Wed. Jul 17th, 2019

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मानव तस्करी, यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की आशा है, अजीत सिंह

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अजीत सिंह

मानव तस्करी, यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की आशा है, अजीत सिंह

कहते हैं अगर जिंदगी किसी नुमाइश की तरफ हो जाये तो वो जहन्नुम से कम नहीं लगती. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की जो लड़कियां या मानव तस्करी के चलते वेश्वयावृत्ति में ढकेल दी जाती हैं उनकी जिंदगी उसके बाद कैसी रहती होगी. अगर नहीं तो हम आज आपको बताने आए हैं एक ऐसे इंसान के बारे में जिसने उन बेबस लड़कियों को उस दलदल से निकाला है जहां एक बार फंसने के बाद कोई नहीं निकल पाता.

वो शख्स हैं उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले अजीत सिंह. ये वो नाम हैं जिसे आज तस्करी या फिर वेश्वयावृत्ति के दलदल में फंसा इंसान जरूर याद करना चाहता है. चलिए अब हम आपको बताते हैं आखिर कौन हैं अजीत सिंह… आज से लगभग तीस साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी बी. ए की पढ़ाई करने वाले अजीत सिंह अपने चचेरे भाई की शादी में गए थे. अजीत शादी के समय जब वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा जहां बारात रूकी है वहीं पर एक मंच बना हुआ था और उस मंच पर कुछ लड़कियां नाच रही थी. जिनको हर इंसान ललचाई हुई नजरों से देख रहा था…कोई उन लड़कियों के पास जाकर हवा में गोलियां चला रहा था, तो कोई उन पर पैसे उछाल रहा था. मनोरंजन का इतना भद्दा ढंग अजीत सिंह ने उससे पहले कभी नहीं देखा था जो उस समय वहां हो रहा था.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में अभी भी इस तरह शादियों में लड़कियों को बुलाकर चंद पैसों के लिए उन्हें यूं ही मनोरंजन का साधन बनाया जाता है.

उस घड़ी को याद कर अजीत सिंह कहते हैं कि, “मुझे बचपन से ही सिखाया गया था कि औरत देवी का रूप होती है पर यहां तो उन्हें इंसान भी नहीं समझा जा रहा था. इन लड़कियों और औरतों के साथ वहां मौजूद इंसान किसी बेजान चीज़ की तरह पेश आ रहे थे,”

इसके अलावा अजीत बताते हैं कि, वो उस समय 17 साल के थे. उस समय मैंने सुबह तक वहीं नाच-गाना खत्म होने का इंतजार किया और जब सुबह वहां से सभी लड़कियां और औरत जाने लगी तो मैंने उनमें से एक को रोक कर पूछा कि, “क्या मैं तुम्हारे बच्चों को गोल ले सकता हूं..?” जिसके बाद पहले तो वो हंस पड़ी और बिना किसी जवाब के वो आगे बढ़ने लगी. लेकिन मैंने उसका पीछा किया और आखिरकार मुझे पता चला की ये महिलाऐं वेश्यालय से यहां लाई जाती हैं. जिसके बाद मैंने लगातार दो साल तक उस महिला को मनाने की कोशिशें की और आखिरकार वो मान गई और उसने अपने तीनों बच्चों को मेरे साथ भेज दिया.”

उस घड़ी को याद करते हुए अजीत बताते हैं की वो समय मेरे लिए सबसे बुरा समय था. क्योंकि हमारे अध्यापकों से लेकर हमारे बड़े हमें गांधी जी और मदर टेरेसा बनने की सलाह देते हैं लेकिन जब हम वास्तव में ऐसा कुछ करते हैं तो उन सभी को आपत्ति होने लगती है. यही मेरे साथ भी हुआ था क्योंकि मेरे घरवालों से लेकर पूरा समाज मेरा विरोध कर रहा था.

