नेत्रहीन साधु माझी ने अपने गांव को बनाया खुले में शौच मुक्त गांव

साधु माझी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 5 साल का कार्यकाल खत्म होने जा रहा हैं। अगली बार वो प्रधानमंत्री बनते हैं या नही यह अभी कोई नही जानता। लेकिन उनका शुरु किया गया स्वच्छ भारत अभियान लोग कभी नही भूलेंगे, और कहीं ना कहीं उनकी वजह से कई गांव ऐसे भी हैं जो आज शौच मुक्त गांव हैं। उनके द्वारा चलाए गए अभियान से जागरुक लोग आज भी अपने गांव वालों को इस बारे में समझा रहें हैं, और अपने गांव को शौच मुक्त कर रहें हैं। ऐसे ही बिहार के गया जिले के फतेहपुर गांव में एक 45 वर्षीय नेत्रहीन व्यक्ति साधु माझी ने न केवल अपने घर में शौचालय बनवाया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि गांव के बाकी लोगों को भी जागरूक किया जाये। आज यह गांव भी खुले में शौच मुक्त गांव हैं और इसका पूरा श्रेय माझी को ही जाता है।

बता दे की पहले इस गांव में किसी भी घर में शौचालय नहीं था। ऐसे में सभी लोग खुले में ही शौच जाते थे। साधु माझी, जो कि देख नहीं सकते, उनके और उनके परिवार के लिए यह और भी समस्या वाली बात थी। एक बार माझी ने अपनी एक पड़ोसी, ‘झालो देवी’ को घर में ही टॉयलेट होने से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं, इस सबके बारे में बात करते हुए सुना। झालो देवी भी अपने घर में ही शौचालय बनवाना चाहती थीं ताकि उनकी बहु-बेटियों को तकलीफ न हो। लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाई।

लेकिन हाल ही में कुछ समय पहले झालो देवी ने स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत बने एक शौचालय को देख और उसे बनाने की प्रक्रिया समझी। जल्द ही झालो देवी और साधु माझी ने अपने घरों में टॉयलेट बनवाने की प्रक्रिया शुरू की। इसमें उन्हें वाटरऐड संगठन से सहायता मिली।

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अपने घर में शौचालय बनने के बाद माझी ने और भी लोगों को इसकी सलाह दी और उन्हें घरों में ही टॉयलेट बनवाने को कहा। लेकिन किसी ने उसकी बात पर ज्यादा गौर नहीं किया। लेकिन फिर भी माझी ने हार नहीं मानी। बल्कि उन्होंने तो लोगों को जागरूक करने का और भी उम्दा तरीका खोज निकला।

उन्होंने अपनी ही स्थानीय भाषा, ‘मगही’ में एक गीत बनाया, जिसे वह गली-गली जाकर ढपली की थाप पर गाता था। इस गीत के जरिये वे लोगों को घर में शौचालय होने के फायदे आदि के बारे में बताते। लगभग 1 महीने तक यह सिलसिला जारी रहा और धीरे-धीरे गाँव में इस विषय पर चर्चा होने लगी।

सबसे पहले माझी के बड़े भाई ने अपने यहां शौचालय बनवाया। फिर बाकी सभी गांववाले भी एक -एक कर इसमें शामिल होते गए। और देखते ही देखते यह गांव पूर्ण रुप से खुले में शौच मुक्त गांव हो गया। माझी न केवल अपने गांव के लिए बल्कि आस-पास के गांवों के लिए भी एक मिसाल हैं। उनको पता था की खुले में शौच जाने से कितनी परेशानियां होती हैं। यहीं करण हैं की नेत्रहीन यानी बिना आंखों के भी वो यह समझ गए की उनके क्या बुरा हैं और क्या नही

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