उर्दू के लोकप्रिय शायर मिर्जा गालिब का हैैं आज 221वां जन्मदिन

मिर्जा गालिब

आज कल हर मेसेज लाईन में उर्दू का इस्तेमाल होता हैं और उर्दु शायरी हर किसी को बहुत पंसद आती हैं. उन्ही उर्दु के लोकप्रिय शायर मिर्जा गालिब का आज 221वां जन्मदिन है. मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था. छुट्टी सी उम्र में मिर्जा गालिब ने आपने पिता को खो दिया. पिता के बाद चाचा ने गालिब को संभाला पर यह साथ भी ज्यादा ना चल सका और चाचा ने भी गालिब का साथ छोड़ दिया जिसके बाद मिर्जा गालिब की देखभाल उनके नाना नानी ने की. मिर्जा गालिब का विवाह 13 साल की उम्र में उमराव बेगम से हो गया था। जिसके बाद वह दिल्ली आ गए औऱ यही रहें। मिर्जा गालिब ने इश्क की इबादत हो या नफरत या दुश्मनों से प्यार सभी शायरी में दर्द छलकता है।

मिर्जा गालिब को मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने अपना दरबारी कवि बनाया था। उन्हें दरबार-ए-मुल्क से नवाजा था। इसके साथ ही गालिब बादशाह के बड़े बेटे के शिक्षक भी थे। मिर्जा गालिब पर कई किताबें है जो लिखी हैं… आईए.. उनके जन्मदिन पर उनकी शायरी सुनकर एक बार फिर उनको याद कर ले..

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

मैने मोहब्बत के नशे में उसे खुदा बना दिया
होश तब आया जब उसने कहा की खुदा किसी एक का नही होता

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख

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