इको फ्रैंडली अंतिम संस्कार करने से कम होगा देश में वायु प्रदूषण

इको फ्रैंडली अंतिम संस्कार

एक वक्त था, जब लोग खुली हवा में सांस लेने की बात करते थे, और बात आज की करें तो, आज हम घर से बाहर भी मास्क पहन कर निकलते हैं। रास्ते में कभी ध्यान देंगे तो आप को दिखाई देगा कि, किसी के मुंह पर कपड़ा बंधा हुआ हैं तो, कोई रूमाल बांधकर बाइक चला रहा हैं, और इसके पीछे वजह क्या हैं। वो हम सब जानते हैं। सब इस बारे में बात जरूर करते हैं कि, वायु प्रदूषण यानि की एयर पॉल्यूशन को कैसे कम करना चाहिए, लेकिन सब सिर्फ बातें ही करते हैं, अच्छा आप ही बताईए, हम और आप जैसे कितने ऐसे लोग हैं, जो एयर पॉल्युशन को कम करने के लिए कुछ ऐसा काम कर रहे हैं, जिससे हमारे वातावरण में कोई सुधार हो सकें।

और तो और अब हमारा देश सबसे प्रदूषित देशों के लिस्ट में भी शामिल हो चुका हैं, देश की राजधानी तक सबसे प्रदूषित शहरों के लिस्ट में 11वें स्थान पर है। मतलब हमने हमारे ही देश को इतना प्रदूषित कर दिया हैं कि, अब हमारा ही सांस लेना दुश्वार हो गया हैं। अब आप ये मत कहिएगा कि इसमें हमारा क्या दोष हैं, अरे भई पेड़-पौधों को काटने वाले हम ही हैं, अपने comfort  के लिए, अपनी  सुविधाओं के लिए उनकी लकड़ियों को जला कर हम खुद को तो गर्मी दे देते है लेकिन उनके जलने से जो धुआं निकलता हैं उससे परेशानी हमारे वातावरण को ही होती हैं।

वैसे तो स्मॉग के कई कारण हैं, जगह-जगह कचरा जलाने, खेतों में पराली जलाने, गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से लेकर अंतिम-संस्कार के दौरान भी काफी वायु प्रदूषण होता हैं, हमारे देश में कई धर्मों के लोग रहते हैं, जिनमें से हिंदू धर्म की संस्कृति और रिती रिवाजों के अनुसार, किसी की मौत के बाद उस व्यक्ति के शव को जलाकर ही उसका अंतिम संस्कार किया जाता हैं, लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि, एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में तकरीबन 400-500 किलों लकड़ी को जलाया जाता हैं.. और साल भर में इन लकड़ियों के लिए करीब 4 लाख पेड़ों की कटाई की जाती हैं.. अब आप खुद सोचिए कि, देशभर में पर्यायवरण को इससे कितना नुकसान हो रहा हैं..

इसे ध्यान में रखते हुए आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने इको फ्रैंडली तरीका निकाला है, जिससे वायु प्रदूषण कम होने के साथ अपशिष्ट प्रबंधन भी होगा। आईआईटी दिल्ली के 40 छात्रों ने मिलकर अंतिम संस्कार में लकड़ी की जगह पर गाय के गोबर के कुंदे इस्तेमाल करने की सलाह दी है। इन डंग कुंदों को मशीन से बनाया जाता है। इसमें पहले 50 डिग्री तापमान पर गोबर को सुखाया जाता है और फिर मशीन की मदद से कुंदे तैयार किए जाते हैं।

इन छात्रों की टीम ने दिल्ली के निगम बोध घाट सहित 50 शमशानों का सर्वे किया। जिसमें उन्हें पता चला कि, ज्यादातर लोग शवों को लकड़ी से ही जलाते हैं। हालांकि, कई शमशानों में बिजली या सीएनजी जैसी वैकल्पिक व्यवस्था है लेकिन बहुत कम लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में गाय के गोबर के कुंदे का इस्तेमाल अच्छा ऑपशन हो सकता है।

दिल्ली जैसे कई बड़े शहरों में काफी संख्या में गौशालाएं हैं, जिनमें काफी संख्या में गायें रहती हैं और ऐसे में गोबर को मैनेज करना भी एक भारी समस्या हो जाती है। इसे कई बार खाली जगहों पर फेंक दिया जाता है और बदबू के कारण आसपास के लोगों को परेशानी होती है। अंतिम संस्कार में गोबर का इस्तेमाल करने से न सिर्फ वायु प्रदूषण कम होगा बल्कि वेस्ट मैनेजमेंट का भी ये एक बेहतरीन तरीका बन सकता है।

आईआईटी दिल्ली के इन Students के इस सुझाव को कितने लोग अपनाते हैं और कितने नहीं इसका अंदाजा लगाना थोड़ा-सा मुश्किल हैं लेकिन जैसा कि, अपनी हर कहानी के बाद हम आपको एक मैसेज देने की कोशिश जरूर करते हैं, तो मैसेज आप समझ ही गए होंगे कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में आप भी अपना सहयोग दें।

 

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