बिना मां-बाप, 8 साल की मुस्कान, कूड़ा उठाकर, कैसे उड़ती है… अपने हौसलों की उड़ान

8 साल की मुस्कान

कहते हैं, अगर हौसलों को ऊंची उडान देनी है तो मेहनत भी जी तोड़ करनी पड़ती है. जिसके लिए मां-बाप की छाया का जीवन में होना जरूरी होता है. लेकिन जब मां-बाप ही हम से दूर जा चुके हो, तो वही डगर पहाड़ का रुप ले लेती है. ऐसी ही कहानी यमुनानगर में रहने वाली मुस्कान की है. महज 8 साल की मुस्कान अपने हौसलों को पर तो लगाना चाहती है. लेकिन उसका साथ देने को मां-बाप का साया नही है. उसके साथ कोई है, तो उसकी मेहनत, उसका जुनून है और उसकी बहन है. जिसे अपनी छोटी बहन मुस्कान पर गर्व है.

सिर्फ 8 साल की मुस्कान पढ़ना चाहती है. कुछ बनना चाहती है. साथ ही अपने हौसलों को पर लगाना चाहती है. लेकिन उसका साथ देने को उसके मां-बाप नहीं है. इसलिए मुस्कान कूड़ा उठाती है. कूड़ा बेचकर किताबें-ड्रेस खरीदती है. फिर स्कूल जाती है.

भले ही कोई मीडिया इस लड़की की पहचान उजागर नही करना चाहता. कोई भी समाज में उसका नाम नही लेना चाहता क्योंकि इस से मुस्कान को तकलीफ हो सकती है. लेकिन मुस्कान की मेहनत को देखकर जहां उसके गांव के लोग, जिले के लोग उस लड़की पर गर्व महसूस करते है. वहीं बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने वाली सरकार पर मुस्कान की कहानी जोरदार का तमाचा है. जो विज्ञापनों पर तो करोड़ों खर्च कर रहे हैं, मगर असल जिंदगी में किसी बच्ची या बच्चे के लिए कितना कर रहे हैं. मुस्कान की कहानी सुनकर पता चलता है.

पूरे देश में ऐसे ना जाने कितने मासूम हैं. जो उड़ना तो चाहते हैं, हौसलों को पर लगाना तो चाहते हैं. लेकिन परिवार की समस्या, घर के हालात की वजह से न जाने कितने मासूम मुस्कान की तरह जिंदगी जीने पर मजबूर हैं.

बचपन में ही माता-पिता के गुजर जाने के बाद से, 8 साल की मुस्कान अपने मामा के यहां रह रही थी. लेकिन पिछले समय से मुस्कान अपनी बहन के यहां रह रही है. माली हालत खराब होने की वजह से मुस्कान की बहन उसे आश्रय के अलावा ज्यादा कुछ नही दे सकती. जिसके चलते मुस्कान कूड़ा बीनती है. दूसरों की टूटी चप्पले पहनती है, स्कूल जाती है. लेकिन बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं. क्योंकि वो अभी बच्चे हैं ना, मगर आठ साल की मुस्कान को इस से कोई फर्क नही पड़ता, क्योंकि शायद मुस्कान ने अपने हालातों को, अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है.

अपने इरादों और अपने हौसलों पर अडिग मुस्कान के लिए चाइल्ड लाइन की निदेशिका अंजू बाजपेयी जब काउंसिलिंग के लिए पहुंची तो मुस्कान यह कह कर मना कर दिया की, वो भीख नहीं मांगती. वो खुद काम करके अपना खर्चा उठा सकती है. यही वजह है कि, मुस्कान जिस स्कूल में पढ़ती है. वहां के प्रिंसिपल से लेकर टीचर्स तक सब मुस्कान के हालात से वाकिफ हैं.

मुस्कान खुद कहती है कि मैं पढ़ना चाहती हूं, मैं अपने माता-पिता को बचपन में ही खो चुकी हूं. इसलिए अब जीजा के यहां रहती हूं. लेकिन जीजा बेरोजगार हैं. मैं उन पर बोझ नहीं बनना चाहती. इसलिए मैं खुद अपना पेट भरने के लिए काम करती हूं.

 

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