भारत का जुगाडु आविष्कारक उद्धव भराली, जिसने अब तक 140 आविष्कार कर ड़ाले

जुगाडु आविष्कारक उद्धव भराली

“जुगाड़” ये कोई शब्द नहीं…ये आपने आप में ही एक पूरी परिभाषा है और आज तक न जानें कितने हमारे समाज में ऐसे आए हैं. जिन्होंने इसे हकीकत में धरातल पर उतार कर दिखाया है. उन्हीं में से एक हैं असम के ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट के लखीमपुर में जन्मे उद्धव भराली…जिन्होंने जुगाड़ के दम पर अब तक 140 आविष्कार किये हैं…और उन आविष्कारों ने उनके साथ न जानें कितने लोगों की जिंदगी बदल दी है.

आज जहां एक तरफ खेती से लेकर किसानों की बात करें तो, हर तरफ इसमें नया अध्याय जोड़ने और नया आयाम लिखने की कोशिशें की जा रही हैं. जिसके अपना अहम योगदान निभाने वाले भराली कहते हैं कि उनकी दृष्टि में, कृषि परिदृश्य को बदलने और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार होने के दौरान अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए है. जिसके चलते अब तक उद्धव भराली अनार के छिलके उतारने, कसावा छीलने से लेकर खेतों में धान बोने और चाय के प्रसंस्करण की कई मशीनों का आविष्कार कर चुके हैं.

चलिए अब हम आपको बताते हैं उद्धव भराली के जीवन के उस दौर की कहानी जिस समय लोग भराली को लोग किसी काम का नहीं समझते थे. असम के उत्तर लखीमपुर जिले में एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में जन्मे भारली ने अपनी स्कूली शिक्षा लखीमपुर से पूरी की. अकादमिक रूप से उद्धव भराली को अक्सर उनके शिक्षक द्वारा कक्षा से बाहर खड़े होने के लिए कहा जाता था क्योंकि भराली अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा ‘प्रश्न’ पूछते थे.

पढ़ाई में तेज होने के चलते भराली को पहली कक्षा से तीसरी और फिर छठवीं कक्षा से आठवीं में पदोन्नत कर दिया गया. भराली खुद कहते हैं कि, “14 साल की उम्र में स्कूल से पूरा करने के बाद, मैंने जोरहाट इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लेने का फैसला किया. हालांकि, जल्द ही मुझे वहां से बाहर कर दिया गया क्योंकि मेरा परिवार आर्थिक तंगी की वजह से वहां की फीस का भुगतान नहीं कर सका था.

भराली इसके साथ कहते हैं कि, जो लोग अपनी सफलता की कहानियां गढ़ते हैं, वो आमतौर पर अपनी यात्रा की शुरुवात शून्य से करते हैं…लेकिन मैनें 8 लाख से शुरू की थी जोकि मेरे परिवार पर कर्जा राशि थी. 1987 में, बैंक अधिकारियों ने हमारे परिवार को कहा था कि अगर हमने उन्हें पैसे नहीं दिए तो हमको अपना घर खाली करना होगा. इस दौरान मैं नौकरी करके अपने परिवार की मदद नहीं कर सकता था क्योंकि वो पर्याप्त नहीं हो पाती. इस दौरान मुझको मालूम था की एक कंपनी ऐसे इनोवेटर्स की तलाश कर रही थी जो पॉलिथीन बनाने की मशीन डिजाइन कर सके और मैंने उस कंपनी के लिए वो मशीन महज 67 हजार में बनाई जो बाजार में 4 से 5 लाख की थी. इस दौरान अपने पिता के ऋणों को चुकाने के बाद मुझे एक और ऐसा ही काम मिला साल 1995 में जब मुझे अरुणाचल प्रदेश में एक पनबिजली परियोजना में प्रयुक्त मशीनरी के रखरखाव के लिए अनुबंध बनाना था. लेकिन मुझे उसी के तीन साल बाद घर लौटना पड़ा क्योंकि मेरे बड़े भाई का लीव स्कलेरोसिस के कारण निधन हो गया था.

इस समय कमाने वालों में मैं ही अपने घर का एक अकेला सदस्य बचा था. जिसको अपनी जरूरतों के साथ-साथ परिवार की जरूरतों का भी ख्याल रखना था. लेकिन मेरे आविष्कारों से मुझे ये समझ आया कि, इनसे मैं अपनों के साथ-साथ उन लोगों की भी जरूरत बन सकता हूं जो आर्थिक तौर पर मजबूत नहीं हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने जरूरतों के उत्पाद बनाने पर अपना ध्या केंद्रित किया. इस दौरान अनेकों चुनौतियां आई अनेकों असफलताऐं आई.

लेकिन भराली कहते हैं कि, “अगर मैं इस समय पीछे बैठ जाता और शिकायत करता, तो मुझे कभी पता नहीं चलता कि मैं क्या करने में सक्षम था. मैं तब तक काम करता रहा और सोचता रहा जब तक कि मेरे रास्ते में कोई बाधा नहीं आ गई, इसलिए मेरा मानना है कि असफलता सिर्फ एक स्थिति है और आपकी कार्रवाई उसका समाधान.”

