इंग्लिश मीडियम शिक्षा के दलदल से बच्चों को बाहर लाने में जुटे हैं मनोज स्वेन

मनोज स्वेन

आज के वक्त में हमारे देश में जहां हर गली, हर नुक्कड़ पर अंग्रेजी सीखाने की क्लासज दी जाती है। तो वहीं लोग भी बड़े उत्साह के साथ, 30 या 90 दिनों में अंग्रेजी का ज्ञान लेने पहुंच जाते हैं। अंग्रेजी सीखना तो मानों लोगों के लिए कोई परंपरा बन चली है। और वहीं अंग्रेजी न आने वाले खुद को बाकियों से कम समझने लगे हैं। हालांकि, हमारी मातृ भाषा हिंदी है, मगर फिर भी ना जानें क्यों लोग अंग्रेजी भाषा को हिंदी से ज्यादा तवज्जो देते हैं। इतना ही नहीं, अब तो अंग्रेजी ना आना गवार होने की निशानी भी बन गया हैं। यानी अगर अंग्रेजी भाषा पर आपकी पकड़ अच्छी नहीं है, तो आप गवार है..

लेकिन इन सब बातों से परे छत्तीसगढ़ के भिलाई में रहने वाले मनोज का मानना है कि, अंगेजी सिर्फ एक भाषा है जिसे जानना भी ज़रूरी है, किन्तु ये ज्ञान का माध्यम कभी नहीं हो सकता। इसे सिर्फ एक भाषा मानकर अलग से सीखें। भिलाई के मनोज स्वेन गुर्दे की गंभीर बीमारी से ग्रसित है, और करीब 28 साल पहले अपना किडनी ट्रांसप्लांट भी करा चुके है, मगर इसके बावजूद भी वो आदिवासियों और गरीबों के बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए शिक्षा क्रांति में लगे हुए हैं। मनोज ये सब कुछ अपने खर्चे पर करते हैं।

मनोज स्वेन का कहना है कि, अगर हमारे देश के सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाई व्यवस्था को ठीक से लागू किया जायेगा, तो पब्लिक स्कूलों में होने वाली ठगी से माता-पिता बच सकेंगे। अंग्रेजी भाषा कोई बड़ी चीज नहीं, मगर इसका ज्ञान भी जरूरी। बच्चे को यदि ठीक से ज्ञान दिया जायेगा, तो अंग्रेजी भाषा को वो सरलता से सीख लेगा।

आंखे खोलिए जनाब मनोज बोल रहा हूं, जी हां, यही तकियाकलाम हैं मनोज स्वेन का, जिनका एक वीडियों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा हैं, इस वीडियों में मनोज द्वारा शिक्षित किए गए 5 छात्र अंग्रेजी में एक डिबेट करते नजर आ रहे हैं। पूरे जोश के साथ अंग्रेजी बोलते ये बच्चे, किसी हाई-फाई कांवेंट स्कूल के छात्र नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ के कूकुर्दा के रहने वाले गरीब आदिवासी परिवारों के हैं। जिनको मनोज ने मुफ्त शिक्षा देकर आज इस मुकाम पर पहुंचाया हैं। कि ये बच्चे इतनी कम उम्र में ही अंग्रेजी का बेहतर ज्ञान जानते हैं।

मनोज के जीवन का बस एक ही लक्ष्य है, हिंदी मीडियम स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा का ज्ञान दिलाना। दरअसल, इस बात से तो हम सभी वाकिफ है कि, बड़े-बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगा देते हैं, मगर इसके बावजूद भी उनके बच्चे ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। मनोज दूसरों से बिल्कुल अलग हैं। वो शिक्षा को खेल बनाना चाहते हैं। बच्चों को पढ़ाई का खेल खिलाना चाहते हैं। बचा लो बचपन का नारा लगाने वाले मनोज सरकार से अपने इस नेक काम को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग चाहते हैं। हालांकि, इतने वक्त से वो अकेले ही अपनी शिक्षा क्रांति को सफल बनाने में लगे हुए हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में मनोज लोगों के लिए एक मिसाल बन गए हैं। अपनी तकलीफों, परेशानियों को अलग रखकर मनोज अपने शिक्षा क्रांति के सपने को पूरा करने में लगे हुए हैं। हालांकि, मनोज के पास अब ज्यादा समय नहीं हैं, बावजूद इसके वो अपने लक्ष्य को हासिल करने की जी तोड़ कोशिशों में जुटे हुए हैं।

 

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