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वादों के सपने तय करते हैं, किसी भी नेता का राजनीतिक सफर

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वादों के सपने तय करते हैं, किसी भी नेता का राजनीतिक सफर

वादों के सपने तय करते हैं, किसी भी नेता का राजनीतिक सफर

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वादे, सत्ता, राजनीति, विपक्ष, आरोप प्रत्यारोप और खिलाफत…यही कुछ ऐसे शब्द हैं. जो राजनीति में आये दिन हर इंसान सुनता रहता है. कभी कोई विपक्षी पक्षधर पर कीचड़ उछालता है, तो कभी पक्षधर विपक्ष वालों पर. हालांकि कहते हैं अगर आपको राजनीति की गद्दी चाहिए, तो भूखी नंगी जनता के सामने ख्वाबों के आसमान बुन दो. जनता आपको अपना सरताज बना लेगी. यही हाल है हमारे देश के हर उस इंसान का जो इस लोकतंत्र में अपना कीमती वोट देता है. क्योंकि किसी भी नेता के लिए कभी इंसान मायने रखता ही नहीं, ना ही कभी रखता था. कीमत रखता है तो उसका वोट. जिसकी बादौलत एक राजनेता उस गद्दी तक पहुंचता है. जहां पहुंचने के लिए उसने हर इंसान को बड़े बड़े ख्वाब दिखाए हैं. चाहे बात केंद्र में स्थापित भाजपा की करें, चाहे राजधानी में स्थापित अरविंद केजरीवाल की.

ये वही पार्टियां हैं. ये वही नेता है. जिनका जन्म सिर्फ और सिर्फ महज उन सपने के, उन ख्वाबों के आधार पर हुआ है. ऐसा नहीं की यही दो पार्टियां हैं जिसने सपने दिखाये और सत्ता हथिया ली. देश में बनी जितनी भी पार्टियां हैं…उन सबने एक ऐसा ही सपनों का सुनहरा ख्वाब हर उस वोटर के सामने रखा है. जिसको दिखाये बिना वो कभी गद्दी तक नहीं पहुंच सकता था.

कहते हैं अगर सुबह का भूला, शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते. लेकिन अगर कोई इंसान हर बार यही गलती करे तो उसको क्या कहा जाये. ये हमारे समाज में मुहावरे बनाने वालों ने नहीं लिखा. हालांकि ये एक प्रारूप है. जिसे हमारे समाज में रह रहा हर एक वर्ग अपना चुका है. वोट दो फिर इंतजार करो. कौन बेहतर ख्वाब दिखायेगा. क्योंकि जिसके सपने ज्यादा ऊंचे होगें सत्ता उसके हाथ में होगी. इसलिए जरूरी नहीं की हम इसको लेकर कुछ अलग सोचे. कुछ अलग करें. क्योंकि अगर कोई आम इंसान इस बारे में ज्यादा सोचता है तो वो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बन जाता है.

देश में आजादी के आज लगभग 75 साल पूरे होने वाले हैं. हालांकि देश के विकास की रफ्तार उतनी नहीं बढ़ी. जितनी जाति और धर्म की बंटवारे की रफ्तार बढ़ी है. हर नेता समाज को उन सुनहरे ख्वाबों से जाति और धर्म के बंटवारे की कुछ झलकियां दिखा देता है, और हम ये सब ये भूल जाते हैं कि आखिर हमारी लड़ाई मजहब, धर्म के नाम पर है या विकास के. इसी तरह का माहौल आज गुजरात में है. जहां से अब लगभग 50 हजार लोग पलायन कर चुके हैं. और ये सिलसिला अभी भी चल रहा है. कब तक रुकेगा मालूम नहीं. हालांकि इतना जरूर कह सकते हैं कि एक भारत, श्रेष्ठ भारत की तस्वीर यहां से देखे तो कोसों दूर नजर आती है. क्योंकि जिस तरह से इस यूपी बिहार के लोगों के पलायन पर कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर का नाम सामने आया है. उससे साफ जाहिर है कि नेता की कौम का जन्म ही केवल सुनहरे ख्वाब दिखाने और जाति, धर्म के नाम पर देश को अलग रखने के लिए होता है.

जिसकी जिम्मेदार भारत की हर एक राजनीतिक पार्टी है, हर एक नेता है. जो इस अखाड़े में आकर आम जनता या यूं कहे बुद्धू जनता को सपने दिखाता है और जनता उसे अपने सर का ताज बना लेती है, और कुछ पांच दस साल बाद में फिर बदलाव कर देती है. और कहती है आपने अपने हिस्से का लूट लिया. दूसरी पार्टी को आने दो उसे लूटने का मौका दो. ये सिलसिला बादस्तूर जारी है….और जारी रहेगा.

 

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