17 सालों से बेजुबानों से बेपनाह प्यार ही बनाता है, कमलेश को दुनिया से अलग

पशु प्रेमी कमलेश चौधरी

कहते हैं, जब उम्र का पड़ाव 60 साल के नजदीक आता है, तो शरीर भी साथ देना छोड़ने लगता है. यही हाल कमलेश के साथ हुआ है. अपनी डिस्क के दर्द से लगातार परेशान रहने के बावजूद भी कमलेश बेजुबान पशु-पक्षियों की जुबान बन रही हैं. पिछले 17 साल से कमलेश चौधरी दो हजार से ज्यादा बेजुबान पशुओं और पक्षियों का इलाज कर चुकी हैं. खास बात तो ये है कि कमलेश इन बेजुबानों को दवाइंयों से लेकर खाना तक अपने हाथों से खिलाती हैं. देश दुनिया के लोगों से परे कमलेश को पशु-पक्षियों की इस तरह सेवा करना दुनिया से अलग बनाता है. उनकी लगन और बेजुबानों के लिए बेपनाह प्यार का असर ही है कि, लोग कमलेश के जज्बे को सलाम करते हैं.

 कमलेश खुद बताती हैं कि पशुओं और पक्षियों का पालने और उनकी देखभाल का शौक उन्हें बचपन से ही है.

परिवारिक रुप से सुखी और सम्पन्न कमलेश के पति जलबोर्ड से डायरेक्टर के पद से रिटायर्ड हो चुके हैं. दिल्ली शहर के मॉडल टाऊन में स्थित गुजरावालां टाउन-2 में रहने वाली कमलेश बताती हैं कि उन्होनें इसकी शुरुआत साल 2001 में पहाड़गंज में आरामबाग से की थी. लगातार 14 साल बेजुबानों की सेवा करने के बाद कमलेश सिविल लाइन स्थित कैंप में चली गई थी और पिछले दो सालों से कमलेश मॉडल टाऊन में रह रही हैं. इसके साथ ही बेजुबानों की सेवा कर रही हैं. पिछले 17 सालों से बेजुबानों की देखभाल करने वाली कमलेश कहती हैं कि वो अब उनकी भाषा तक समझ सकती हैं. इसलिए कमलेश उनके दर्द से लेकर सुख तक में साथ रहती हैं. मॉडल टाऊन के जानवर भी कमलेश को समझने लगे हैं. क्योंकि जहां भी कमलेश जाती हैं. जानवर उनके पास इकट्ठे हो जाते हैं.

पक्षियों से लेकर जानवरों तक सबका ख्याल रखने वाली कमलेश सुबह की शुरुआत पक्षियों को दान डाल कर करती हैं. उसके बाद कुत्तों के लिए ब्रेड, दूध और मॉडल टाउन में बनवाये 50 से अधिक मिट्टी के बर्तनों में पानी भरवाती हैं. रोजाना 15 लीटर दूध और 2 किलो अनाज के अलावा न जाने कितना सामान कमलेश रोज इन बेजुबानों के लिए खर्च करती हैं.

साथ ही कमलेश कहती हैं की इस काम में कमलेश का परिवार भी उनकी पूरी तरह मदद करता है. वहीं साथ ही लोग भी कमलेश के जानवरों के की सुरक्षा के लिए कमलेश की हर संभव मदद करते हैं.

जानवरों की देखभाल करने का आलम ये है कि कमलेश कभी भी अपना घर छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाती. करीब 6 साल पहले घटी घटना को बताते हुए कमलेश ने बताया. 6 साल पहले पार्क में घायल गिलहरी को देखकर वो उसे घर ले आई थी. शुरुआती मरहम पट्टी के बाद कमलेश किसी काम से शिमला चली गई थी. गिलहरी की जिम्मेदारी घर वालों को देकर गई थी. इस दौरान गिलहरी की मौत कपड़े में घुटने से हो गई. जिस खबर के बाद से कमलेश आज तक कभी घर छोड़कर बाहर नहीं गई. इसके साथ जब तक घायल पक्षी या जानवर ठीक नहीं हो जाता तब तक वो उसे अकेला नहीं छोटती हैं. इस समय कमलेश के पास तीन कुत्तें और पक्षी है. जिसमें से दो कुत्तों को दिखाई नही देता. जिसके चलते कमलेश इन्हें अकेला नहीं छोड़ती है.

 

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