लेकिन जल्द ही मेरे सपने विखर गए क्योंकि 1992 में उस महिला ने अपने बच्चों को मुझसे वापस ले लिया क्योंकि उस पर उसके मालिकों का दबाव था. जिसके बाद अजीत ने निश्चय कर लिया की वो उन सभी के लिए कुछ न कुछ करेंगे जो इस तरह लोगों के सताये होते हैं. जिसके चलते साल 1993 में अजीत ने स्वयं सेवी संस्था “गुड़िया” की शुरुवात की.

इस दौरान अजीत किसी संस्था या व्यक्ति के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानते थे जो वेश्याओं को इस दलदल से निकालने में उनका साथ दे. जिसके बाद वो खुद अकेले इसको आगे बढ़ाने के लिए निकल पड़े. अजीत रोज अपने स्कूटर पर कुछ बोरे और कुछ मिठाईयां लेकर निकलते और वेश्यालय के पास जाकर बैठ जाते थे. शुरुवात में वेश्या उन्हें इशारे करती थी, लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आ गया यहां आने का मेरा मकसद कुछ और ही है. अजीत कहते हैं कि, मैं बच्चों को बुलाकर पढ़ाता था और उन्हें मिठाईयां देता था.

इस दौरान मुझे सभी लोग यही कहते कि, “तुम ये नहीं कर सकते. क्योंकि एक अकेला आदमी पूरी दुनियां नहीं बदल सकता और मैं उनसे जवाब में कहता मुझको मालूम है मैं दुनिया नहीं बदल सकता पर उतना जरूर कर सकता हूं जितना मैं कर सकता हूं.”

अजीत कहते हैं कि पहले मैं मानता था की शिक्षा सब कुछ बदल सकती है लेकिन धीरे-धीरे मुझको पता चला की महज शिक्षा कुछ नहीं बदल सकती क्योंकि इसमें तो पुलिस, अधिकारी, नेता से लेकर दलाल सब मिले हुए थे. ये सभी लोग उन लड़कियों को वेश्यावृत्ति से निकालने के बजाए उन्हें उन्हीं में रखना चाहते हैं और मैंने उन लोगों से लड़ने की ठानी.

लेकिन मेरे सामने एक मुद्दा ये था कि अगर वहां की लड़कियों को मैं पढ़ा लिखा भी देता तो भी वो लड़कियां वहां से बाहर कैसे आती. बाहर आकर वो क्या करती क्योंकि उनमें से किसी के पास को कोई रोजगार नहीं था. लेकिन इस दौरान मैंने उन लड़कियों को वहां से निकालने का प्रयास किया जो वहां से निकलना चाहती थी. जिनसे जबरदस्ती ये काम कराया जा रहा था.

इसी के चलते साल 1996 में अजीत को CRY से फेलोशिप मिली. इन पैसों से अजीत ने गुड़िया में कुछ और लोगों को नौकरी दी जिसके बाद पुलिस से लेकर व्यवस्था के खिलाफ सीधी लड़ाई का ऐलान कर दिया. क्योंकि हमेशा उन्होंने देखा और सुना था की जब कहीं भी रेड़ पड़ती थी तो पुलिस वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को ही पकड़ कर ले जाती थी. उनके मालिकों व दलालों को कभी नहीं पकड़ती थी, पर दरअसल ये महिलायें तो केवल इन दलालों के हाथो की कठपुतलियां थी. जब पुलिस इन्हें पकडती तो जमानत की रकम के लिए इन्हें घूम फिरकरइन्ही दलालो और वेश्याघर के मालिको की मदद मांगनी पड़ती और ये फिर उसी चक्रव्यूह में फंस जाती.

