समलैंगिक संबंध, क्या वाकई अपराध है? या सुप्रीम कोर्ट करेगा, इसे अपराध की श्रेणी से बाहर-

समलैंगिक

समलैंगिक शब्द सुनने में कितना अजीब लगता है. शायद उतना ही अजीब असल जिंदगी में भी है. तभी तो सुप्रीम कोर्ट इसे अभी तक अपराध की श्रेणी से बाहर नही कर पाया है. आईपीसी की धारा-377 पर पहले दिन की सुनवाई खत्म हो गई भी हो गई. जिस पर पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नही आया है.

सोमवार को केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुनवाई स्थगित करने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की थी. लेकिन कोर्ट ने सरकार की मांग खारिज कर दी थी.

एक याचिकाकर्ता के मुताबिक, कोर्ट इस मुद्दे को लेकर काफ़ी सकारात्मक रही. जिसके चलते उन्हें पूरी उम्मीद है की कोर्ट समलैंगिकता को समझेगी. इसके साथ याचिकाकर्ता ने माना की समाज में समलैंगिक लोगों पर भेदभाव होता है.

साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में ड़ाल दिया था. जिसके बाद से लगातार सुप्रीम कोर्ट को इसके विरोध में याचिकाएं मिल रही थी. जिसमें एक याचिका आईआईटी के 20 छात्रों और नाज फाउंडेशन ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में ड़ाली थी. इसी तरह न जाने कितने ही संगठनों और लोगों ने समलैंगिकता को लेकर कोर्ट में याचिका ड़ाल रखी है. अभी तक सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर 30 से ज्यादा याचिकाएँ मिल चुकी हैं.

याचिकाओं में सबसे पुराना नाम नाज फाउंडेशन का है. जिन्होनें साल 2001 में ही धारा-377 में से समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग कोर्ट से की थी. जिस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का पहला दिन था. रिव्यू पिटिशन खारिज करने के बाद, कोर्ट क्यूरेटिव पिटिशन पर सुनवाई कर रही है.

आखिर क्या है आईपीसी की धारा 377?

आईपीसी की धारा 377 के हिसाब से समलैंगिकता को भारतीय सविंधान में अपराध माना गया है. सविंधान के हिसाब से, अप्राकृतिक रुप से बनाया गया संबंध चाहे वो पुरुष हो या महिला अपराधिक है. जिसमें दंड सहिंता के हिसाब से 10 साल की जेल या आजीवन कारावास का प्रावधान है. समलैंगिकता अपराध है. जिसमें दोषी पाये जाने पर गैर जमानत व जुर्माने का भी प्रावधान है.

साल 2001 में डाली गई पहली याचिका के बाद से धारा 377 में से समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने की मागें तेज हो गई हैं. लेकिन इस मामले में से जुड़े निजता का अधिकार पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि “सेक्सुअल ओरिएंटेशन/ यौन व्यवहार निजता से जुड़ा हुआ है. और इस पर किसी भी प्रकार का भेदभाव लोगों की गरिमा को ठेस पहुंचाता है. इसलिए साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्राकृतिक व्यवहार के खिलाफ बताया था. साथ ही इसे अपराध की श्रेणी में ड़ाल दिया था.

इन सबके बीच LGBTQI के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट और वकील आदित्य बंदोपाध्याय ने कहा है  कि “अगर कोई इंसान अपने पर्सनल स्पेस में होमोसेक्शुएलिटी को फॉलो करता है किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर इसकी आप समलैंगिकता अभिव्यक्त करते हैं, तो ये कानून में और समाज के लिए आपराधिक हो जाता है.”

वहीं, समलैगिंकता की मांग के लिए लड़ाई कर रहे नक्षत्र भागवे के मुताबिक, “समलैगिंकता की मांग सेक्स के लिए नहीं, बल्कि समाज में उन लोगों को अधिकार दिलाने के लिए है. जो अपनी पहचान समाज के डर से छुपाये रखते हैं.”

अक्सर लोग समलैंगिकता को एक बीमारी के तौर पर देखते हैं. लेकिन ‘इंडियन साइकियाट्री सोसाइटी’ के अधिकारी के बयान के मुताबिक समलैंगिकता बीमारी नही है. समाज को इसे स्वीकार्य करना चाहिए. और इसे बीमारी नही समझना चाहिए.

वहीं ‘इंडियन साइकियाट्री सोसाइटी’ के अध्यक्ष डॉ. अजित भिड़े के बयान के मुताबिक वैज्ञानिकों को भी पिछले 40-50 सालों में कोई भी ऐसा तथ्य ऐसे नहीं मिला हैं. जो समलैंगिकता को बीमारी बता सके. समलैंगिक होना गलत नहीं है, बस अलग है.”

इस मुद्दे को लेकर दुनियाभर के देशों में भी अलग-अलग राय है. संयुक्त राष्ट्र के कैंपेन के हिसाब से दुनिया के 76 बड़े देशों में भी समलैंगिकता में मतभेद चलता आ रहा है. यहां तक तो पांच देश ऐसे भी हैं, जहां समलैंगिकता के अपराध में लोगों को मृत्युदंड का प्रावधान है.

समलैंगिकता को लेकर बढ़ रही मागों को लेकर जहां अब लोगों की मानसिकता धीरे-धीरे बदल रही है. वहीं ऑस्ट्रेलिया और बरमूडा जैसे देश इसे अपना रहे हैं.

जाहिर है, समलैंगिकता ना तो बीमारी है, ना ही घिनौना कृत. जिसे लेकर लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है. वहीं लोगों को अपने समाज में इसे अपनाने की जरूरत है. जिससे समाज में रह रहे समलैंगिक लोगों के साथ भेद-भाव खत्म हो सके.

 

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