लाख औसत नईं नौकरियां सालाना पैदा हुई  जबकि मोदी सरकार में 3.50 लाख यानी 53% कम नौकरियों के अवसर पैदा हुए। मतलब अब देश में सालाना 1.2 करोड़ नौकरी यानी हर दिन 33 हजार नई नौकरियों की जरूरत है। तब जाकर बेरोजगारी दर नियत्रंण में आएगी।

सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक 57 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पिछले तीन से चार सालों में नौकरी तलाशने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बहरहाल आम जनता को ये लगता है कि मोदी सरकार ने बढ़ती हुई बेरोजगारी को कम करने के लिए कुछ खास और बड़े कदम नहीं उठाएं। जिसके कारण देश में आज भी बेरोजगारी देखी जा सकती है।

हैरानी की बात तो ये है कि दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग यानि NSC ने सर्वे को मंज़ूर कर सरकार के पास भेज दिया था मगर फिर भी दिसंबर महीने में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा मंजूरी मिलने के बाद भी इस रिपोर्ट को जारी नहीं किया गया। इसके बाद आयोग के कार्यकारी चेयरपर्सन पीसी मोहनन सहित दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफा देने की वजहों में से एक वजह भी इस रिपोर्ट से जुड़ी है। क्योंकि इस रिपोर्ट को राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा मंजूरी दिए जाने बाद भी जारी नहीं किया गया। कार्यकारी चेयरपर्सन पीसी मोहनन सहित दो सदस्य ख़ुद को काफ़ी उपेक्षित सा महसूस कर रहे थे।

तो अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि आखिर क्यों नहीं सरकार ने ये रिपोर्ट जारी की क्योंकि सरकार अगर ऐसा करती तो आपका ध्यान राम मंदिर,धर्म सेना के जवानों और पीएम मोदी जी के वायरल वीडियोज़ से हट जाता। लोगों में उम्मीद पैदा करते रहने वाले भाषण देने में कोई बुराई तो नहीं है मगर हां फिर भी लोगों को सच्चाई बताना और अपनी नाकामियों पर बात करना भी तो जरुरी है।

हालंकि इस पर केंद्र सरकार ने सफाई दी है। सरकार ने कहा कि बेरोजगारी की दर को दर्शाने वाली एनएसएस की ये रिपोर्ट अंतिम नहीं है। ये सर्वे अभी पूरा नहीं हुआ है। जिसके लिए खुद नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने आनन-फानन में प्रेस वार्ता बुलाई और कहा कि अखबार ने जिन आंकड़ों का उदाहरण दिया है, वो अंतिम नहीं हैं। यह एक मसौदा रिपोर्ट है। राजीव कुमार ने कहा कि तिमाही आंकड़ों के आधार पर सरकार अपनी रोजगार रिपोर्ट मार्च में जारी करेगी। यही नहीं उन्होंने सवाल किया कि बिना रोजगार पैदा किए कैसे कोई देश औसतन 7 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। राजीव कुमार ने कहा कि पीएलएफआई के आंकड़े की तुलना एनएसएस की पुरानी रिपोर्ट से किया जाना गलत है, क्योंकि तब और अब की गणना के तरीकों में कई बदलाव हुए हैं। यानि इस रिपोर्ट को आधा अधूरा बता कर सरकार ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। यहां मैं आपको ये भी बताना चाहती हूँ कि फ़रवरी 2018 में सरकार अपने मंत्रालयों से कहा था कि अपने सेक्टर में पैदा हुए रोज़गार की सूची बनाएं अब देख लीजिए कहां हैं वो लिस्ट। एक और गंभीर बात ये है कि सरकार या तो डेटा छिपाती है या कोशिश करती है कि अगर कोई डेटा बाहर आता है, तो उसे किसी बहस से काट दो। खैर सरकार इस बात का कोई जवाब नहीं देगी।सरकार इसे एक तरह से ‘फालतू’ करार ही दे रही है। लेकिन सरकार को ये बात नहीं भूलना चाहिए कि जो बेरोजगार है, उसको किसी नए आंकड़े की जरूरत नहीं है, वो खुद ही चलता-फिरता आंकड़ा है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार मुश्किल में घिर सकती है क्योंकि विपक्षी दल रोजगार के आंकड़ों को लेकर लगातार सरकार को निशाना बना रहे हैं। वैसे आपको क्या लगता है कि क्या वास्तव में बेरोजगारी ही मोदी सरकार की सबसे बड़ी नाकामयाबी है। क्या भविष्य में मोदी सरकार अपनी इस नाकामयाबी को दूर कर पाएगी। क्या अगली बार मोदी सरकार कामयाब हो पाएगी

 

 

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