सरकारी स्कूलों में शिक्षा की असलीयत, अगर ऐसे पढ़ेगा इंडिया, तो कैसे बढ़ेगा इंडिया।

सरकारी स्कूलों

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर देखकर आप भी सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि, अगर ऐसे पढ़ेगा इंडिया, तो फिर कैसे बढेगा इंडिया? कुशीनगर के गरीब ग्रामिण अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उन्हे सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजते है। लेकिन इन सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य किस हद तक सुधरता इनका शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं होगा।

हम बात कर रहें है, कुशीनगर जनपद के सरकारी स्कूलों की। ये स्कूल गांव में होने की कारण राम भरोसे ही चल रहा है। इस सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनके भविष्य से भी खिलवाड़ किया जा रहा है।

आपको बता दें कि, प्राथमि‍क विद्यालय और जूनियर विद्यालय के जर्जर भवनों में बच्चों को जहां पढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्राथमिक विद्यालय के बच्चे जर्जर भवन होने के डर से खुले आसमान के नीचे पढ़ने के लिए मजबूर है।

हालांकि, कुशीनगर जिलें के कई सरकारी स्कूलों को मॉडल विद्यालय जरूर बना दिया गया है। लेकिन दूरदराज़ के गांव के सरकारी विद्यालय अब भी पुराने भवन और खस्ताहाल स्थिति में अपने मॉडल विद्यालय होने की राह तक रहें है। इन स्कूलों में सुविधाओं का अभाव इतना हैं कि, स्कूल की दीवारों में दरारें साफ नजर आती है।

इतना ही नहीं, इन विद्यालयों के खस्ताहाल भवन में बच्चे डर कर पढ़ाई करते हैं कि, कहीं कोई हादसा ना हो जाये। हादसे के डर से बच्चों को कबाड़ रखे गए क्लास में पढ़ाया जा रहा है। लेकिन बावजूद इसके मामले में शिक्षा विभाग को इस बात की कोई चिंता नहीं हैं।

जानकारी क अनुसार, सालों से स्कूल की मरम्मत तक नहीं कराई गई है। छात्रों के अभिभावक न सिर्फ स्कूलों में सुविधाओं के अभाव से परेशान हैं, बल्कि भवनों की खस्ता हालत ने भी उन्हें चिंता में डाल दिया हैं। अंदरूनी तौर पर विद्यालय के भवन को देखकर ही उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि, शिक्षा विभाग बच्चों के भविष्य को लेकर कितना सतर्क है।

बच्चों के लिए सरकारी स्कूल में न तो उचित बैठने की व्यवस्था है, और न ही पीने के लिए पानी की। विद्यालय में लगे नलकूप खराब है। शौचालय की व्यवस्था तो सिर्फ नाम के लिए है, जूनियर विद्यालय में पढ़ने वाली बच्चियों को शौचालय की दिक्कत होती है। जिसकी वजह से उन्हें शौच के लिए मजबूरन बाहर जाना पड़ता है। सरकारी विद्यालयों में मिलने वाला मिड डे मील इस सरकारी विद्यालय में देखने तक को नहीं मिलता है।

वहीं दूसरी ओर पढ़ाई का आलम ये है कि, बच्चे तो क्लास रूम में मौजूद है, पर अध्यापक अपनी कुर्सी से गायब है। विद्यालय का संचालन करने वाले प्रधानाध्यापक तो अपनी मर्जी के मालिक है, जो कई दिनों तक स्कूल की शक्ल तक नहीं देखते है। मगर फिर भी सरकारी वेतन तो घर बैठे भी मिल ही जाता है।

अब आप सोच सकते है कि, सरकारी स्कूल की इस खस्ताहाल होने का जिमेदार कौन है? जो हर साल आने वाले सरकारी फण्ड का इस्तेमाल इन विद्यालयों को दुरुस्त करने की जगह अपने जेब गर्म करने में करते है। अगर ऐसा ही रहा तो, इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? क्या प्रशासन को इस बात की चिंता नहीं है?  जो बच्चो के डर को दूर करने की जगह सुविधाओं की कमी का रोना रोते है। जबकि अव्यवस्था से जूझते विद्यालय में शिक्षा विभाग के आगे बढ़ी चुनौती यह है कि, शिक्षा विभाग इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चो का मन पढ़ाई में कैसे लगाएगा।

गौरतलब है कि, मामला मीडिया में आने के बाद अधिकारी जांच और कार्यवाही की बात कर रहे है। सरकार भले शिक्षा को बढ़वा देने के बड़े-बड़े दावे करती हो। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालयों की स्थिति बहुत ही खराब है, और भष्टाचार की दीमक धीरे-धीरे इन विद्यालयों की नींव को खोखला कर रही है

 

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