आज है लोहड़ी : जानें क्यों खास है ये त्योहार….

आज देश भर में लोहड़ी का त्योहार धूम धाम से मनाया जा रहा है। लोहड़ी का त्योहार पंजाब से ख़ास तौर पर जुड़ा हुआ है। लोहड़ी उत्तर भारत में भी धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी का त्योहार सर्दियों के जाने और बसंत ऋतु के आने का संकेत माना जाता है। इस दिन लोग लकडि़यों और उपलों से अग्नि जलाते हैं और मिल जल कर लोहड़ी की खुशियां मनाते हैं। इस दिन सभी लोग पवित्र अग्नि के चक्कर लगाकर नाचते हैं। इस दिन की तैयारी में बच्चे कई दिन पहले से ही लोहड़ी माई के नाम पर पैसे लेते हैं जिनसे लकड़ी और गोबर के उपले मंगाए जाते हैं।

लोहड़ी का ये पावन त्यौहार खेतों में लगी फसलों की काटे जाने के बाद मनाया जाता है। इसके बाद फसलों को अग्नि को अर्पित किया जाता। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि ऐसा करके फसलों का भगवान को भोग लगाया जाता है। आज पंजाबी समाज लोहड़ी और सिंधी समाज लाललोई पर्व मना रहा है। जलती लाललोई की परिक्रमा लगाकर सुख समृद्धि की कामना कर पारंपरिक गीत गाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर तिल-गुड़ से एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया गया। रंग-बिरंगी पतंगों से आसमान लोहड़ी से पहले ही रंगीन दिखने लगा। लोहड़ी के त्योहार का अपना ही अलग मजा है। शाम के समय तो लोग एक-दूसरे के घर जाकर मूंगफली, गजक और रेवड़ी आदि देकर त्यौहार की बधाई देते हैं।

लोहड़ी के दिन किसी तरह का व्रत नहीं होता है, इस दिन खान-पीन और नाच-गाने के साथ उल्लास पूर्वक इस त्योहार का आनंद लिया जाता है।
लोहड़ी के दिन के दुल्ला भट्टी की कहानी भी काफी प्रचलित है। लोहड़ी के सभी गानों को दुल्ला भट्टी से जुड़ा माना जाता है। माना जाता है कि दुल्ला भट्टी नामक व्यक्ति मुगल शासक अकबर के शासन में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि दी गई थी। उस समय की मान्यता के अनुसार लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेचा जाता था। दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत गुलाम लड़कियों को छुड़वाया और उनका विवाह भी हिंदू लड़कों से करवाया था। दुल्ला भट्टी को एक विद्रोही माना जाता है। दुल्ला भट्टी को आज भी प्रसिद्ध पंजाबी गीत सुंदरिए- मुंदरिए गाकर याद किया जाता है।

 

 

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