राशन कार्ड बनाने को लेकर जिलापूर्ति से लेकर अधिकारियों के यहां भटकते लोग

राशन कार्ड

बात उत्तर प्रदेश के योगी सरकार की करें तो, जहां एक तरफ योगी आदित्यनाथ अपने फरियादी भाषणों से, जनता के साथ मधुर वर्ताव स्थापित करने का पाठ अपने मंत्रियों और अपने अधिकारियों को पढ़ाते रहते हैं. फिर आये दिन कुछ न कुछ ऐसी खबरें रोज आती रहती हैं. जिससे पता चलता है कि, योगी सरकार के दावे कितने झूठे और कितने दिखावे वाले हैं क्योंकि योगी के जिम्मेदार अफसर दफ्तर में आए दिन पीड़ित जनता के साथ दुर्व्यवहार करने में लगे रहते हैं. जिससे ऐसा कहा जा सकता है कि, पीड़ित फरियादियों में सरकार के प्रति असंतोष और आक्रोश व्याप्त हो रहा है.

इसी तरह का एक मामला देवरिया जनपद के जिलापूर्ति विभाग से सामने आया है. जहां राशन कार्ड बनवाने और राशन कार्ड में अपना नाम अंकित कराने के लिए गांव शहर से आये गरीब मजदूरों और गरीबों को अपने निवालों के लिए अधिकारियों से मिन्नतें करनी पड़ रही है. हालांकि आलम ये है कि, अधिकारी उन्हें ऊंची फटकार लगाकर बदसलूकी के साथ दफ्तर से बाहर भगा देते हैं. जिससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि, सरकार के सख्त आदेश अधिकारियों के दफ्तरों और कागजों में ही दम तोड़ रहे हैं. चलिए हम आपको दिखाते हैं उन गरीबों की राशन कार्ड बनवाने की दास्तां, जिसे देखकर और सुनकर आप अधिकारीयों को कोसने पर मजबूर हो जायेंगे.

कहते हैं इंसान सुबह से शाम तक मेहनत इसलिए करता है ताकि उसे शुकून से रात का खाना मिल सके. इसलिए सरकार भी गरीबों के लिए नये नये फरमान लेकर आती है. जिससे गरीबों को दो वक्त का खाना आसानी से मुहैया हो सके. इसलिए सरकार राशन की व्यवस्था उपलब्ध कराती है. जिसके लिए गरीब परिवारों के राशन कार्ड बनाये जाते हैं और वही बनवाने के लिए ये लोग काफी समय से अपने गांव से दूर देवरिया जिला पूर्ति में आते हैं. ये कतार में इस तरह खड़े लोग, यहां राशन लेने के लिए नहीं बल्कि अपना हक लेने के लिए आए हैं. वो हक जो सरकार ने तो दिया है. हालांकि यहां के अधिकारी अपने गद्दी के नीचे दबा कर बैठे हैं. चाहे बात पथरदेवा ब्लॉक के कंठीपट्टी की रहने वाली विधवा महिला रमावती सिंह की हो, या गौरीबाजार के श्मशाद अली की…दोनों ही इस कतार में इसलिए लगे हैं, ताकि यहां के अधिकारी इनकी फरियाद सुन ले और इन्हें राशन कार्ड बना कर दे दें.

अपनी मजबूरी और बेबसी के चलते इस कतार में लगे लोगों से जब हमने ये जानने की कोशिशें की तो उन्होंने किसी ने इसका जिम्मेदार जिलापूर्ति विभाग को बताया तो, किसी की मजबूरी और बेबसी आँसुओं के सैलाब के साथ आंखों से बाहर निकल आया. काफी समय से जिलापूर्ति विभाग के चक्कर काट रहे श्मशाद अली की दास्तां भी इन्हीं कतारों में लगे लोगों जैसी है. हालांकि हालात थोड़े बिखरे हुए हैं. जिन्हें संभालने के चलते श्मशाद अली पिछले काफी समय से इस विभाग के चक्कर काट रहे हैं. जिससे उनकी फरियाद उन लोगों तक पहुंच जाये और उन्हे सरकार से मिलने वाले फायदे से थोड़ी राहत मिल जाये.

सरकारें लाख दावे क्यों ना करें, असल हकीकत अभी भी वही है. जो इस खबर में है की सरकार कितनी भी कोशिशें क्यों ना करती रहे. जिससे गरीबों और अमीरों के भेदभाव को मिटाया जा सके. जिससे योजनाओं का लाभ सभी को मिल सके. हालांकि सरकारी दफ्तरों की कोठरी में बैठे लोगों हमेशा से इन लोगों की आवाज नीचे दबा देते हैं मजबूर लोग हकदार होते हैं. जिसके चलते गरीबों की आवाज ना तो बाहर ही आ पाती है और ना ही उनका गुजारा ही चल पाता है. ऐसे में लोगों के पास इस ही चारा बचता है. चुपचाप जो हो रहा है. उसे होने देने का क्योंकि ये बेबस लोग इसके अलावा और कुछ नहीं कर सकते.

 

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