Menstrual Hygiene Day : ग्रामीण महिलाएं ये जान लें ‘महाबारी’ नहीं है कोई बीमारी

Menstrual Hygiene Day : ग्रामीण महिलाएं ये जान लें 'महाबारी' नहीं है कोई बीमारी
Menstrual Hygiene Day : ग्रामीण महिलाएं ये जान लें ‘महाबारी’ नहीं है कोई बीमारी  आज भी हमारे समाज में मासिक धर्म, पेड इन सबको लेकर बात करने में लोग कतराते हैं। सोचिए इस देश में मासिक धर्म को लेकर महिलाओं को जागरूक करने के लिए एक फ़िल्म तक बनानी पड़ गई। मगर ज़्यादातर परिवार, माँ बेटी, सहेलिया और ख़ास तौर पर पुस्रुष इन फिल्मों को देखने गए ही नहीं। ये सोचकर की ये फालतू टॉपिक है। आजकल रेलवे स्टेशंस पर पेड मशीने लगाईं जा रही हैं। कई एनजीओ कई महिला संघठन इस मसले पर खुलकर बात कर रहे हैं और जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं मगर बावज़ूद इसके आज भी जब टीवी पर एड चल जाए पेड का तो पिता भाई या तो चेनल चेंज कर देते हैं या बेटी खुद उठ कर चली जाती है। अब बात ये नहीं हैं कि आप परिवार में हर दिन खुलकर इस पर बात करें मगर कम से कम इसे शर्म का ऐसा मुद्दा तो ना बनाए जो शुरू होते ही लोग इधर उधर देखने लग जाएं। चलिए आज में शहर की महिलाओं के बारे में बात नहीं करती हूँ क्योंकि वो मासिक धर्म को लेकर जागरूक भी हैं और इस पर खुलकर बात भी करती हैं। मगर मासिक धर्म पर बात करने के खुलेपन से आज भी ग्रामीण महिलाएं कोसो दूर हैं। पहली बात तो ये कि धर्म अगर शुरू हो गया है तो वो महिला रसोई घर में नहीं जा सकती वो महिला या बच्ची अब चटाई बिछा कर ज़मीन पर ही सोएगी। अगर छत पर अचार सूख रहा है तो वो उस अचार को हाथ नहीं लगा सकती वरना अचार ख़राब हो जाएगा। दूसरी बात ग्रामीण महिलाएं पेड का इस्तेमाल करने से आज भी अंजान हैं क्योंकि ना तो उन्हें ये पता होता कि कपडा इस्तेमाल करने से उन्हें कितने गंभीर रोग हो सकते हैं। और ना ही घर के पुरुष भी महिलाओं को इस बारे में कोई सलाह देते कि वो पेड का इस्तेमाल करें क्योंकि उनके लिए तो इस मुद्दे पर बात करना ही गुनाह होता है। ऐसे में महिलाएं गंदे कपडे का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होती हैं। कपड़ा तो छोड़ ही दीजिए महिलाएं तो मासिक धर्म में घास मिट्टी तक इस्तेमाल करती हैं।
आज भी गांव में हया शर्म इतनी बड़ी चीज होती है कि कोई महिला अपने लिए पेड लेने खुद दूकान पर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती। वहीं अगर कोई जागरूक महिला घर के पुरुषों से पेड लाने की कह भी दें तो आदमियों को या तो ये अपने आत्म सम्मान के ख़िलाफ़ लगता है या उन्हें ये फ़िज़ूल खर्ची लगती है। आख़िर ऐसा क्यों होता है ये तो हम नहीं जानते। मगर आप इस देश की विडंबना देखिए कि एक तरफ इस देश में किसी को महिलाओं की मासिक धर्म के दौरान होने वाली पीड़ा दिखाई नहीं देती और ना ही इस पर कोई बात करना चाहता है। मगर दूसरी तरफ़ इसी देश में एक मंदिर में लोग कामख्या माँ के मासिक धर्म के दौरान लम्बी लम्बी लाइन लगाकर आशीर्वाद के रूप में वो लाल और गीला कपड़ा अपने घर ले जाते हैं।  अब बताइए है ना हमारे समाज की ये दोहरी मानसिकता ? जब सरकार महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए कदम उठा रही है और सस्ते नेपकिन और स्वास्थ्य जांच शिविर लगा रही है लोगों को जागरूक कर रही है तो आप ये काम खुद क्यों नहीं करते हैं ! क्यों ये छोटी सी बात सरकार को आपको समझानी पद रही है। मेरी सभी महिलाओं से गुजारिश है कि मासिक धर्म के दौरान आप साफ़ नेपकिन का इस्तेमाल करें और आपको बीमारियों ना हो इसके लिए सफाई का ध्यान रखें क्योंकि मासिक धर्म के दौरान गंदगी की वजह से होने वाले इन्फेक्शन बेहद खतरनाक होते हैं। इससे महिलाओं को गंभीर बीमारी हो सकती है वहीं महिलाओं की मौत तक हो सकती है। वहीं सभी पुरुषों में बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि अगर अभी भी आपको इस बारे में बात करने पर या ये विडिओ शेयर करने में शर्म आ रही हो तो बेशक ऐसा ना करें मगर कम से कम अपनी माँ और बेहेन या पत्नी के इन दिनों में होने वाली पीड़ा को समझे और अगर वो नेपकिन खरीदने में हिचकिचाहट महसूस कर रही हैं तो उनकी मदद जरूर करें। अगर वो इन दिनों किसी बीमारी से पीड़ित लग रही हैं तो उन्हें डॉक्टर के पास जरूर ले जाएं। धन्यवाद !

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