व्यभिचार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितना सही और कितना गलत?

व्यभिचार

27 सितंबर 2018 की सुबह सुप्रीम कोर्ट के एक एतिहासिक फैसले के चलते 158 साल पुराने Adultry यानी व्यभिचार के कानून को रद्द कर दिया गया। 1860 में बना ये कानून 158 सालों पुराना था, जिसे कल सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। लेकिन क्या आप जानते है कि, आखिर क्या था व्यभिचार कानून?

इस कानून के तहत अगर कोई आदमी किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता हैं, तो पति की शिकायत पर मामले में पुरूष को अडल्ट्री क़ानून के तहत आरोप लगाकर मुक़दमा चलाया जा सकता था। और इस केस में पुरुष को पांच साल की क़ैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सज़ा दिए जाने का प्रवाधान भी था। हालांकि, इस क़ानून में एक पेंच ये भी था कि, अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी कुंवारी या विधवा औरत से शारीरिक संबंध बनाता है, तो वो अडल्ट्री के तहत दोषी नहीं माना जाता था।

मगर वहीं दूसरी ओर व्यभिचार कानून ये भी कहता था कि, स्त्रियाँ कभी उकसाती या विवाह के बाद संबंध की शुरुआत नहीं करतीं’ और इसी तर्क को आधार बनाकर औरतों को अडल्ट्री का दोषी नहीं माना जाता था।

लेकिन इस मामले में जनहित याचिका दायर करने वाली इटली की एनआरआई जोसेफ शाइना ने धारा 497 को भेद-भाव करने वाला और महिलाओं के ख़िलाफ़ काम करने वाला क़ानून बताया था। साथ ही, इस कानून में मुद्दा ये उठा कि, अगर महिलाएं संबंध बनाने में बराबर की हिस्सेदार होती हैं। तो उन्हें सजा का भागीदार क्यों नहीं माना गया।

इस कानून के चलते शादी के रिश्ते में महिलाओं की भूमिका को सिर्फ शारीरिक संबंध के लिए सहमति देने तक सीमित कर दिया गया था। यानि की इस तरह से अडल्ट्री कानून महिलाओं को समाज में समानता के अधिकार से वंचित रख रहा था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का  इस कानून के विपक्ष में फैसला लेना जरूरी बन गया था।

मगर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से समाज में कई तरह के सवालों का सैलाब उठना शुरू हो चुका हैं। जिस कानून को शादी जैसे रिश्तें की पवित्रता को बनाए रखने के लिए बनाया गया था, उस कानून में बदलाव होने से क्या अब हमारे समाज में शादियां सुरक्षित रह पाएंगी। हालांकि, इस मामले में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने ऐतराज जताया हैं। स्वाति का कहना है कि, एडल्ट्री को असंवैधानिक बताना गलत है। सुप्रीम कोर्ट का एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर रख देना सही नहीं है। इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने शादीशुदा होते हुए भी लोगों को बाहरी रिश्तें बनाने के लिए कानूनी अधिकार दे दिया हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए मालीवाल ने कहा कि, ये धारा सामान होनी चाहिए थी, जिसमें एडल्ट्री करने पर महिला और पुरूष दोनो को ही समान सजा होनी चाहिए थी, मुझे लगता हैं कि इस फैसले के बाद से देश में महिलाओं की पीड़ा में और ज्यादा इजाफा होगा।

खैर यहां बात सिर्फ महिलाओं की नहीं है। बल्कि महिला और पुरूष दोनो की है। सवाल ये भी उठता हैं कि क्या एडल्ट्री कानून को रद्द करने से देश में तालाक जैसे मामलों में इजाफा होगा?

 

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