Wed. Jul 17th, 2019

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आनंदीबाई जोशी- भारत की पहली महिला जो 19 साल में बनी डॉक्टर

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आनंदीबाई जोशी
साल 1886 जब एक युवा लड़की चिकित्सक बनी जिनकी उम्र मात्र 19 साल थी। उनका नाम था आनंदी गोपाल जोशी। उनकी कहानी जितनी दिल को छू लेने वाली है उतनी ही साहस और दृढ़ता की प्रतीक है। जो महिलाएं आज के वक़्त में रूढ़िवादी सोच की बेड़ियों को नहीं तोड़ पाती उनके लिए मिसाल हैं अनादि गोपाल जोशी। आनंदी गोपाल जोशी उस वक़्त में डॉक्टर बनी जब महिलाएं ना ज्यादा घर से बाहर निकलती थी ना ऊंची आवाज़ में बात कर पाती थी और ना ही उन्हें अपने फैसले लेने का अधिकार था। उनकी कहानी भी इतनी दिलचस्प है कि आपका दिल भी बीच में से इसे छोड़ नहीं पाएगा।
डॉक्टर आनंदीबाई जोशी का जन्म 31 मार्च 1865 को हुआ। जैसा कि पहले होता था, पुणे में जन्मी  आनंदीबाई जोशी की शादी नौ साल की उम्र में करीब 25 साल के गोपालराव जोशी से हुई थी। उस ज़माने के हिसाब से ना तो ये कोई चौंकने वाली बात थी और ना ही इस पर तब कोई हैरानी जताता था। शादी तो उनकी हो गई मगर बड़ी बात ये थी कि उनके पति बाकि के मर्दों की तरह नहीं थे बल्कि उनके पति गोपाल को ज़िद थी कि अपनी पत्नी को ज़्यादा-से-ज़्यादा पढ़ाएं। इसलिए उन्होंने एक नहीं बल्कि दो दो परिवारों का  तिरस्कार झेला एक तो उनका खुद का और दूसरा आनंदी के घरवालों का भी।

मगर गोपाल राव पोस्ट ऑफिस में काम करते थे और वो एक उच्च विचारों और नारी शिक्षा को बढ़ावा देने वाले व्यक्ति थे। मगर उन्होंने अपनी पत्नी को पढ़ाने के लिए सात समंदर पार अमेरिका भेजकर उसे पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनाने का इतिहास रचा। क्योंकि गोपालराव की आनंदी से शादी की शर्त ही यही थी कि वे पढ़ाई करेंगी। शादी के वक्त आनंदी को अक्षर ज्ञान भी नहीं था तो उनके पति गोपाल ने उन्हें क,ख,ग से पढ़ाया। अक्षर ज्ञान के बाद गोपाल, आनंदी के लिए अगली कक्षा की किताबें लाए। फिर वो कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले गए। जब वापस लौटे तो देखा कि आनंदी घर में खेल रही थी। वो गुस्से से बोले कि तुम पढ़ नहीं रही हो।

आनंदी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, जितनी किताबें थी सब पढ़ चुकी। ये बिलकुल ऐसा था जैसे एक पिता अपनी बेटी को पढ़ाने लिखाने की ख्वाहिशें रखता है। इसके बाद वो बड़ी हुईं 14 साल की उम्र में उनका पहला बच्चा हुआ लेकिन सबकुछ ज़िंदगी में हमेशा ठीक भी नहीं चलता रहता। बच्चा होने के दस दिन में ही उस बच्चे की मौत हो गई। मगर बच्चे की मौत ने ही नन्ही सी आनंदी को डॉक्टर बनने की प्रेरणा दी। क्योंकि उस समय उनके उस बच्चे को बचाने के लिए कोई डॉक्टर नही था। इसके बाद उन्होंने भारत में महिलाओं और बच्चे के इलाज के बारे में सोचा। जिसके बाद उनकी दिलचस्पी मेडिकल के क्षेत्र में बढ़ी और उन्होंने शिक्षा हासिल कर डॉक्टर बनने की ठान ली।
इसलिए अब सिर्फ उनके पति ही नहीं बल्कि उनकी भी चाहत डॉक्टर बनने की होने लगी। अचानक लिए गए उनके इस फैसले से उनके परिजन और आस-पड़ोस में विरोध की लहर उठ खड़ी हुई। उनकी काफी आलोचना भी की गयी। समाज को ये कतई गवारा नहीं था कि एक शादीशुदा हिंदू औरत विदेश जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करे। लेकिन उन्होंने इन आलोचनाओं की तनिक भी परवाह नहीं की और इस फैसले में उनके पति गोपालराव ने भी पूरा साथ दिया। जिसके बाद आनंदी मेडिकल क्षेत्र में शिक्षा पाने के लिए अमेरिका गईं और साल 1886 में 19 साल की उम्र में उन्होंने MD की डिग्री हासिल कर ली।
आनंद गोपाल जोशी ने महिला मेडिकल कॉलेज ऑफ पेन्सिलवेनिया से मेडिकल डिग्री प्राप्त की, इस डिग्री को अब ड्रक्सेल यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन के नाम से जाना जाता है। वो एमडी की डिग्री पाने वाली और पहली भारतीय महिला डॉक्ट र बनीं। डिग्री लेने के बाद आनंदीबाई वापस देश लौटीं उन्होंने कुछ सपने देखे। भारत में उनका सपना महिलाओं के लिए मेडिकल कॉलेज खोलने का था।  उन्होंने अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल, प्रिंसलि स्टेट ऑफ़ कोल्हापुर में एक महिला डॉक्टर के रूप में चार्ज ले लिया, लेकिन डॉक्टर बनने के बाद अगले साल यानि 1887 में टीबी की वजह से 22 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।
जिस दौर में महिलाओं तो क्या पुरुषों की शिक्षा को भी इतना महत्व नहीं दिया जाता था,और महिलाओं की शिक्षा किसी सपने से कम नहीं थी, उस दौर में आनंदी गोपाल जोशी ने अपने सपने को साकार करने के लिए विदेश में जाकर डॉक्टरी की डिग्री हासिल की और महज 21 साल की उम्र में साल 1886 में डॉक्टर की डिग्री हासिल कर न सिर्फ देश का मान भी बढ़ाया बल्कि बाकी लोगों के लिए एक मिसाल भी कायम की। वाकई साहस और संघर्ष से भरी आनंदी गोपाल जोशी की जिंदगी की कहानी दिल छू जाने वाली है। आनंदी गोपाल जोशी का प्रभावशाली व्यक्तित्व उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है, जो बड़े-बड़े सपने तो देखती हैं लेकिन समाज और परिवार के डर से उनके सपने घर की चार दीवारी में ही कैद रहते हैं।

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