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Kisan Bulletin 8th July 2019-इस किसान ने इजाद की गेंहू की नई प्रजाति

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Kisan Bulletin 8th July 2019-

Kisan Bulletin 8th July 2019-इस किसान ने इजाद की गेंहू की नई प्रजाति

Kisan Bulletin 8th July 2019-

जहां एक तरफ केंद्र सरकार आने वाले सालों में किसानों की आय दोगुनी करने और नई नई योजनाऐं धरातल पर लाकर किसानों को आश्वासन दे रही है, वहीं अधिकतर किसानों की मानें तो सरकार उन्हें महज लॉलीपॉप दे रही है. क्योंकि असल धरातल पर देखा तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. कुछ ऐसा ही हाल ज्यौड़ियां के किसानों का भी है, जहां के किसानों को अपने खेतों में पानी पहुंचाने के लिए भी खुद ही नाले नहर की सफाई भी करनी पड़ रही है. आपको बता दें कि, पंचायत सैंथ के गांव खरोटा के किसानों की मानें तो उन का गांव प्रताप कनाल के टेल के पास पड़ता है और गांव के लगभग 95 फीसदी लोग खेती पर ही निर्भर हैं. इसके बाद भी उनके खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए यहां मौजूद नाली और नहरों की सफाई नहीं कराई गई है. हमने इसके लिए सरकारी विभागों से लेकर कार्यलायों के चक्कर लगा लिए लेकिन हमारी किसी ने नहीं सुनी, यही वजह है कि इस समय हम सभी खुद ही नाले और नहर की सफाई करने पर मजबूर हैं ताकि, हमारे खेतों तक पानी हम पहुंचा सके. जाहिर है, मानसून से लेकर मानसून के बिना अधिकरतर किसानों की खेती नहरों में आने वाले पानी पर निर्भर होती है. हालांकि नहरों की बराबर सफाई न होने से नहरों के कटने और पानी बर्बाद होनी सी समस्याऐं बनी रहती है. जिसके चलते किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है.

जहां पूरे देश में आए दिन खेतों को लेकर नई नई परेशानियों किसानों की चिंताओं में और इजाफा कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के अन्य कोनों में ऐसे न जाने कितने ही किसान हैं जो आए दिन अपनी मेहनत और हुनर से खेती में बदलाव ला रहे हैं, कुछ इसी तरह ही नैनीताल जिले के ब्लॉक हल्दवानी के गौलापार के गाँव मल्लादेवला के रहने वाले नरेंद्र सिंह मेहरा कर रहे हैं. यही वजह है कि, इस समय इनके आसपास ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के कई जिलों में इन्हें लोग मेहरा जी के नाम से पहचानने लगे हैं. आपको बता दें कि नरेंद्र सिंह मेहरा उत्तराखंड के पहले ऐसे किसान हैं जिन्होंने गेहूं की संवर्धन और संरक्षण की दिशा में काम करते हुए गेहूं की नई प्रजाति इजाद कर डाली. भूगोल से पोस्ट ग्रेजुएट और टूरिज्म में पीजी डिप्लोमा करने वाले नरेंद्र सिंह आज प्रगतिशील किसानों की उस लिस्ट में शामिल हो गए हैं जो खेती को बेहतर करने के लिए उसमें कुछ बदलाव लाने के लिए काम करते हैं. खेती को बढ़ावा देने और उसमें बदलाव लाने के लिए अब तक कई प्रयास कर चुके नरेंद्र सिंह मेहरा को मुख्यमंत्री के साथ कई अन्य संस्थाऐं अब तक सम्मानित कर चुकी हैं. वहीं नरेंद्र सिंह मेहा की मानें तो, उनका कहना है कि, मैंने पिछले साल बिना पानी के धान की खेती का प्रयास किया था जोकि सफल रहा था. इसी तरह मैंने गेहूं पर भी प्रयास किया, अभी तक मैंने जो काम किए हैं सभी अपने संसाधनों से हालांकि अब मेरे कामों को देखते हुए कृषि विभाग ने मुझे एक टैंक दिया है, साथ ही उद्यान विभाग ने एक पॉली हाउस, मैं खेती को बढ़ावा देना चाहता हूं और उसी में अग्रसर हूं. जाहिर है जहां एक तरफ आए दिन खेती में होते नुकसान के चलते अधिकतर किसान हताशा और निराशा से परेशान हो जाते हैं वहीं नरेंद्र मेहरा जैसे लोग किसानों के साथ युवाओं की भी प्रेरणा बनते हैं.

खेती में दिनों दिन बढ़ते रासायनिक पदार्थों के उपयोगों के चलते जहां एक तरफ खेती में आए दिन समस्याऐें पैदा हो रही हैं, वही वेस्ट यूपी में कृषि भूमि में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में कमी दर्ज की जा रही है. जिसके चलते मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो रही है. कृषि विशेषज्ञों की मानें तो यदि समय रहते इस समस्या पर काम नहीं किया गया तो आने वाले समय में इसका विपरीत असर फसलों पर पड़ने वाला है. यही वजह है की इस समस्या से निपटने के लिए ऑर्गेनिक मैटर मिशन 2025 योजना शुरू करने की तैयारी की जा रही है. आपको बता दें की हाल ही में लखनऊ के प्रदेश के प्रमुख सचिव कृषि शिक्षा अनुसंधान अमित मोहन प्रसाद ने बैठक की थी. जिसमें तमाम कृषि विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया था. इस दौरान प्रदेश में मिट्टी में घटती कार्बनिक पदर्थों की मात्रा को कैसे बढ़ाया जाए इस विषय को भी लेकर चर्चा की गई. विशेषज्ञों की मानें तो इस वक्त प्रदेश के अधिकांश जगहों पर कृषि भूमि में कार्बनिक पदार्थों की 0.2 से 0.4 के बीच है जोकि मानक से कम है. इसको बढ़ाने के लिए सरकार ऑर्गेनिक मैटर मिशन 2025 योजना शुरू करने की तैयारी बना रही है. वहीं कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो, इस समस्या से मेरठ, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर, मथुरा, आगरा, गाजियाबाद, मुरादाबाद से लेकर प्रदेश के कई ऐसे जिले हैं जहां मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा 0.2 से 0.3 ही रह गई है. यही वजह है की इस योजना में मिट्टी में कॉर्बनिक क्षमता बढ़ाने के लिए किसानों को ऑर्गेनिक खेती पर जोर देने और फसलों पर पेस्टीसाइड का कम उपयोग करने की तकनीक किसानों को दी जाएगी. हालांकि किसान भाई अपने खेतों में कॉर्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने के लिए  ढैंचा, सनई या लोबिया जैसी फसलों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

 

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