मंडी में तीन दिन से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे किसान की मौत

मंडी में तीन दिन से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे किसान की मौत

मंडी में तीन दिन से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे किसान की मौत देश में अगर इस वक़्त किसी की हालात सबसे बद्तर है तो वो है किसान। सरकार चाहे किसानों के अच्छे दिनों के कितने भी दावे कर ले लेकिन हक़ीकत ये है कि हर कोई बस किसानों का शोषण ही कर रहा है। अगर सरकार कुछ अच्छे बदलाव चाहती है तो शुरुवात सबसे पहले किसानों से ही करनी चाहिए वरना हमे अन्न देने वाला अन्नदाता भूख से तड़प कर मरता रहेगा।

अब हम जो वाक्या आपको बताने जा रहे हैं उसे सुनकर आपका मन दुःखी हो जाएगा। जिसे सुनकर शायद आपका मन झुंझला जाए। कई सवाल तुरंत आपके ज़हन में आ जाए। क्योंकि ख़बर ही कुछ ऐसी है। एक बार फिर हमारे देश का अन्नदाता मारा गया, वो भी इंतज़ार की मौत।

जी हां, उत्तर प्रदेश के अमेठी में अपनी फसल बेचने के लिए तीन दिन से लाइन में खड़े एक किसान की मौत हो गई। दरअसल फुरसतगंज थाना के धींगई गांव का रहने वाला किसान सत्तार अपना गेहूं बेचने के लिए दो मई को क्रय केंद्र पहुंचा। उसे 2 मई की तारीख को गेंहू वजन कराने की लिए नंबर मिला था। जिसके लिए वो अपनी फसल गेंहू को लेकर मंडी मे ही रुक गया और वहीं रहकर खाता पीता था। मगर आप यहां ये देखिए कि शासन कितना लापरवाह है कि 3 मई को भी किसान की फसल का वजन नहीं किया गया। आखिरकार किसान ने 4 मई की सुबह मंडी परिसर मे ही दम तोड़ दिया।

मौत की सूचना जैसे ही ग्रामीणों को मिली मौके पर बड़ी संख्या में ग्रामीण इकट्ठा हो गए जिसके बाद मौके पर पहुंचे एसडीएम तिलोई की मौजूदगी में शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। किसान सत्तार की मौत के बाद पूरा परिवार ही नहीं गांव भी सदमे में है। किस ने सोचा था कि मंडी में इंतज़ार करने वाला सद्दार अब सारी ज़िंदगी परिवार को अपने वापस लौटने का इंतज़ार करवाएगा।

वहीं सबसे शर्मनाक बात तो ये है कि किसान की मौत के मामले में मार्केटिंग इंस्पेक्टर अरुणा सिंह ने बताया कि सद्दर गेहूं बेचने नहीं आये थे, जिन लोगों को टोकन नंबर दिया गया था उसमें उनका नाम नहीं था। वहीं स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि 18 अप्रैल को किसान सत्तार अपना गेहूं बेचने के लिए गेहूं क्रय केंद्र गया था लेकिन उसे 2 मई के टोकन दिया गया था, दो मई को सत्तार ट्रैक्टर पर लादकर अपना गेहूं बेचने गया, लेकिन उसका गेहूं नहीं खरीदा गया और उसे तीन दिन तक दौड़ाया गया जिसके बाद उसकी मौत हो गई। अब आप देखिए कि पहले प्रशासन की लापरवाही की वजह से किसान की मौत हुई और अब मौत भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। वहीं मंडी के कर्मचारी अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।

मतलब ये कि किसान पहले तो धूप में बारिश में कड़ी मेहनत कर दिन रात जागकर अपनी फसलों की पैदावार करे। फिर वो मंडी में भूखा प्यासा रहकर लम्बी लम्बी लाइनों में लगे और फिर भी उसकी फसल या तो समय पर बिकती नहीं या मंडी में पड़े पड़े सड़ने लगती है। अगर बिके भी तो किसान को ना धान का ना सब्जियों का उचित मूल्य नहीं मिलता। आखिरकार या तो किसान आत्महत्या कर लेता है या शोषण का शिकार किसान मार दिया जाता है। या अगर किसान जीता भी है तो दाने दाने को मोहताज होकर जीने को मजबूर होता है।

एक तरफ सरकार गेहूं ख़रीद के आंकड़े जारी कर अपनी पीठ थप-थपा रही ही है तो दूसरी तरफ जमीन पर गेंहू खरीद में लगे कर्मचारी अपनी मनमानी से बाज नही आ रहे । किसानों को कभी बोरा न होने का रोना रोते कभी लेबर न होने की बात कहकर किसानों को महीनों भर बाद का टोकन देते रहते हैं। अब आप ही बताइए ऐसे कैसे सुधरेंगे किसानों के हालात ?

 

 

 

 

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