एक महिला के महीने के वो पांच दिन आज भी हैं शर्म और उपेक्षा का विषय

महिलाओं
महिलाओं के महीने के वो पांच दिन ना जाने क्यों आज भी शर्म और उपेक्षा का विषय बने हुए हैं। आज भी इस पर बात फुसफुसा के होती है। आज भी जब किसी लड़की को घर के बाहर पेड का इस्तेमाल करना होता है तो वो अपने पर्स से धीरे से पेड निकालती है ताकि कोई देख ना लें अब ये हाल तो, शहरों का है अब सोचिए कि गांव की स्थिति क्या होगी जहां इस पर बोलना ही किसी जुर्म से कम नहीं है। जहां औरतें चाहे इस बीमारी की वजह से घुट घुट कर मर जाएं लेकिन वो इस बीमारी के बारे में ना ही किसी से बोल सकती हैं और ना ही खुलकर किसी से समाधान ले पाती हैं। आज भी हमारा सभ्य समाज जहां इस पर बात करने से भी कतराता है घिन करता है तो वहीं भारत की इस गंभीर समस्या पर बनी एक फ़िल्म ऑस्कर ले आई। जी हाँ क्योंकि अब इस मुद्दे को ऐसा मंच मिल रहा है जहां इसे बुलंद आवाज में बदला जा सके।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के काठी खेड़ा गांव की रहने वाली युवती स्नेह पर बनी भारतीय फिल्म निर्माता गुनीत मोंगा की फिल्म ‘पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस’ को ऑस्कर मिला है। ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’ को बेस्ट डॉक्युमेंट्री शॉर्ट कैटिगरी फिल्म के लिए ऑस्कर अवॉर्ड  मिला है। इस फिल्म को रयाक्ता जहताबची और मैलिसा बर्टन ने डाइरेक्ट किया है। ‘पीरियडः एंड ऑफ सेंटेंस’ फिल्म पिछले दिनों ऑस्कर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेटेड हुई थी। इसे ऑस्कर्स के शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री कैटेगरी में दुनियाभर की नौ और शॉर्ट डॉक्यूमेंट्रीज़ के साथ नॉमिनेट किया गया था। जो आखिरकार विनर भी रही। ये फिल्म भारत के ग्रामीण क्षेत्र में माहवारी के समय महिलाओं को होने वाली समस्या और पैड की अनुपलब्धता को दिखाती है। ये फिल्म नारी स्वास्थ्य जागरूकता को लेकर बनी है।
ये फिल्म हापुड़ जिले के गांव काठी खेड़ा की एक लड़की पर फिल्माई गई है। ये लड़की जिसका नाम स्नेह है वो अपनी सहेलियों संग मिलकर अपने ही गांव में सबला महिला उद्योग समिति में सेनेटरी पैड बनाती है। ये पैड गांव की महिलाओं के साथ नारी सशक्तीकरण के लिए काम कर रही संस्था एक्शन इंडिया को भी सप्लाई किया जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि जब एक महिला से पीरियड के बारे में पूछा गया तो वो कहती है मैं जानती हूं पर बताने में मुझे शर्म आती है। जब यही बात स्कूल के लड़कों से पूछी गई तो उसने कहा कि ये पीरियड क्या है? हमें तो यही मालूम है कि स्कूली घंटी बजती है, उसे पीरियड कहते हैं। तो फिल्म में पीरिड्स से जुड़े अंधविश्वास इस पर बात करने में कैसे लोग झिझकते हैं और आज भी ये मुद्दा कितना शर्म का विषय है यही सब इसमें दिखाया गया है।

फिल्म भारत की है मुद्दा यहां का है मगर इस फिल्म का आईडिया यहां का नहीं है। ये कहानी दिल्ली के पास हापुड़ गांव में रहने वाली महिलाओं की जरूर है लेकिन इसके पीछे का विचार आया लॉस एंजिलिस के ऑकवुड स्कूल की 12 से 14 साल की उम्र के बीच की लड़कियों को, जब उन्हें पता चला कि कई जगहों पर लड़कियों को अपनी पढ़ाई सिर्फ इसलिए छोड़ देनी पड़ती है, क्योंकि वो मासिक धर्म के समय सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल तक नहीं कर सकती क्योंकि ना वो इसे खरीद सकती हैं और ना किसी और से शर्म की वजह से मंगवा सकती है। जिसके बाद उन लड़कियों ने इसके लिए कुछ करने का निर्णय लिया।

फिर इन बच्चियों ने करीब 3 हजार डॉलर जो की करीब दो लाख रुपए हुए उन्हें जुटाया जिससे वो बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन कम दामों पर तैयार करने वाली मशीन खरीद सकें। इन बच्चियों ने इस काम में अपनी इंग्लिश टीचर मैलिसा बर्टोन की मदद ली। मैलिसा ने गर्ल्स लर्न इंटरनेशनल नाम की संस्था से संपर्क किया, ताकि वो किसी ऐसे गांव के बारे में बताएं जहां ये मशीन जरूरतमंदों की मदद के लिए दी जा सके। उसके बाद GLI ने ‘एक्शन इंडिया’ से संपर्क किया, जो दिल्ली के नजदीक स्थित गांव हापुड़ में काम कर रही थी। इसके बाद सैनिटरी पैड बनाने वाली ये मशीन हापुड़ पहुंचा दी गई। यहां की महिलाओं ने इस काम के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी दी।
जल्द ही एक कैम्पेन शुरू हुआ, जिससे मासिक धर्म को लेकर बनी सोच और मशीन से आए बदलाव पर फिल्म बनाने के लिए 40 हजार डॉलर यानि 28 लाख की रकम इकट्ठा की गई। फंड इकट्ठा होने के बाद प्रोजेक्ट टीम में गुनीत मोंगा प्रोड्यूसर के तौर पर जुड़ी, और इरानी-अमेरिकी डायरेक्टर रयाक्ता जहताबची ने डायरेक्शन की कमान संभाली और एक ख़ास बात है इस फिल्म की इस फिल्म में काम करने वाली 22 साल की स्नेह एक साधारण किसान की बेटी हैं। ये बड़ी बात है कि जिस मुद्दे पर गांव की लडकियां बात तक नहीं करती उन्ही में से एक गांव के किसान की साधारण सी बेटी ने इस फिल्म में एक्टिंग की है वो भी बिना किसी ट्रेंनिग के और इस तरह इस फ़िल्म ने ऑस्कर तक का सफ़र तय किया।

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