Kisan Bulletin 12th May 2019- किसानों को कम दाम पर मिलेंगे लीची के पौधे

Kisan Bulletin 12th May 2019

Kisan Bulletin 12th May 2019-

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पशु पालन महकमे की ओर से बकरी पालन योजना के अंतर्गत अच्छी नस्ल के पशु न देने को लेकर पशुपालक स्वारघाट में भड़क गए. पशु पालकों की मानें तो उनका कहना है की विभाग के पास 40 प्रतिशत से ज्यादा राशि जमा करवाई गई थी. लेकिन उसके बाद भी उन्हें अच्छी किस्त की बकरियां नहीं दी गई. वहीं इस पूरी घटना के बाद क्षेत्र  के पशुपालकों में सरकार के खिलाफ भी भारी रोष दिखाई दे रहा है. आपको बता दें की कुल 58 बकरी व बकरे पशु निरीक्षण संस्थान स्वारघाट के तरह आने वाले पशुपालकों व किसानों को दी जानी है. जिसमें से पशु निरीक्षण संस्थान की तरह से 46 बकरियां और 12 छोटे बकरे वापस कर दिए गए. पशुपालकों का आरोप है कि पशुपालन विभाग अच्छी नस्ल के बकरी व बकरे नहीं लेकर आए हैं जिसके चलते कई पशु पालक बिना पशु लिए अब तक खाली हाथ अपने घर वापस लौट गए हैं. वहीं संस्थान में आए एक पशुपालक धर्म सिंह की मानें तो वो बताते हैं की मैनें 22 हजार की राशि बकरी पालन योजना में लगाई थी ताकि पशुपालन विभाग की तरह से अच्छी नस्ल के पशु मिल सकें. इस राशि में मुझे 10 बकरी और 1 बकरा लेना था लेकिन यहां तो गरीबों को ही ठगा जा रहा है. किसानों और पशुपालकों की मानें तो उनका कहना है की पशुपालन विभाग के खिलाफ जांच बैठानी चाहिए. ताकि पशुपालन विभाग के लोग गरीब पशुपालकों और किसानों को यूं बेवजह परेशान न करें और हमें अच्छी नस्ल के पशु मिल सकें. जाहिर है, सरकारें किसानों के लिए वक्त वक्त पर नई और बेहतर योजनाऐं लेकर आती रही हैं लेकिन गद्दी पर बैठे अधिकारी हमेशा से किसानों की योजनाओं पर पहले से ही कुंडी मार कर बैठ जाते हैं.. जिससे किसानों परेशानियों का सामना करना पड़ता है..

जहां आए दिन मौसम में हर साल बारिश की कमी देखी जा रही है तो वहीं सूखे की चपेट में न जानें कितने किसानों की हर साल महीनों की फसल खराब हो जाती है. ऐसे में वैज्ञानिकों ने सोयाबीन के जीनोटाइप की पहचान कर उसकी एक ऐसी किस्म बनाने का दावा किया है जिसका सूखे के समय भी उत्पादन पर असर नहीं पड़ेगा. जहां एक तरह पिछले कुछ सालों में सूखे का सबसे अधिक प्रभाव खेती पर पड़ा है तो वहीं हमारे देश में 60 प्रतिशत से ज्यादा खेती बारिश पर ही आधारित रहती है. ऐसे में सोयाबीन की भी खेती मुख्य रूप से बारिश पर ही आधारित क्षेत्रों में की जाती है. जिससे सोयाबीन की भी खेती पर सूखे का असर दिखाई देता रहा है. उसी को देखते हुए इंदौर के भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने सूखा सहन करने वाले सोयाबीन के सोलह जीनोटाइप का अध्ययन किया है और संस्थान एक ऐसी किस्म बनाने का दावा किया है जोकि सूखा ग्रसित इलाके में भी उगाई जा सकती है. आपको बता दें कि, 12 मिलियन टन उत्पादन के साथ भारत सोयाबीन उगाने वाली देशों में शीर्ष क्रम में है. जहां सोयाबीन को भारत में खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है तो वहीं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान इसके उत्पादन में काफी अहम भूमिका निभाते हैं. ऐसे में सूखे की परेशानियों को देखते हुए भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र सिंह भाटिया बताते हैं कि, “हमने जो अध्ययन किया है उसमें हमें चार किस्म के सोयाबीन जीनोटाइप मिले हैं जोकि सूखे के प्रतिरोधी मानें गए हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाले किसान अब अमरूद और पपीते की जगह आने वाले दिनों में जल्द ही मुजफ्फरपुर में उगने वाली लीची की वैरायटी की खेती करने वाले हैं। इसके लिए लीची के पौधे बस्तर में ही मिलेंगे और वो भी काफी कम दामों पर उपलब्ध होंगे। आपको बता दें कि, पांच सालों के अंदर तैयार होने वाले इस लीची के पौधे की खेती को विकसित करने की योजना के तहत किसानों को लीची के पौधों को शहर में स्थित डोंगाघाट की नर्सरी से 40 रूपए प्रति पौधे के हिसाब से दिया जाएगा। जानकारी के मुताबिक राज्य का उद्यानिकी विभाग बीज के उत्पादन और अन्य वैरायटी के पौधों को तैयार करने के बाद उन्हें कम दाम पर पौधे बेचकर बागवानी फसलों की तरफ किसानों को आकर्षित करने में लगा हुआ है। विभाग ने नर्सरी में लीची के पौधे लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। यहां नर्सरी से किसानों को आम के बारहमासी और दशहरी, कटहल, सीताफल, अमरूद, चीकू, पापीता, नारियल, काजू और फूलों में गुलाब के साथ-साथ क्रोटना, ड्रेसिना और आरेलिया, फुटबाल लिली के साथ अन्य फूलों की प्रजातियां भी उपलब्ध करवाई जा रही है। उद्यानिकी विभाग ने कहा कि फिलहाल बस्तर में मौसम काफी बेहतर है और यह लीची उत्पादन के लिए उपयुक्त है। किसानों की आमदनी को बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है। नर्सरी के प्रभारी ने कहा कि वह इस तरह की कोशिश कर रहे है कि किसानों को कम दाम पर अच्छे और सस्ते फल और फूल उपलब्ध हो, इसके लिए कई सालों से लगातार कोशिश की जा रही है, जो कि अब जाकर सफल हुई है।

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