गरीब और बेसहारा बच्चों के नाम की चीनू ने अपनी जिंदगी

चीनू क्वात्रा

भले खुद ने एक समय अपनी प्यारी चीज खो दो हो। लेकिन उम्मीद नही छोड़ी, और कर दी बाकी की जिंदगी बच्चों के नाम। हम चीनू क्वात्रा की बात कर रहें हैं इन्होंने बेसहारा बच्चों को सहारा दिया, एक समय था जब खुद के पास खाने के पैसे नही थे लेकिन यह आज गरीब बच्चों को खाना खिला रहें हैं, आज इनका एनजीओ 700 से ज्यादा बच्चों को सुविधाएं दे रहा है।

हम बात कर रहें हैं महाराष्ट्र के चीनू क्वात्रा की। चीनू क्वात्रा ने अपने जीवन से काफी कुछ सीखा हैं। उनके परिवार में पैसों की काफी कमी थी। ऐसे में चीनू ने ढाबा खोल दिया। उनकी मां के पास पढ़ाई करवाने के पैसे नहीं होते थे। ऐसे में उन्होंने अपनी मेहनत दोगुनी कर दी और 12वीं भी अच्छे नंबरों से पास की। इन सबके बीच चीनू की मुलाकात एक लड़की से हुई, जिससे वो प्यार करने लगा और इसके बाद उसने एमबीए करने की ठानी। एमबीए खत्म करने के बाद चीनू मार्केटिंग प्रफेशनल बन गया।

इसके बाद चीनू ठाणे में अपनी चचेरी बहन के प्राइमरी स्कूल में जाने लगे। वहां उन्होने दो गरीब बच्चियों को देखा और उनके घर जाकर पड़ने का फैसला किया। जब चीनू अपनी चचेरी बहन के साथ बच्चियों के घर गए तो हैरान रह गए। वहां पता चला कि बच्चियां अनाथ हैं और अपनी आंटी के साथ रह रही हैं। उनकी आंटी घर चलाने के लिए घरों में काम करती हैं। इसके बाद ही दोनों ने ठान लिया की वे बच्चों की पढ़ाई करवांगे।

चीनू और उसकी बहन बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा समय देने लगे। चीनू की बहन ने एक एनजीओ ‘अरना’ की शुरुआत की। सब कुछ सही चल रहा था कि अचानक चीनू के लिए सब खत्म सा हो गया। 2014 में चीनू जिस लड़की से प्यार करता था उसकी ऐक्सीडेंट में मौत हो गई। इसके बाद से चीनू डिप्रेशन में चला गया।

हालांकि इसके बाद 2017 में चीनू ने अपना जीवन बेसहारा बच्चों के नाम कर दिया। पांच साल एनजीओ में देने के बाद चीनू ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी और सोशल वर्क में लग गए। आज चीनू का एनजीओ 700 से ज्यादा बेसहारा बच्चों को शिक्षा और खाना दे रहें है। इसके साथ ही उनके वाघबली और अमरनाथ जिले में दो स्कूल भी चल रहे हैं।

हालांकि इसके बाद चीनू नहीं रुके और उन्होंने अपना एक पर्सनल प्रॉजेक्ट शुरू किया और वो था रोटी घर। इसमें चीनू 100 बच्चों को रोज एक वक्त का खाना उपलब्ध करवाने लगा। चीनू की इस मुहिम में उसके दोस्तों ने भी बखूबी साथ दिया। इतना ही नहीं चीनू को दूसरी जगहों से आर्थिक मदद भी मिलने लगी। खुद टूटने के बाद सब कुछ संभालना असान नही था लेकिन फिर भी चीनू ने हिम्मत नही हारी और बच्चों के नाम अपनी सारी जिंदगी कर दी।

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