किसी गांव में फ्री में मिलता है दूध तो किसी गांव के हर घर में पैदा होते हैं जुड़वाँ बच्चे, ऐसे हैं देश के ये 18 अजब गजब गांव

इंडिया चाहे जितनी भी प्रोग्रेस कर ले और चाहे कितनी ही बड़ी बड़ी इमारतें और शहर खड़े कर ले, लेकिन भारत का दिल तो गांवो में ही बसता है। क्योकि यही से तो असली भारत की झलक दिखाई देती है। इसलिए गावों का महत्व हमेशा था, है और रहेगा भी। हमारे देश में कई ऐसे गांव है जो अपनी एक खास विशेषता के लिए जाने जाते है। ऐसे गाँव जिनके किस्से सुनकर आप भी चौंक जाएंगे। आप सोचने पर मजबूर हो जाओगे कि क्या ऐसे भी गाँव होते हैं ! आइए हम आपको बताते है भारत के कुछ अजीबोगरीब और हैरान करने वालें गांवो के बारें में

धोकड़ा गाँव, गुजरात

आज के समय में जहां कुछ लोग पानी तक को नहीं पूछते वहीं धोकड़ा गाँव के लोग कभी दूध या उससे बनने वाली चीज़ो को बेचते नही हैं बल्कि उन लोगों को मुफ्त में दे देते हैं जो जरूरतमंद होते हैं और या फिर जिनके पास गाय या भैंसे नहीं होती। यहां पर रहने वाले एक पुजारी बताते हैं की उन्हें महीने में करीब 7,500 रुपए का दूध गाँव से मुफ्त में मिलता है।

शनि शिन्ग्नापुर, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा तालुके में शनि शिन्ग्नापुर भारत का एक ऐसा गाँव है जहाँ लोगों के घर में एक भी दरवाजा नही है यहाँ तक की लोगों की दुकानों में भी दरवाजे नही हैं, यहाँ पर कोई भी अपनी बहुमूल्य चीजों को ताले चाबी में बंद करके नहीं रखता फिर भी गाँव में आज तक कभी कोई चोरी नही हुई।

मुत्तुरु गाँव, कर्नाटक

हमारे देश की राष्ट्र भाषा हिंदी है लेकिन आज अधिकतर जगह अंग्रेजी में बात की जाती है। यहाँ तक की स्कूल कॉलेज और नौकरियों में भी इंग्लिश जरुरी है।वही संस्कृत तो मानों जैसे गायब ही हो गई है। ना स्कूल के पाठ्यक्रम में और ना ही बोलचाल में अब संस्कृत दिखाई पड़ती है। लेकिन कर्नाटक के शिमोगा शहर के कुछ ही दूरी पर एक ऐसा गाँव हैं जहाँ लोग केवल संस्कृत में ही बात करते हैं। इस गांव में संस्कृत प्राचीन काल से ही बोली जाती है। गाँव की विशेषता हैं कि गाँव की मातृभाषा संस्कृत हैं और काम चाहे कोई भी हो संस्कृत ही बोली जाती हैं।

सलारपुर खालसा गाँव, उत्तर प्रदेश

अमरोहा जनपद के जोया विकास खंड क्षेत्र का छोटा सा गांव सलारपुर खालसा है। 3500 की आबादी वाले इस गांव का नाम पूरे देश में छाया है और इसका कारण है टमाटर। गांव में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर होती है। देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां पर सलारपुर खालसा की जमीन पर पैदा हुआ टमाटर न जाता हो। गांव में 17 साल से चल रही टमाटर की खेती का क्षेत्रफल फैलता ही जा रहा है। कारोबार की बात करें, तो पांच माह में यहाँ 60 करोड़ का कारोबार होता है।

कोडिन्ही गाँव

केरल के मलप्पुरम जिले में स्तिथ कोडिन्ही गाँव को जुड़वों के गाँव के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर वर्तमान में करीब 350 जुड़वा जोड़े रहते है जिनमे नवजात शिशु से लेकर 65 साल के बुजुर्ग तक शामिल है। विश्व स्तर पर हर 1000 बच्चो पर 4 जुड़वाँ पैदा होते है, एशिया में तो यह औसत 4 से भी कम है। लेकिन कोडिन्ही में हर 1000 बच्चों पर 45 बच्चे जुड़वा पैदा होते है।

