सब्जियां बेचकर सुभाषिनी मिस्त्री ने बनाया गरीबों के लिए अस्पताल

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आपने अक्सर फिल्मों और किताबों में ऐसी कहानियां जरूर सुनी होंगी। लेकिन उन पर यकीन करने का ख्याल तो कभी आपके मन में भी नहीं आया होगा। हमारे समाज में आज भी इंसानियत जिंदा है। और ऐसे भी कई लोग है जिन्होने अपनी जिंदगी दूसरो के नाम कर दी है। जी हां, ऐसी ही एक कहानी पश्चिम बंगाल की सुभाषिनी मिस्त्री की भी है। उन्होने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसे जानकर शायद आपकी जुबान से भी एक शब्द ही निकलेगा.. “असंभव”।

सुभाषिणी मिस्त्री के जीवन की असल कहानी तब शुरू हुई। जब उन्होने पैसे की कमी के कारण अपने पति को हमेशा के लिए खो दिया। साल 1943 में गुलाम भारत के दौरान सुभाषिणी का जन्म हुआ और सिर्फ 12 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई। और 23 साल के होते-होते उनके 4 बच्चे भी हो गए। सुभाषिनी के पति सब्जी बेचते थे। इसी से घर का खर्च चलता था। कमाई इतनी कम थी कि घर का घर चला पाना भी काफी मुश्किल होता था। और एक दिन अचानक सुभाषिणी के पति बीमार हो गए। हालांकि, बिमारी कुछ इतनी बड़ी नहीं थी कि इलाज कर पाना संभव ना हो, लेकिन गांव में कोई अस्पताल ही नहीं था। बावजुद इसके सुभाषिणी ने हार नहीं मानी और वो अपने पति को इलाज के लिए गांव से दूर जिला अस्पताल, टॉलीगंज ले गईं। ये विश्वास कर पाना तो ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। कि इस समाज में या यूं कहूं कि इस बेरहम समाज में पत्थर दिल लोगों की कमीं नहीं है। सुभाषिणी के पास उस वक्त ज्यादा पैसे नहीं थे और उसका पति बिमारी के कारण मर रहा था लेकिन पैसे के अभाव के कारण उसका इलाज नहीं हो सका और सुभाषिणी के पति की मृत्यु हो गई।

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सब्जी बेंचते हुए सुभाषिणी मिस्त्री

पैसो की कमी के कारण अपने पति को खोने की बात सुभाषिणी के मन में घर कर गई थी। अक्सर जब इंसान ऐसी परिस्थिति का सामना करता है। तो उसके पास केवल तीन रास्ते होते है। पहला ये कि वो इस स्थिति को अपनी किस्मत मानकर जिंदगी भर अपने भाग्य को कोसता रहे, दूसरा ये कि मेहनत करें खूब पैसा कमाएं ताकि उसे फिर कभी ऐसी दिक्कत का सामना ही ना करना पड़ें। लेकिन तीसरे रास्ते को अपनाने वाला 10 में से केवल 1 ही इंसान होता है। क्योंकि इस तीसरी राह पर चलने वाला इंसान केवल अपने बारे में नहीं सोचता बल्कि वो कुछ ऐसा करने की ठान लेता है, जिससे आगे कभी किसी और को उस परिस्थिति से ना गुजरना पड़ें जिससे बाहर आने में उसने पूरी जिंदगी बिता दी।

सुभाषिणी मिस्त्री उन तीसरी राह पर चलने वाली ऐसी महिला है जिन्होने ना केवल इस राह पर चलने की ठानी बल्कि अपनी मंजिल को पाने में भी सफलता हासिल की। उन्होने अपने मन में ही एक अस्पताल खोलने की ठान ली। और 20 साल तक मेहनत की। कभी सब्जी बेज कर तो कभी मजदूरी के सहारे पैसे कमाए। और इन पैसो के सहारे ही उन्होने घर के साथ-साथ अपने बच्चो को पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। उन्होंने सब्जी बेचकर बेटे को डॉक्टर बनाया । साथ ही,  सुभाषिणी ने इन पैसों में से ही अस्पताल के लिए 20 साल तक पैसे जोड़े। औऱ फिर एक दिन वो समय आ ही गया जब उन्होने 10,000 रूपयों की एक एकड़ जमीन हॉस्पिटल के लिए खरीद ली।

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इंसानियत की मिसाल-सुभाषिणी मिस्त्री

सुभाषिनी ने 1993 में ट्रस्ट खोला और इसी ट्रस्ट की मदद से 1995 में हॉस्पिटल की नींव रखी गई। गांववालो के योगदान से सुभाषिणी फूसे का अस्पताल बनाने में सफल हुई। यह अस्पताल गरीबों के लिए खोला गया था। लेकिन फूसे से बने होने के कारण बरसात के दिनों में अस्पताल में दिक्कते पैदा होने शुरू हो गई। ऐसे में सुभाषिनी और उसके बेटे अजोय ने पक्के मकान के बारे में सोचना शुरू किया। इसके लिए वह अपने इलाके के एमपी से भी मिले। बाद में स्थानीय लोग और एमएलए ने भी सहयोग दिया। सभी के प्रयासों से हजार वर्गफीट का अस्पताल तैयार हो गया। जिसका उद्घाटन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने किया। इसके बाद सुभाषिनी मिस्त्री का यह अद्भुत प्रयास लोगों के सामने आया। उनके इस प्रयास के लिए उन्हें इस साल पद्मश्री से नवाजा गया है।

हालांकि, इंसानियत और अपने जज्बे की मिसाल देने वाली सुभाषिनी का कहना है, कि मुझे असल पुरस्कार तो अस्पताल के शुरू होने से ही मिल गया था। सुभाषिनी के ट्रस्ट में अब तमाम बड़े लोग जुड़ गए हैं। और कई नए डिपार्टमेंट खुल गए हैं। ट्रस्ट के पास 3 एकड़ जमीन है। और अस्पताल का दायरा 9,000 वर्ग फीट का हो चुका है।

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