ई-कचरा पैदा करने में भारत शीर्ष पांच देशों में शामिल- रिपोर्ट

ई-कचरा

आज के दौर में जहां दुनिया आगे जाने की महामारी से ग्रसित है. वहीं दुनिया के सामने कचरे की समस्या भी सबसे ज्यादा हो गई है. चाहे बात प्लास्टिक की करें या फिर इलेक्ट्रॉनिक कचरे की. हर तरफ आज ऐसी समस्या बन गई है कि इस कचरे को खत्म कैसे किया जाये इसे रोका कैसे जाये. सारी दुनिया इसी से परेशान है. वहीं अगर दुनिया में अगर सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-कचरा) पैदा करने की बात करें तो भारत का नाम भी इस लिस्ट में शीर्ष पांच देशों में शुमार है.

इसकी जानकारी पांच जून को पर्यावरण दिवस के एक दिन पहले प्रमुक वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम और एनईसी (नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल) द्वारा जारी की गई थी. इस रिपोर्ट की मानें तो भारत में ई-कचरे में सर्वाधिक योगदान महाराष्ट्र (19.8 प्रतिशत) का है. वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र महज 47,810 टन कचरे को सालाना रिसाइकिल कर दोबारा प्रयोग के लायक बना पाता है.

इसके अलावा अगर दूसरे राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु का योगदान इसमें 13 प्रतिशत है जबकि वो 52,427 टन कचरे को रिसाइकिल करता है. जबकि उत्तर प्रदेश 10.01 प्रतिशत कचरा पैदा करता है. जबकि वो 86,130 टन कचरा रिसाइकिल करता है. इसी तरह पश्चिम बंगाल  9.8 प्रतिशत, दिल्ली 9.5 प्रतिशत, कर्नाटक 8.9 प्रतिशत, गुजरात 8.8 प्रतिशत और मध्य प्रदेश  7.6 प्रतिशत योगदान है. हालांकि ये राज्य जितना कचरा पैदा करते हैं उसका आधा प्रतिशत भाग भी रिसाइकिल योग्य नहीं बना पाते हैं.

वहीं रिपोर्ट की मानें तो, ई-कचरे की वैश्विक मात्रा 2016 में 4.47 करोड़ टन से बढ़कर 2021 तक 5.52 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है. जबकि साल 2016 में पैदा हुए कुल ई-कचरे का सिर्फ 20 प्रतिशत यानि की 89 लाख टन  ही पूर्ण रूप से एकत्र और रिसाइकिल किया गया है. जबकि शेष ई-कचरे का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

वहीं अगर दूसरी रिपोर्ट की मानें तो, ‘भारत में करीब 20 लाख टन सालाना ई-कचरा पैदा होता है और कुल 4 लाख 38 हजार 085 टन कचरा सालाना रिसाइकिल किया जाता है.  ई-कचरे में आम तौर पर फेंके हुए कंप्यूटर मॉनीटर, मदरबोर्ड, कैथोड रे ट्यूब (सीआरटी), प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी), मोबाइल फोन और चार्जर, कॉम्पैक्ट डिस्क, हेडफोन के साथ एलसीडी (लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले) या प्लाज्मा टीवी, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर शामिल हैं.’

इसके अलावा अध्ययन में कहा गया कि, ‘असुरक्षित ई-कचरे को रिसाइकिल के दौरान उत्सर्जित रसायनों और प्रदूषकों के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र, रक्त प्रणाली, गुर्दे और मस्तिष्क विकार, श्वसन संबंधी विकार, त्वचा विकार, गले में सूजन, फेफड़ों का कैंसर, दिल, यकृत को नुकसान पहुंचता है.’

अध्ययन में ये भी बात सामने आई कि, दुनिया भर में उत्पन्न ई-कचरे की मात्रा 3.15% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जिसके कारण साल  2018 का अनुमान 47.55 मीट्रिक टन लगाया जा रहा है. ई-कचरे में मौजूद सभी कच्चे माल का 2016 में कुल मूल्य लगभग 61.05 अरब डॉलर है, जो दुनिया के अधिकांश देशों के जीडीपी से अधिक है.

वहीं अगर देखें तो, कर्नाटक जैसे राज्यों में 57 इकाइयां हैं जिनकी प्रसंस्करण क्षमता लगभग 44,620 टन है, जबकि महाराष्ट्र में 32 इकाइयां हैं जो 47,810 टन ई-कचरा प्रसंस्करित कर सकती हैं.

उत्तर प्रदेश में 86,130 टन को प्रसंस्करण करने के लिए 22 इकाइयां हैं और  हरियाणा में 49,981 टन के लिए 16 इकाइयां है. तमिलनाडु में 52,427 मीट्रिक टन प्रति वर्ष प्रसंस्करण करने के लिए 14 इकाइयां हैं.

हालांकि इन सबके बीच सबसे बुरी खबर ये है कि, भारत के कुल ई-कचरे का केवल 5% ही, खराब बुनियादी ढांचे और  कानून के चलते रिसाइकिल हो पता है जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण में अपरिवर्तनीय क्षति और उद्योग में काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है. ई-कचरे का 95% असंगठित क्षेत्र और इस बाजार में स्क्रैप डीलरों द्वारा प्रबंधित किया जाता है जो इसे रिसाइकिल करने के बजाय उत्पादों को तोड़ कर फेंक देते हैं.

वहीं अगर भारत में वर्तमान समय में ई-कचरे की क्षमता को प्रसंस्करित करने की बात करें तो भारत की ये क्षमता 4.56 गुना अधिक है. हालांकि अधिक जनसंख्या भी बढ़ते हुए ई-कचरे का महत्वपूर्ण कारक है.

वहीं इसके अलावा दूसरी तरफ देखें तो अध्ययन में कहा गया है कि, भारत के लोग जैसे जैसे अमीर हो जाते हैं. वैसे वैसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपकरण खर्च करते हैं. कुल ई-कचरा सामग्री में कंप्यूटर उपकरण लगभग 70%, दूरसंचार उपकरण 12%, विद्युत उपकरण 8%, चिकित्सा उपकरण 7% और बाकी घरेलू समान का योगदान 4% हैं. ऐसे में बढ़ता ई-कचरा इंसान के साथ साथ दुनिया के लिए भी खतरा है.

 

 

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