कुलधरा गाँव

हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा गाँव की, ये ये गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं। कुलधरा गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं। कहा जाता है कि ये गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता ये गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है

मलाणा गाँव

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के अति दुर्गम इलाके में स्तिथ है मलाणा गाँव। इसे आप भारत का सबसे रहस्यमयी गाँव कह सकते है। यहाँ के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते हैं। यहां पर भारतीय क़ानून नहीं चलते है यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। मलाणा भारत का इकलौता गांव है जहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की पूजा की जाती है। कुल्लू के मलाणा गांव में यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने किसी चीज़ को छुआ तो जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की रकम 1000 रुपए से 2500 रुपए तक कुछ भी हो सकती है। अगर इस गांव में किसी ने मकान-दुकान या यहां के किसी निवासी को छू लिया तो यहां के लोग उस व्यक्ति को तुरंत जुर्माना देना पड़ता है।

मैक्लुस्कीगंज गाँव

 

झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बा गांव है मैक्लुस्कीगंज। एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए बसाई गई दुनिया की इस बस्ती को मिनी लंदन भी कहा जाता है। घनघोर जंगलों और आदिवासी गांवों के बीच सन् 1933 में कोलोनाइजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया ने मैकलुस्कीगंज को बसाया था। 1930 के दशक में रातू महाराज से ली गई लीज की 10 हजार एकड़ जमीन पर अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नामक एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने इसकी नींव रखी थी। चामा, रामदागादो, केदल, दुली, कोनका, मायापुर, महुलिया, हेसाल और लपरा जैसे गांवों वाला इलाका 365 बंगलों के साथ पहचान पाता है जिसमें कभी एंग्लो-इंडियन लोग आबाद थे।

उप्पलां गांव

इस गाँव में अब लोगों की पहचान उनके घरों पर बनी पानी की टंकियों से होती है। अब आप सोच रहे होंगे की पानी की टंकियों में ऐसी क्या विशेषता है तो हम आपको बता दे की यहाँ के मकानो की छतो पर आम वाटर टैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर शिप, हवाईजहाज़, घोडा, गुलाब, कार, बस आदि अनेकों आकर की टंकिया है। गांव में खास तौर पर एनआरआईज की कोठियों में छत पर इस तरह की टंकिया रखी है। अब कोठी पर रखी जाने वाली टंकियो से उसकी पहचान की जाती है।

मलूटी गांव

झारखंड के दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे एक छोटे से गांव मलूटी में आप जिधर नज़र दौड़ाएंगे आपको प्राचीन मंदिर नज़र आएंगे। मंदिरों की बड़ी संख्या होने के कारण इस क्षेत्र को गुप्त काशी और मंदिरों का गाँव भी कहा जाता है। इस गांव का राजा कभी एक किसान हुआ करते था। उसके वंशजों ने यहां 108 भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया। ये मंदिर बाज बसंत राजवंशों के काल में बनाए गए थे। शुरूआत में कुल 108 मंदिर थे, लेकिन संरक्षण के आभाव में अब सिर्फ 72 मंदिर ही रह गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण 1720 से लेकर 1840 के मध्य हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण सुप्रसिद्व चाला रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण-महाभारत के दृश्यों का चित्रण भी बेहद खूबसूरती से किया गया है।

मोलीनॉन्ग गाँव

हमारा देश में सफाई के मामले में बहुत पीछे है लेकिन हमारे देश में एक ऐसा गांव है जो एशिया का सबसे साफ़ सुथरा गांव है.. ये गांव है मोलीनॉन्ग जो मेघालय के खासी हिल्स डिस्ट्रिक्ट में है. सफाई के साथ-साथ ये गांव साक्षरता में भी नम्बर 1 है यहां पर 95 परिवार रहते है जिनकी जीविका का मुख्य कारण सुपारी है. इतना ही नहीं यहां के ज्यादातर लोग अंग्रेजी में बात करते है. गांव के लोग साफ-सफाई के लिए इतने जागरूक है कि अगर यहां के बच्चे भी सड़क पर कचरा देख ले तो तुरंत सफाई में जुट जाते है।