जिसके बाद अजीत ने इन सभी पुलिस अफसरों और दलालों का खाका बनाकर मानवाधिकार विभाग से शिकायत करनी शुरू की. इस बीच साल 2000 में अजीत की मुलाकात बनारस के एक अनाथालय में पली बढ़ी मंजू से हुई. मंजू दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में उस समय नौकरी कर रही थी. मंजू कहती हैं कि, “मेरा हमेशा से एक सपना था कि जब मैं खुद कमाने लगूंगी तो दो बच्चों को गोद लुंगी औरउन्हें माँ बनकर पालूंगी. पर जब मैं गुडिया में आई तो वहां ऐसे कई बच्चे थे, जो यहाँ खुश थे. मैंने सोचा क्यूँ न सिर्फ दो बच्चो की बजाय मैं इन सबकी माँ बन जाऊं.”

जिसके बाद अजीत और मंजू का साथ इतना अटूट हो गया की साल 2004 में शादी कर ली. आज उनकी 9 साल की बेटी भी है जो इस मुहिम में उनका साथ देती है. शादी के बाद अजीत और मंजू ने मिलकर अपनी टीम बड़ी की और इस दलदल में फंसी लड़कियों को वहां से निकालने का काम किया.

इस दौरान साल 2005 में अजीत को एक दिन खबर मिली की बनारस के शिवदासपुर रेड लाइट इलाके में लगभग 80-90 लड़कियों को मानव तस्करी करके लाया जा रहा है. जिसके बाद अजीत और मंजू ने लगभग 5 हजार लोगों को इकट्ठा किया और पुलिस को अपने साथ लेकर वहां पहुंच गए. जिसमें इस गिरोह के 40 दलालों को पुलिस ने गिरफ्तार किया और 9 वेश्यालयों पर ताले लगा दिए गए. इस पूरे घटनाक्रम का टी.वी चैनलों पर सीधा प्रसारण किया गया.

इस दौरान अजीत और मंजू को कई बार धमकियां मिली, उन पर झूठे आरोप लगाये गए और कई फर्जी केस भी दर्ज किये गए.

मंजू कहती हैं कि, “माँ होने के नाते मुझे डर तो लगता है पर फिर एक लड़की का चेहरा मेरे सामने आ जाता है. उस लड़की को मैंने एक वेश्यालय में जासूसी करने के दौरान देखा था. वो सिर्फ सात याआठ साल की होगी. दलालों ने उसे ग्राहकों के सामने लाकर खड़ा कर दिया था. उसके होठ लाल लिपस्टिक से चमचमा रहे थे. पर उसकी आँखे बिलकुल खाली थी, बिलकुल बेजान जैसे वो जिन्दा ही न हो. जिसको हमने 2009 में वहां से बाहर निकाला था उस समय उसकी आंखें तो क्या वो भी पत्थर की हो चुकी थी, उसकी आंखें मैं कभी नहीं भूल सकती.”

उन्हीं लोगों को इस दलदल से निकालने के लिए मंजू ने एक विश्वस्तरीय मुहिक की शुरुआत भी है जिसका नाम है फ्रीडम नाउ. जिसमें इस मुहीम के तहत स्कूलों के साथ    साथ  दुसरेशिक्षा संस्थानों में मानव तस्करी से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रम जैसे कि संगीत, पेंटिंग, साइकिल की प्रतियोगित आयोजित की जाती है.

इस संस्था ने अब तक लगभग 1400 लोगों से ज्यादा बंधुआ मजदूरी और वेश्यावृत्ति से बचाया है. आज इस संस्था द्वारा बचाई गई महिलाओं ने मिलकर पांरपरिक संगीत व कला प्रदर्शनी की शुरुवात की है. इस दल ने अब तक  भारत के कई नामी मंचो पर अपनी कला प्रस्तुत की है साथ ही अब तक न जानें कितने लोगों के बीच जागरूकता फैलाई है.  इससे इनमहिलाओं को जीवन यापन के लिए एक रोज़गार का जरिया मिला है. गुड़िया संस्था ने अब तक हजार से ज्यादा बच्चों की शिक्षा में मदद की है साथ ही लगभग 350 बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठा रहे हैं.

 

 

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