मेयर राहुल जाधव के ऑटो ड्राइवर से लेकर मेयर बनने तक की कहानी

मेयर राहुल जाधव

कहते हैं, किसी जिंदगी को बेहतर तरीके से जीना है तो उसे करीब से महसूस करना चाहिए. इसी तरह मेयर राहुल जाधव की जिंदगी की कहानी है. जिन्होनें मुफलिसी के दौर में अपने जीवन के संघर्षों को करीब से देखा है, महसूस किया है. आज मेयर राहुल जाधव कहते हैं कि मेरी पहली प्राथमिकता आम लोगों की जिंदगी में बदलाव लाना है, क्षेत्रों के अधूरे विकास की परियोजनाओं को पूरा करना है.

मेयर राहुल जाधव चिखली पुणे के पश्चिमी हिस्से में स्थित है. छत्तीस साल पहले इस गांव  के एक गरीब परिवार में राहुल जाधव का जन्म हुआ था. हालांकि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से बचपन में राहुल जाधव को अपने रिश्तेदारों के यहां रहकर पढ़ाई करनी पड़ी. लेकिन रिश्तेदारों के यहां पूरी पढ़ाई एक बोझ सी लगने के वजह से राहुल जाधव ने  दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और अपने घर वापस लौट आये.

खेती से ऑटो तक का सफर

राहुल जाधव ने पढ़ाई छोड़ने के बाद गांव आकर खेती-किसानी में अपने घरवालों का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. हालांकि इससे ना तो घर की स्थिति में सुधार हुआ ना ही आर्थिक वृद्धी ही हो पाई. परिवार की समस्यायें जस की तस बनी रही. जिसके बाद राहुल ने अपनी उम्र का लिहाज ना करते हुए, गांव छोड़ दिया और साल 1997 में जब पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ शहर में बदलाव का वक्त चल रहा था. उस समय उन्होंने यहां आकर ये तय किया की वो ऑटोरिक्शा चलाएगें.

लेकिन परिवार की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि राहुल के लिए परिवार वाले ऑटोरिक्शा खरीदते. फिर भी किसी तरह उन्होंने एक सिक्स सीटर ऑटोरिक्शे का इंतजाम किया. जिसके बाद लगातार छह साल तक राहुल जाधव ऑटोरिक्शा चलाते रहे. हालांकि बाद में सरकारी आदेश के तहत शहर में सिक्स सीटर ऑटोरिक्शा संचालन बंद कर दिया गया. जिसके बाद राहुल पूरी तरह बेरोजगार हो गये. उस दौरान उनके पास कोई दूसरा काम ना होनें की वजह से एक बार फिर राहुल अपने गांव वापस आ गये और साल 2004 में उनकी शादी हो गई.

मेयर बनने में नेताओं की क्षुब्धता बनी बड़ी वजह

मेयर राहुल जाधव ने बताया कि गांव वापस लौटने के बाद उन्होंने एक प्राइवेट कंपनी की गाडियां चलाईं. जिससे उनकी गांव-समाज में अच्छी पहचान बन गई. वहीं उन्होंने बताया कि गांव के सरपंच या शहरी निकाय का सदस्य बनते ही लोग खुद को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते. अगर अपने काम के लिए किसी को इनके पास जाना पड़ता है तो ये नेता अपने व्यवहार से सबको आहत करते हैं. ऐसे नेताओंके व्यवहार ने ही मुझे राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. पहचान तो मेरी पहले से ही थी. बस 2006 में नेता के संपर्क में आते ही मैंने राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी.

जिसके बाद साल 2012 में एक क्षेत्रीय पार्टी के टिकट पर मुझे शहरी प्रशासन का हिस्सा बनने का मौका मिला. जिसके बाद राजनीति में मेरी सक्रियता देख लोगों मुझसे जुड़ने लगे मुझे विधायक पद के दावेदार के रुप में देखने लगे. हालांकि मैंने ऐसा नहीं किया और विधायक का चुनाव नहीं लड़ा, क्योंकि मेरा दोस्त इस पद पर लड़ रहा था. जोकि निर्दलीय था और उसने चुनाव में जीत भी दर्ज की. हालांकि पिछले साल मैनें पार्टी बदल ली और फरवरी में खत्म हुए नगर निगम के चुनावों में मुझे दोबारा पार्षद चुना गया. उस समय में अपनी पार्टी की ओर से शहर का महापौर बनने की लिस्ट में सबसे आगे था. जिसके बाद पार्टी में अनेक बदलाव हुए और आखिरकार मुझे मेयर के रुप में चुन लिया गया.

 

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