फूलबासन यादव ने कुछ इस तरह तय किया दो रूपये से 25 करोड़ तक का सफर

फूलबासन यादव

छत्तीसगढ़ की रहनी वाली फूलबासन यादव की कहानी बाकी औरतों से थोड़ी-सी अलग हैं। कच्ची उम्र में शादी, फिर 20 तक की उम्र में 4 बच्चों की मां बनने तक का सफर तो, फूलबासन यादव का सभी महिलाओं की तरह ही आम था, लेकिन आज उन्होने न केवल खुदको बल्कि अपने पूरे परिवार को उस मुकाम तक पहुंचाया हैं। जहां कि, उन्होने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

इस बात से तो आप सभी वाकिफ होंगे कि, गरीबी सिर्फ मन से है, हौसला हो तो इंसान कुछ भी कर गुजर सकता हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया हैं पद्म श्री से सम्मानित राजनांदगांव की रहने वाली फूलबासन यादव ने किसी समय में जो महिलाएं घर के चुल्हे-चौके तक ही सिमटी रह जाती थी, आज वहीं औरते फूलबासन यादव की मदद से अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में अपना सहयोग दे रही हैं।

आपको बता दें कि, फूलबासन यादव का जन्म एक गरीब चरवाहे के परिवार में हुआ था। जिसके बाद उनका बचपन गरीबी के साये में ही गुजरा, खैर बचपन भी क्या कहें, जब 10 साल की उम्र में ही फूलबासन के माता-पिता ने उनकी शादी करा दी थी। और फिर 20 तक होते होते फूलबासन यादव बन गई 4 बच्चों की मां।

लेकिन इसके बाद फूलबासन के मन में एक ख्याल आया कि, क्यों न कुछ ऐसा किया जाए, जिससे परिवार को आर्थिक सहायता मिल जाए। अपनी इस सोच के बाद फूलबासन देवी ने साल 2001 में मां बम्लेश्वरी स्वयं सहायता समूह का गठन किया। फूलबासन ने इस समूह की शुरूआत केवल दो मुठ्ठी चावल और 2 रूपये के साथ की थी।

इसके बाद उन्होने गांव के महिलाओं को धीरे-धीरे बकरी पालन के लिए जोड़ना शुरू कर दिया। फिर कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण की शुरुआत की गई, और महिलाओं के इन समूहों द्वारा कई प्रकार के उत्पाद को बनाया जाने लगा जिनमें से अचार, पापड़, बरी जैसे घरेलु खाद्य उत्पाद बना कर बाजारों में कई स्टालों के माध्यम से बम्लेश्वरी ब्रांड से बेचा जाने लगा। और फिर क्या था, कहते है ना मेहनत का फल मीठा होता हैं, ऐसा ही कुछ फूलबासन के साथ भी हुआ। उनकी बनाई गई चीजों के स्वाद और गुणवत्ता के अनुसार उनकी अलग पहचान बनने लगी।

समय बीतता गया, और समय के साथ-साथ कई महिलाएं उनके इस समूह से जुड़ती चली गई। आज बम्लेश्वरी स्वयं सहायता समूह के लगभग 13 हजार समूहों में 2 लाख से भी अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं। जिसके परिणाम में आज इस समूह के खाते में लगभग 25 करोड़ से अधिक की राशि का उपयोग महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के मुद्दों से किया जाता हैं।

हालांकि, इस अभियान की शुरूआत एक गरीब चरवाहे की बेटी फूलबासन यादव ने की थी। लेकिन अब उसी चरवाहे की बेटी ने कृषि के क्षेत्र में भी अपना योगदान देना शुरू कर दिया है, और कृषि के क्षेत्र में महिलाओं को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। फूलबासन महिलाओं को जैविक खेती के प्रोत्साहन के साथ-साथ डेरी व्यवसाय भी मुहैया करा रही हैं, फूलबासन की ये कहानी गरीबी के क्षेत्र में खुदकों साबित कर दिखाने का एक अच्छा उदाहरण पेश करती हैं।

 

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