जिसके बाद से मैंने साल 1995 से 2005 के तक लगभग 24 मशीनों का आविष्कार किया और साल 2005 में, मुझे प्रतिभा नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन, अहमदाबाद की नजर में आई और उन्होंने उस जमीनी स्तर पर इनोवेटर का रूप दिया. जिसके बाद मैंने साल 2006 में डे-सीडिंग मशीन डिजाइन की जो भारत में ही  नहीं, बल्कि दुनिया भर में पहचानी गई.

आपको बता दें कि, ये मशीन बाहरी पतली झिल्ली से अनार के बीज को किसी भी नुकसान के बिना बाहरी कठोर त्वचा को अलग कर सकती है, साथ ही एक घंटे में लगभग 55 किलोग्राम अनार को डी-सीडिंग कर सकती है. इस मशीन को बनाने के बाद भराली को तुर्की और अमेरिका को निर्यात के लिए आदेश देने शुरू हो गए, और आखिरकार उन्होंने एक प्रर्वतक के रूप में अपनी पहचान बनाई जिसके बाद से भराली ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस दौरान भराली ने एक एस्फुट पीलिंग उपकरण भी विकसित किया, जो एक मिनट में लगभग 120 नट्स को छील सकता है. नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की सहायता से भराली ने इसी तरह न जानें कितनी ही मशीनों का आविष्कार किया. जिसमें लहसुन छीलने से लेकर खाई खोदने वाली मशीन तक शामिल है. उन्हीं मशीनों में से एक मशीन मवेशियों और मछलियों के चारे के लिए भी बनाया गया है जोकि अपने देश के साथ-साथ विदेशों में इस्तेमाल किया जा रहा है.

इन सबमें आविष्कारों के बीच भराली ने सीमेंट ईंट बनाने वाली मशीन का भी आविष्कार किया है..जोकि एक विकलांग से लेकर कोई भी इकलौता इंसान चला सकता है. भराली कहते हैं कि, मेरा इनोवेशन ज्यादातर मैन्युअल रूप से संचालित होते हैं, जो लागत को बहुत कम रखने के साथ साथ न्यूनतम बिजली की खपत करते हैं साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाते.

भराली नई मशीनें बनाने के अलावा चिकित्सा की किताबें पढ़ना पसंद करते हैं, भराली के पास होम्योपैथी में एक अनौपचारिक डिग्री है. इन सबके अलावा भराली उन लोगों को भी वक्त देते हैं जो आर्थिक तंगी से लेकर बेसहारा होते हैं. आज भराली की मशीनें व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हैं साथ ही निर्यात किए जाते हैं. जिसके लाभ का एक बड़ा हिस्सा उनके अनुसंधान में और 21 परिवारों के स्वास्थ्य, शिक्षा में जाता है. भराली विकलांग लोगों की मदद करने में सबसे आगे रहते हैं. जिसके चलते उन्होंने यूकेडी ट्रस्ट खोला है, जिसके माध्यम से वो हर महीने छह विधवाओं को 1,200 रुपये की मासिक पेंशन देते हैं, जबकि शारीरिक रूप से अक्षम तीन लोगों को हर महीने 2,500 रुपये देते हैं. इसके अलावा वो एक छोटा शोध और प्रशिक्षण संस्थान भी चलाते हैं, जिसमें वो तीन महीने तक तकनीक और इसके अनुप्रयोगों के तहत छात्रों को शिक्षित करते हैं. इस समय भराली एक अनाथालय, एक वृद्धाश्रम और छात्रों के ले अपने निवास पर एक संग्रहालय स्थापित करने की प्रक्रिया बना रहे हैं.

इन सबके अलावा भराली कहते हैं कि, ““अपने नवाचारों के माध्यम से, मैं उन लोगों तक पहुंचना चाहता हूं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं. मैं अपने लिए कोई मुनाफ़ा नहीं चाहता. मैंने अपने परिवार को भी यह स्पष्ट कर दिया है। कभी-कभी वे सोचते हैं कि मैं पागल हूं, लेकिन मुझे लगता है कि यह विलासिता की चाह है जो आपको पागल बना देती है. मेरा मानना है कि यदि आप अपने ज्ञान और क्षमताओं के माध्यम से समाज की मदद नहीं कर सकते हैं, तो आप एक बेकार जीवन जी रहे हैं. ”

आज यही वजह है कि भराली को सभी प्रमुख क्षेत्रों में अतिथि संकाय के तौर पर, भारतीय प्रौघोगिकी संस्थानों में स्पीच के लिए बुलाया जाता है. उनके कार्यों को देखते हुए असम कृषि विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई है. अब तक भराली को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

जिसमें साल 2007 में राष्ट्रीय अन्वेषण संस्था का सृष्टि सम्मान, 2009 में अन्वेषण के लिए प्रेसिडेंट ग्रासरूट इनोवेशन पुरस्कार, 2011 में विज्ञान प्रयुक्ति विद्या मन्त्रालय से मेरिटोरियस इनोवेशन पुरस्कार, साल 2013 में राष्ट्रीय एकता सम्मान और इस साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया है.

कहते हैं अगर आप में इंतजार और मेहनत करने का जज्बा है तो, एक दिन आपकी मंजिल आपके कदमों में तक यूं ही चली आती है. शायद इन लाइनों के जीता जागता उदाहण हैं उद्धव भराली, जिन्होंने अपनी जिंदगी के लगभग 15 साल अपने आप को साबित करने में निकाल दिए और आज कामयाबी की अनोखी मिसाल बन गए हैं.

 

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