पटवाटोली

साल 1971 में इस गाँव के रामलगन यादव ने काफी संघर्ष के बाद आईआईटी की परीक्षा पास कर आईआईटी खड़गपुर से आर्किटेक्चर की पढाई की। उनकी इस सफलता ने बाकी लोगों के लिए मार्गदर्शन का काम किया। उसके बाद तो जैसे इस गांव से आईआईटी इंजीनियर बनने का सिलसिला चल पड़ा जो आज तक जारी है। गौरतलब है कि यहां के कई घरों से आधे दर्जन लोग इंजीनियर है। गर्व की बात है कि आज पटवाटोली के इंजीनियर्स दुनियाभर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके है। यहां के 30 से ज्यादा इंजीनियर्स के परिवार आज अमेरिका के निवासी है। इसके अलावा यहां के कई इंजीनियर्स सिंगापुर, दुबई, नेपाल, हांगकांग, कनाडा में कार्यरत है। आज यहां से आई आई टी के अलावा एन आई टी, बी आई टी आदि को मिलाकर सैकड़ों लोग इंजीनियर बन चुके हैं। अब ये गांव पूरे हिन्दुस्तान में आई आई टी विलेज के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है।

माधोपट्टी

मशहूर शायर वामिक जौनपुरी के बेटे मुस्तफा हुसैन ने सर्वप्रथम साल 1914 में सिविल सर्विस ज्वाइन की थी। उसके बाद इसी गांव के इंदुप्रकाश ने साल 1952 में आई ए एस की परीक्षा पास की जिसके बाद से इस गांव में सिविल सर्विसेज को लेकर एक अलग ही आकर्षण पैदा हो गया। 75 परिवारों के इस छोटे से गांव से अब तक 47 लोग उच्च प्रशासनिक पद पर काबिज़ हो चुके हैं। यहां के निवासी छत्रपाल सिंह ने अपने सेवाकाल में तामिलनाडु के मुख्य सचिव तक का पदभार संभाला है। गांव के सीमित साधन एवं अपनी कमजोर अंग्रेजी के बावजूद यहां के ज्यादातर छात्र अपनी बारहवीं के बाद ही सिविल सर्विसेज की तैयारी में लग जाते है।

बिजौली गांव

ग्वालियर के बिजौली ग्राम पंचायत निवासी जगन्नाथ सिंह परमार ने भी कभी खेलों में अपना भविष्य बनाने का ख्वाब देखा था। मगर पैसे की तंगी आदि के कारण उनका ये सपना पूरा न हो सका। उसके बाद उन्होंने अपने सपने को गांव के युवाओं की आँखों में उतार कर देखना शुरू कर दिया। उन्होंने ऐसे खेल के बारे में सोचना शुरू किया जिसमें कम से कम खर्च करना पडे़ और उनकी ये तलाश खत्म हुई कबड्डी के खेल पर जाकर जहां उनका खर्च चूना पाउडर का था। उसके बाद उन्होंने अपने गांव के बच्चों को कबड्डी के खेल का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। आज उनके द्वारा तैयार किए गए 250 स्टार खिलाड़ी है जिनमें से कई भारतीय कबड्डी टीम में है। आज बिजौली के हर घर में नेशनल, स्टेट व डिवीजन लेवल का एक खिलाड़ी है। इसके अलावा जगन्नाथ सिंह परमार अब यहां के बच्चों को कुश्ती का प्रशिक्षण भी देकर उन्हें विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं के लिए तैयार कर रहे हैं।

