महिला डाकिया बनकर इंद्रावती ने दूर किया महिला-पुरूष के बीच का भेदभाव

महिला डाकिया

एक वक्त था, जब हमारे देश में घर के चुल्हे-चौके के काम के अलावा बाकी सभी कामों को पुरूष प्रधान माना जाता था। दफ्तर से लेकर बाहर आने-जाने वाले सभी काम घर के पुरूष ही किया करते थे। और महिलाएं केवल घर की चार दिवारी में सिमटी चुल्हे-चौके की बीच अपनी पूरी जिंदगी काट दिया करती थी।

ये हमारे देश का वो दौर था, जब महिलाएं खुद के अधिकारों के लिए आवाज उठाना नहीं जानती थी। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बदलता चला गया, वैसे-वैसे महिलाओं नें भी अपने अधिकारों के लिए लड़ाईयां लड़ी। जिसके नतीजे में आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों की बराबरी करती नजर आ रही हैं।

दिल्ली की रहने वाली इंद्रावती ने भी शहर की पहली महिला डाकिया बनकर सबको चौंका दिया था। हालांकि, वक्त बदल गया हैं, लेकिन कहीं न कहीं लोगों की सोच आज भी महिला और पुरूष के जाल में उलझी हुई हैं। जब इंद्रावती पहली बार हाथ में झोला टांगे घर से दफ्तर के लिए निकली थी, तो आस-पड़ोस की निगाहें उन्हें बड़ी ही बेढंगे तरीके से घूर रही थी, शायद वो सोच रहे होंगे, कि कैसे कोई महिला डाकिया बन सकती हैं।

हाल ही में अपने काम से रिटायर हुई महिला डाकिया इंद्रावती ने अपनी इस नौकरी की शुरूआत साल 1982 में की थी। दरअसल, इंद्रावती की मां की अचानक मौत होने से घरवाले नहीं चाहते थे कि इंद्रावती अपना ज्यादा वक्त घर पर बितायें। जिसके चलते उन्हें स्कूल भेजा जाने लगा।

हालांकि, इस बारे में इंद्रावती का कहना है कि, जो हुआ अच्छा ही हुआ इस बहाने मैने पढ़ाई की, और नौकरी के लिए आवेदन किया। जिसके बाद 13 सितंबर 1982 में इंद्रावती ने पहली बार महिला डाकिया का पद संभाला। वो कहती हैं कि, मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि, मैं परंपरा से हटकर कुछ कर रही हूं। ये नौकरी मेरे लिए बस एक रोजगार का साधन थी। हालांकि, खुशी जरूर थी, कि मैं अपने परिवार में पहली सरकारी नौकरी पाने वाली सदस्य बन गई थी।

इंद्रावती नई दिल्ली में कनॉट प्लेस के पास गोल डाकखाने में नियुक्त थीं। वे बताती हैं कि, उस समय इस विभाग में महिला डाकिया होना अजीब बात थी। उस वक्त दूसरे सेक्शन से लोग मुझे देखने आते। हालांकि, बाद में काफी कुछ बदल गया। इंद्रावती ने बताया कि, कुछ समय में लोग उन्हें जानने लगे। उनके इस काम की तारीफ होने लगी थी। बल्कि उनकी नियुक्ति के 7-8 साल बाद एक और महिला डाकिया आईं, और धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी।

महिला डाकिया इंद्रावती ने बताया कि, मुझे अपने पढ़े-लिखे होने की खुशी उस वक्त सबसे ज्यादा हुई, जब मैंने लोगों को चिट्ठियां पढ़कर सुनाईं। कई लोग खासकर बुजुर्ग पढ़ नहीं पाते थे। जब मैं उनकी चिट्ठी पढ़ती थी, तो वो खुश होकर मुझे आशीर्वाद देते थे।

अपनी रिटायरमेंट के बाद इंद्रावती चाहती हैं, कि शायद अब वक़्त है कि हमें पोस्ट ‘मैन’ की जगह पोस्ट’पर्सन’ शब्द का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए। ताकि यहां भी लैंगिक समानता को बढ़ावा मिले। और सदियों से चले आ रहे महिला पुरूष के भेदभाव को खत्म करने की एक और पहल हो सके।

 

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