सरकारी स्कूलों की तक़दीर बदलने निकले अधिकारी स्वप्निल

सरकारी स्कूलों की तक़दीर बदलने निकले अधिकारी स्वप्निल
सिविल सर्विसिज यानी दिन रातों की वो कड़ी मेहनत जिसके मुकाम को हासिल करने के लिए युवा अपनी जिंदगी में न जाने कितनी चीज़ो का त्याग करते हैं। ये सारी मेहनत वो अपने लिए नहीं बल्कि उन ज़रूरतमन्द लोगो के लिए करते है। जिन्हें इनकी ज़रूरत होती हैं। सिविल सर्विसेज़ की नौकरी बेहतरीन के साथ-साथ चैलेंजिंग भी होती हैं।  एक अधिकारी को हर वक़्त चौकन्ना रहना होता हैं।आज हम बात कर  रहे हैं। 2015 बैच के स्वप्निल आईएएस अधिकारी की जिनके एक प्रयास ने मेघालय के वेस्ट गोरो हिल्स जिले के दादेंग्ग्रे की काया पलट कर रख दी। स्वप्निल यंहा सब डिविज़नल ऑफिसर के पद पर हैं। जिन्होंने जिले की शिक्षा प्रणाली को दुरूस्त बनाने के लिए काम शुरू किया।
जिसके लिए वो स्थानीय लोगो से मिले और वंहा की समस्यांओं  को जाना और हर रोज स्कूलों का खुद जाकर निरिक्षण किया।जिले में जंहा अधिकतर लोअर प्राइमरी स्कूल ही थे। जो दो तीन कमरे के बने हुए थे, जिसमें से 30-40 छात्र, जबकि 2 से 3 टीचर ही थे. बावजूद इसके इन स्कूलों की हालत बेहद ख़राब थी और पहाड़ी इलाका होने की वज़ह से यंहा के लोग मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित थे ,तो इसी को उन्होंने अपनी पहली चुनौती मानकर काम करना शुरू किया।
स्कूलों की हालत को सुधारने के लिए पैसा उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी। आम जनता पर इसका बोझ न पड़े इसके लिए उन्होंने प्रोजेक्ट स्टार की मदद से सरकारी स्कूलों  में सुधार की योजना बनाई और क्राउडफंडिंग और कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी पहल के जरिये  फ़ंड जुटाना शुरू किया। बाद में धीरे- धीरे  ज़िले के हर विभाग के बड़े अधिकारियों और जनता को इस मिशन में शामिल कर लिया। इतना ही नहीं बल्कि स्कूलों  को बनाने के लिए उन्होंने  अपनी 2 महीने की सैलरी तक दान कर दी थी।
इसके बाद ज़िले के बदहाल हो चुके 100 आंगनवाड़ी केंद्रों का चुनाव कर हर आंगनवाड़ी केंद्र पर 1 लाख की धनराशि ख़र्च कर उसे बुनियादी सुविधा दे कर उन्हें फिर से शुरू किया। जिसका सबसे बड़ा फ़ायदा  इन केंद्रों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रहा हैं।स्वप्निल ने इस अभियान के तहत सोशल मीडिया के माध्यम से ‘मिलाप’ कैंपेन के जरिये करीब दो लाख तक की रकम जुटाई। इतना ही नहीं स्वप्निल ने इन दिनों आम लोगो के लिए #AdoptASchool कैंपेन शुरू किया हैं। जिसमें अब कई लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

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