म्योंग गांव

गुवाहाटी से 40 किलोमीटर दूर पोवीतोरी वन्यजीव उद्यान के पास स्थित म्योंग गांव के बारे में कहा जाता है कि ये प्राचीन काले जादू की धरती है। यहाँ प्रचलित कहानियों के अनुसार इस स्थान का नाम म्योंग संस्कृत के शब्द ‘माया’ के नाम पर रखा गया था क्योंकि ये एक मायानगरी है। कहा जाता है कि यहां इंसान अचानक खड़े-खड़े हवा में गुम हो जाया करते थे । साथ ही यहां के तांत्रिक जादूगर अपने तंत्र-मंत्र की शक्ति से खूंखार जंगली जानवरों को भी पालतू बना लिया करते थे। वही यहां बनाए गए म्यूजि़यम में आज भी तंत्र साधना और आर्युवेद शास्त्र से जुड़े अनगिनत प्रमाणों को संभाल कर रखा गया है। आज भी स्थानीय लोग यहां बड़े पैमाने पर जादू-टोना, झाड़-फ़ूक करते-करवाते देखे जाते है। मजे की बात है कि आज भी इस जगह का तिलिस्म वैसे ही बरकरार हैं जैसे पहले था। वहीँ इस स्थान को इसके रहस्मय और विचित्र कहानियों और आम लोगों के कौतुहल के कारण एक खूबसूरत पर्यटन स्थल बना दिया है। जहाँ पर्यटक जंगल सफारी, रिवर टूरिज्म, नेचर टूरिज्म, अर्कीलोजिकल टूरिज्म, धार्मिक पर्यटन, नौका विहार, का मजा लेने जाते है।

किशनगंज

बिहार के किशनगंज में बिहार-बंगाल की सीमा पर एक छोटा सा गाँव है मोतीबाग कर्बला, जिसे बिहार का ईरान कहा जाता है। यहाँ के बाशिदों के दादा-परदादा मुगलकाल में हिन्दुस्तान आए थे और उसके बाद यहीं के होकर रह गए। अपनी संस्कृति को जिन्दा रखने के लिए यहाँ के लोग आपस में फारसी में बात करते हैं। साथ ही उनके खाने में भी आपको ईरानी खाने की महक मिल जाएगी जैसे कि चेलो कवाब एवं नाँन।

जूनागढ़

पारंपरिक अफ्रीकन वेश-भूषा, चेहरे पर वही अफ्रीकन पेंटिंग और नृत्य का भी वही अफ्रीकन अंदाज़। जैसे ही आपकी नज़र इनके चेहरे पर पड़ती है आपको लगता है कि आप अफ्रीका के किसी गाँव में है। ये अफ्रीकन सदियों से भारत में बसे हैं और भारतीय संस्कृति से इस कद्र जुड़ चुके हैं कि इन्हें न तो यहाँ की भाषा-बोली से परहेज़ है और न ही स्थानीय संस्कृति से। दिलचस्प बात ये है कि अपनी मिटटी से हजारों मील दूर विविधताओं वाले भारतदेश में भी इन्होंने अपनी संस्कृति को संजो कर रखा है।

शेतपाल गाँव

आमतौर पर अगर किसी को सांप दिख जाए तो उसका डर जाना स्वाभाविक है। शहरों में तो आज भी सांप दिखने की खबर सुनकर लोग खासे चैकन्ने हो जाते है। पुणे से लगभग 200 किलोमीटर दूर शोलापुर जिला के ‘शेतपाल‘ गांव में लोग सांपो के साथ ऐसे घुल-मिल कर रहते है जैसे ये उनके घर की पालतू गाय या कुत्ता हो। यहां के घरों, गलियों में आपको कई प्रकार के खतरनाक सांप टहलते मिल जाएंगे जहरीले किंग कोबरा भी यहां बड़ी तादाद में पाए जाते है। यहां के लगभग सभी घरों में सांपों के लिए बकायदा एक साफ-सुथरा स्थान बना हुआ है जिसे स्थानीय लोग देवस्थानम कहते है। हैरानी की बात ये है कि खतरनाक ज़हर से लबालब ये सांप कभी किसी को नहीं काटते । आज तक गांव में सांपों के काटने की कोई घटना नहीं हुई। जबकि ये कोई सपेरों की बस्ती नहीं है। अब तो आलम ये है कि कई देसी-विदेशी सर्प विशेषज्ञ यहां आकर इस रहस्य को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

देखा आपने हमारे देश में कैसे कैसे गाँव है। इन गाँव के किस्से देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में मशहूर हैं।

 

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