समाज की असली परंपरा, लड़की पैदा होने पर मनाया जाता हैं जश्न और गांव में लगाए जाते हैं पेड़, जानिए कौन-से गांव में हैं यह पंरपरा

समाज

समाज में कई तरह की परंपरा हम देखते और सुनते आ रहें हैं। कुछ पंरपरा अच्छी होती हैं। तो कुछ पंरपरा दिल दहला देती हैं। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी पंरपरा के बारे में बता रहें हैं। जिसके बारे में सुनकर आप भी इस गांव की वाह वाही करेंगा। ये एक ऐसी पंरपरा हैं जिसमें लड़कियों के पैदा होने पर पेड़ लगाए जाते हैं

समाज में ऐसी काफी पंरपरा हैं जिन्हें बंद हो जाना चाहिए हैं, और कही ऐसी पंरपरा हैं जिन्हें देश में छा जाना चाहिए। हम भी आज एक ऐसी पंरपरा के बारे में ही बात कर रहें हैं।

समाज में बच्चें पैदा होने पर उससे सम्बन्धित कुछ-न-कुछ मान्यताएं होती हैं, जैसे कि गीत का गाया जाना, या फ़िर तुरंत जन्मे बच्चों पिता या मां के पुराने कपड़े पहनाना, कई मान्यताएं या रीति रिवाज़ होते हैं, जिन्हें हम सही से जानते भी नही हैं। मगर राजस्थान का पिपलंत्री गांव में बच्ची के पैदा होने पर अलग सी पंरपरा का रिवाज हैं, जिसे हर किसी को निभाना होता हैं। यहां बच्ची के जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाते हैं.

हमारा समाज और देश ऐसा हैं जहां लड़कियों के पैदा होने पर उन्हें भार समझा जाता हैं , जहां आज भी लड़कियों को दहेज के लिए जला दिया जाता हो,  जहां कोख में ही लड़कियों को मार दिया जाता हैं, बेटे के सामने लड़की को दबा दिया जाता हैं, और ऐसे ही समाज में ऐसी परंपरा का होना बेहद खुशी की बात हैं। धरती पर ऐसे लोग भी हैं जो बेटी के जन्म पर खुश होते हैं।  

इस अद्भुत पंरपरा की शुरुआत श्याम सुंदर पालिवाल नामक एक ग्रामीण नेता के द्वारा की गई थी, जब उनकी पुत्री कम उम्र में ही मौत हो गई थी. और आज भी ये परंपरा जारी है. आज भी जब इस गांव मे कोई लड़की पैदा होती है तो, गांव के सदस्य एक ट्रस्ट के तहत एक निवेश खड़ा करते हैं जिसका एक तिहाई हिस्सा 31,000 रुपये लड़की के माता-पिता को जमा करना होता हैं, जिसे लड़की के 20 साल के होने पर भुनाया जा सकता है. और यही धन परिवार के लिए संबल बन जाता है.

ट्रस्ट के बदले माता -पिता को एक एफिडेविट कराना पड़ता है, जिसमें माता-पिता को ये घोषित करना पड़ता है कि वे 18 वर्ष से पहले अपनी बेटी की शादी  नहीं करेंगे. साथ ही उन 111 पेड़ों के देखभाल की शर्त भी उसी में शामिल होती है. ये सुनने में भले ही छोटी बात लग रही हो मगर ऐसी बातें ही समाज बनाती हैं और इनका असर समय से परे होता है.

आखिरकार कहीं भी रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ तो वहां का वातावरण ही होता है न! ये खूबसूरत परंपरा महिलाओं के लिए एक विश्वास का माहौल खड़ा करती है.वहां के लोगो का कहना हैं कि इन पौधों की देखभाल करने का अहसास ठीक वैसा ही है जैसे कि आप अपने बच्चों को थपकी देकर सुला रहे हों.

ये सारे पेड़ वहां रह रहे लोगों के लगाए हुए है, और इन्हें बचाने के लिए वे इन पेड़ों के इर्द-गिर्द एलोवेरा लगाते हैं ताकि पेड़ों को दीमक से बचाया जा सके. पिछले 6 वर्षों में यहां लगभग ढाई लाख पेड़ लगे हैं.

इससे गांव का माहौल कुछ ऐसा हो गया है, कि जैसे ये स्वर्ग हो. यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि इन सारी सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए वातावरण की तरफ देखना ही होगा, और जब ये पौधे पेड़ के रूप में विकसित होंगे तो ही उसे उपलब्धि कहा जा सकेगा.

एक ये पंरपरा हैं जिसके बारे में सुनकर हमें भी लगने लगा हैं की अगर यह पंरपरा हर गांव में शुरु हो जाए तो देश की तस्वीर को बदलने में समय नही लगेंगा। और एक तरफ ऐसी पंरपरा हैं जिसके बारे में भी सुनकर हमारे होश उड़ जाते हैं।

जो इस गांव के बारे में सुन रहा होगा वो भी इस गांव की तारीफ कर रहा होगा। ऐसे गांव में जाना और वहां ऐसा होते देखना शयद हर कोई चाहेगा। देश में कई गांव हैं जहां लड़की पैदा होने पर मात्म सा छा जाता हैं, और जैसे जैसे लड़की बड़ी होती हैं उसे घर में कैद कर दिया जाता।

आज के समय में लड़कियां लड़को से आगे निकल रही हैं, अपने साथ देश का नाम भी रोशन कर रही हैं। राजस्थान के पिपलंत्री गांव की लड़कियां जरुर कुछ करके दिखाएंगी। इस गांव की बच्चियों को कितनी खुशी होती होगी ना.. जब इन्हें पता चलता होगा की इनके पैदा होने पर उनके माता पिता ने पेड़ लगाया था, कितनी खुशी होती होगी।

कही कही तो बेटी पर आत्याचार किया जाता हैं, ऐसा बर्ताव किया जाता हैं मानो महिला ने ना जाने क्या पैदा कर दिया। अगर सही में हर एक गांव बेटी के जन्म पर जशन मानए और ऐसे काम करें तो कभी बेटियों को बोझ नही समझा जाएगा।

देश में हर दिन किसी ना किसी तरह लड़कियों पर आत्याचार हो रहा हैं। ना जाने ये कब बंद होगा। जब तक हर इंसान लड़की और महिला इज्जत नही करेंगा तब तक लड़की पर हो रहें आत्याचार नही रुकेंगे। आप हम अच्छें से जानते हैं कि किसी एक के के सोचने से ऐसा नही होगा सबको मिलकर सोचना पड़ेंगा

एस गांव ने लड़की ही नही बल्कि पर्यावरण का भी ध्यान रखा हैं, और इस पंरपरा का पालन किया है, जहां एक तरफ  गांव वाले गांव में आई एक नन्हीं परी की खुशी मना रहा हैं। वहीं पेड़ लगा कर पर्यावरण पर ध्यान दे रहा हैं, गांव के लोग जैसे अपने बच्चें को पाल रहें हैं वैसे ही वे सब पेड़ो को भी पाल रहें हैं।

गांव वालो की यह पंरपरा हमें तो बेहद पंसद आई। हर कोई चाएगा की ऐसी पंरपरा उनको गांव में भी हो, और उनके गांव का नाम भी रोशन हो

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