लड़कियों के Periods से जुड़ी हमारे समाज की घिनौनी परंपराएं

Periods

जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते है। वैसे ही हमारे समाज के भी दो चेहरे है। जो सबको दिखाई तो देते है। लेकिन उनके खिलाफ आवाज बहुत कम लोग उठाते है। जहां एक तरफ लोग बेटियों को बेटे के बराबर दर्जा देने की बात करते है। वहीं, दूसरी तरफ वही लोग बेटियों को उनके periods के वक्त अपवित्र बताकर घर में घुसने तक नहीं देते।

जी हां, भारत के गुमनाम गांव की गमगीन परंपराओं में आज हम आपके लिए लेकर आएं है। एक ऐसी कूप्रथा की हकीकत जिससे हमारा समाज वाकिफ तो है। लेकिन इसके बारे में बात करने से हिचकिचाते है। क्योंकि ये ‘लड़कियों वाली problem’ है।

हमारे ही देश में कई ऐसे गांव, और शहर है। जहां periods एक taboo है। periods के वक्त औरतों पर कई तरह से पाबंदियां लगाई जाती है। हमारे देश में हर 10 में से 8 लड़कियों को periods के दौरान मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं होती है। और हर 10 में से 6 लड़कियों को घर के kitchen तक में जाने से रोक दिया जाता है। जबकि, 10 में से 3 लड़कियों को इस दौरान कमरे से बाहर सोने के लिए कहा जाता है। और ऐसा करने के पीछे लोगों का मानना है। कि महावारी के दौरान लड़कियां अछूत होती है।

खैर, periods से जुड़ी इन बातों के बारे में तो सभी को पता है। और हममे से कई लोगों ने इन परंपराओं को मानकर स्वीकार भी कर लिया है। लेकिन हमारी इस शारीरिक क्रिया से जुड़ी और भी कई ऐसी प्रथाएं है। जिन्हें जानकर शायद आपके रौंगटे खडे हो सकते है।

दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में लड़कियों को उनके periods के वक्त घर से दूर रखा जाता है। और पूरे गांव के बाहर जंगल के पास एक झोपड़ी बना दी जाती है। जहां गांव की औरतें अपनी महावारी के दौरान आकर रहती है। इस प्रथा को छौपदी प्रथा कहा जाता हैं। हालांकि, महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में इसी प्रथा को गौकोर का नाम दिया गया है। इस गौकोर में महिलाएं जमीन पर चटाई बिछाकर सोती है।

इसी प्रथा के चलते नेपाल में एक 14 साल के लड़की को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। सिर्फ 14 साल की रोशनी को उसके periods के चलते गांव के बाहर छौपदी में रहना पड़ रहा था। और सर्दी होने के वजह से उसने खुदको गर्म करने के लिए आग जलाई। लेकिन झोपड़ी बहुत छोटी थी। जिससे आग के धुएं में रोशनी का दम घुट गया। और उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद से नेपाल में इस प्रथा पर रोक लगा दी गई। और साथ ही, छौपदी प्रथा का चलन जारी रखने वालों पर जुर्माना लगाने का भी ऐलान किया।

Periods को taboo बनाकर देश की कई जगहों पर इस दौरान लड़कियों के खाने-पीने के बर्तन, कपड़े, बिस्तर सब अलग कर दिया जाता है। इतना ही नहीं, बंगाल के कई पिछड़े गांवों में लड़कियों को उनके पहले पीरियड का ब्लड गाय का दूध, नारियल का पानी और कपूर मिलाकर पिलाया जाता है। और यहां के लोगों का मानना है। कि ऐसा करने से शारारिक शक्ति बढ़ती हैं। तथा याददाश्त भी तेज होती हैं।

जहां, लड़कियों की इस आम शारीरिक क्रिया पर हमारे समाज ने तरह-तरह की प्रथाओं का चलन जारी किया हुआ है। तो वहीं, ये वही समाज है। जो आषाढ़ के महीने में गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में जाकर देवी की महावारी से सने हुए कपड़े को प्रसाद के रूप में घर लेकर आते है। जिस देवी की लोग पूजा करते है। वो खुद भी एक औरत है। और उसे खुद भी ये गंदगी होती है। तो वो कैसे किसी और लड़की या महिला को अपने माहवारी के दौरान छूने गंदी हो सकती है?  इसपर हमारे समाज को आपको और हमें सभी को सोचने औऱ समझने की ज़रूरत है।

 

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