2012 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले यूपी के पहले विकलांग क्रिकेटर बने अजय यादव

अजय यादव

हमें अक्सर देखा हैं की दिव्यांग लोग खुद को एक अभिशाप मान कर ज़िन्दगी से हार मान लेते हैं लेकिन हम आपको आज एक ऐसे शख्स की दास्तां सुनायेगा जिसने अपनी विकलांगता को कमी नहीं बल्कि अपनी ताकत बनाई और जिंदगी की रेस में सफलता हासिल की।

वाराणसी के रहने वाले दिव्यांग क्रिकेटर अजय यादव आज उन युवाओं के लिए मिशाल है जो कुदरत की दी परेशानियों से हार मान लेते हैं। लेकिन इससे उलट काशी के अजय ने अपनी हिम्मत के कारण लोगों के लिए मिसाल बने है। अजय यादव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकलांगों के लिए होने वाली क्रिकेट चैंपियनशिप में खेलने वाले यूपी के पहले खिलाड़ी है। अजय बचपन से दिव्यांग नहीं है बल्कि 14 साल की उम्र में एक एक्सीडेंट ने उन्हें दिव्यांग बना दिया था। एक्सीडेंट में अजय का दाहिना पैर ख़राब हो गाया। जसकी वजह से वो करीब 6 साल तक बिस्तर पर रहे। लेकिन उन्होंने हर नही मानी और अपने पैर पर खड़े।

विकट परिस्तिथियों के बाहुजूद क्रिकेट के मैदान में दौड़ कर रन बटोरते देख, शायद ही कोई इस बात का अंदाज़ा लगा पाये कि अजय एक पैर से विकलांग है।अपने मजबूत इरादों से अजय ने जो मुकाम हासिल किया। वो हर कोई नहीं कर सकता।

अजय की बैटिंग जितनी शानदार है उतनी ही धारदार बॉलिंग भी हैं। बतौर ऑल राउंडर दिव्यांग की भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल अजय के लिए यहां तक पहुचना इनता आसान भी नहीं था। एक्सीडेंट के बाद 6 सालों तक बिस्तर पर ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद अजय ने जब फिर से चलने की कोशिश की तो पता चला कि दाहिने पैर ने उसका साथ छोड़ दिया है। बचपन से ही क्रिकेट के दीवाने अजय के लिए खेलना तो दूर, चलना भी मुश्किल हो चूका था। शारीरिक मज़बूरी को लेकर होने वाला तिरस्कार और मजाक ही अजय की ताकत बन गया और उसी के बल पर वह उनके सामने तन कर खड़ा होगा गया।

साल 1996 में यूपी में सबसे पहले विकलांग क्रिकेट की शुरुआत हुई। वे 2012 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाला यूपी के पहले विकलांग क्रिकेटर बने। 2012 से अब तक पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ क्रिकेट सीरीज भी वे खेल चूका हैं। अजय को एक बात का फक्र है कि जिस दक्षिण अफ्रीका को देश में कभी भारतीय टीम सीरीज नहीं हरा सकी उसे अजय की टीम ने हराया दिया है।

बिस्तर पर पड़े एक विकलांग से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट खेलने तक के इस सफर में अजय का सबसे ज्यादा साथ उसके कोच रामलाल यादव ने दिया। वे भी मानते हैं कि यह अजय की लगन थी कि उसे सभी का साथ और सहयोग मिला जिससे वह इस मुकाम तक पहुंच पाया। जिस आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अजय इस मुकाम तक पंहुचा है वही वो अपने साथ खेलने वाले इन युवा क्रिकेटरों को भी सिखाता है और युवा क्रिकेटर भी अजय को अपने लिए एक प्रेरणा मानते हैं

 

 

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